१४ चैत, काठमाडौं। पूर्वप्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली शनिवार सुबह ही गिरफ्तार हो चुके हैं। उन्हें जनआन्दोलन के दौरान हुई घटनाओं के लिए जिम्मेदार माना गया है। इसी आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर वर्तमान में काठमाडौं जिला परिसर में रखा गया है।
उनकी गिरफ्तारी का मुख्य आधार गौरीबहादुर कार्की के नेतृत्व वाली जांच आयोग की रिपोर्ट है। उस रिपोर्ट में ओली के बारे में इस प्रकार उल्लेख किया गया है :
नेपाल द्वारा अपनाई गई शासन प्रणाली में प्रधानमंत्री व्यवस्था का संचालन केंद्रबिंदु होते हैं और वे कार्यकारी प्रमुख की भूमिका निभाते हैं। मंत्रिमंडल और कर्मचारी तंत्र प्रधानमंत्री के समर्थन करने वाले अंग होते हैं। देश के भीतर अच्छी चीजों की सारी क्रेडिट तथा खराब कार्यों की जिम्मेदारी भी प्रधानमंत्री पर ही होती है।
नेपाल सरकार के प्रधानमंत्री होने के नाते अपने अधीनस्थ निकायों के कार्यों और कार्रवाई में उनकी ही जिम्मेदारी होती है। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग को गृह मंत्रालय से हटाकर पहली बार प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिपरिषद् कार्यालय के अधीन रखने की व्यवस्था की गई थी।
राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग की मुख्य जिम्मेदारी विभिन्न स्रोतों से सूचनाएँ एकत्रित करना, उनका विश्लेषण करना और सरकार के सभी सुरक्षा निकायों को संभावित घटनाओं तथा खतरों के विषय में सूचित करना होता है।
अधिकारिक आयोग की जांच में इस विभाग में सूचना संग्रह, उपकरण प्रयोग और साइबर सूचना विश्लेषण में कई कमियाँ पाई गई हैं। भाद्र २३ की सुरक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग द्वारा संकलित सूचनाओं के आधार पर बनाई गई थी, जिसमें अनुमान था कि प्रदर्शन में ३ से ५ हजार लोग शामिल हो सकते हैं, जो गलत साबित हुआ।
राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग जैसे महत्वपूर्ण निकाय को सशक्त बनाने के लिए प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिपरिषद् कार्यालय द्वारा कोई ठोस पहल नहीं की गई।
भाद्र २३ की शाम को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में दिन की भयानक घटनाओं के बाद अगले दिन भाद्र २४ से संभावित सुरक्षा जोखिम का वास्तविक मूल्यांकन करके सुरक्षा निकायों की प्रभावी तैनाती एवं घटना की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति बनाने पर केवल मौखिक सहमति बनी, लेकिन कोई लिखित निर्णय नहीं लिया गया, जिससे समस्या को सामान्य रूप में लिया गया।
सरकार द्वारा २६ सामाजिक नेटवर्क प्लेटफॉर्म पर रोक लगाते समय इसके प्रभावों का कोई अध्ययन नहीं किया गया। यह रोक संचार मंत्री द्वारा औपचारिक निर्णय के बिना मौखिक आदेश से हटाई गई थी। संभावित सुरक्षा चुनौतियों पर ध्यान नहीं दिया गया। सिर्फ युवा मांग पूरी होने का मानकर प्रतिबंध हटाने ने और समस्याएँ पैदा कर सकती थीं, जिसका कोई विस्तृत विचार, व्याख्या या विश्लेषण नहीं किया गया।
भाद्र २३ की शाम हुई राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में भाद्र २४ को संकटकाल घोषित कर शांति सुरक्षा बनाए रखने के लिए नेपाली सेना तैनात करने का विकल्प था, लेकिन इस विषय पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
न ही भाद्र २४ को हो सकने वाले संभावित परिणामों पर परिषद ने कोई निर्णायक कदम उठाया था। जिसके कारण भाद्र २३ ही नहीं, बल्कि २४ को भी देश ने कभी न देखे गए हादसे का सामना किया और जनता को बड़ी क्षति हुई।
सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि भाद्र २३ को संघीय संसद भवन के सामने काठमाडौं के प्रमुख जिल्ला अधिकारी ने १२:३० बजे कर्फ्यू जारी किया, जिसके कुछ समय पहले ही प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव शुरू हो गया था, जो लगभग चार घंटे तक चला।
इस घटना की रिपोर्ट सरकारी तंत्र के माध्यम से सरकार के उच्च स्तरों और प्रधानमंत्री तक भी पहुंचाई गई थी। तत्कालीन गृह मंत्री ने अपने बयानों में इसका उल्लेख किया है। यह समाचार सामाजिक संजाल पर भी व्यापक रूप से प्रसारित हुआ था।
बिगड़ती स्थिति को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा सुरक्षा निकायों के बीच समन्वय स्थापित करके प्रभावी सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, स्थिति नियंत्रण के लिए मोर्चाबंदी, हमले रोकने के लिए सिज फायर पहल, सैनिक मुख्यालय के साथ समन्वय कर नेपाली सेना की तैनाती जैसे कदम उठाने का कोई संकेत नहीं मिलता है। इसके कारण हताहतों की संख्या कम करने का अवसर चूक गया।