सार्वजनिक प्रशासन की रीढ़ और स्थायी सरकार है, कर्मचारीतंत्र। आजकल सामाजिक मीडिया और संचार माध्यमों में इस विषय पर विभिन्न बहसें चल रही हैं। कर्मचारीतंत्र में अत्यधिक राजनीतिकरण की शिकायत की जा रही है। यह प्रणाली अधिक प्रक्रियात्मक और धीमी होने का तर्क भी उठ रहा है। कर्मचारीतंत्र सूचना तकनीक के तेजी से विकास और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ होने की आलोचना भी हो रही है। कुछ पक्षों का कहना है कि इसमें व्यापक सुधार आवश्यक है, जबकि अन्य का सुझाव है कि सुधार मात्र पर्याप्त नहीं, कर्मचारीतंत्र के ‘डीएनए’ में ही परिवर्तन होना चाहिए।
समाज परिवर्तन की गति के साथ शासकीय प्रणाली और कर्मचारीतंत्र में भी परिवर्तन आवश्यक होता है और इसे स्वाभाविक रूप से लेना चाहिए। कर्मचारीतंत्र स्वयं भी अपने आप को रूपांतरित करने की आवश्यकता महसूस कर रहा है। हालांकि, कर्मचारीतंत्र सक्षम है या असमर्थ, इसे पूर्णतया निरपेक्ष रूप में नहीं, बल्कि सापेक्षता के आधार पर देखना चाहिए। इसके लिए विश्वव्यापी कर्मचारीतंत्र की विशेषताओं का विश्लेषण करना आवश्यक है। किन पक्षों में सुधार किया जा सकता है, इसी विषय पर केंद्रित बहस के माध्यम से ही समाधान निकाला जा सकता है।
आधुनिक कर्मचारीतंत्र के पिता मैक्स वेबर के अनुसार इसके मूलभूत विशेषताएँ योग्यताभूत चयन, नियम और कानून की प्रधानता, तटस्थता, निष्पक्षता, पदानुक्रम और कार्य विवरण हैं। कार्ल मार्क्स, रॉबर्ट के. मर्टन और विक्टर थम्पसन जैसे विद्वानों ने कर्मचारीतंत्र के व्यवहारिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्षों पर बल दिया है और इसके स्थायित्व, कागजी प्रक्रिया, व्यावसायिकता, अनुगमन तथा नियंत्रण जैसी विशेषताओं को उजागर किया है।
समग्र रूप से, कर्मचारीतंत्र एक स्थायी संरचना है जो कानून द्वारा दिए गए क्षेत्राधिकार के भीतर काम करता है। राजनीतिक दृष्टि से तटस्थ और व्यावसायिक रूप से प्रतिबद्ध होकर सरकार की नीतियों को लागू करना इसकी मुख्य जिम्मेदारी है। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति और नीतिगत कार्यक्रमों को कार्यान्वयन में बदलता है और इसके प्रमुख कार्य की पूर्ति करता है। कर्मचारीतंत्र में निश्चित पद, पदानुसार कार्य विवरण और व्यावसायिक विकास की व्यवस्था व्यवस्थित होती है।
समाज परिवर्तन की लय के अनुसार शासकीय प्रणाली और कर्मचारीतंत्र में परिवर्तन आवश्यक है। इसे स्वाभाविक रूप से स्वीकार करना चाहिए। कर्मचारीतंत्र स्वयं रूपांतरण की आवश्यकता महसूस करता है।
कर्मचारीतंत्र के रूपांतरण की चर्चा करते समय इसके मूल चरित्र को भूलना उचित नहीं। वर्तमान कर्मचारीतंत्र उन मूल चरित्रों को कितनी हद तक धारण करता है या नहीं, इसे आधार मानकर सुधार के उपाय सुझाना सर्वोत्तम होगा।
दो सप्ताह पहले (फागुन 21 तारीख) संसद के चुनाव सम्पन्न हुए। मतदान के लिए गई 18 वर्षीय किशोरी ने प्रश्न किया, ‘‘मतदान प्रक्रिया इतनी सरल और व्यवस्थित होती है तो अन्य सरकारी सेवाएँ लेने में इतनी जटिलता क्यों होती है?’’
इसी तरह, कर्मचारी दक्षता वृद्धि कार्यक्रम में एक रुचिकर संदर्भ सामने आया, जिसमें नेतृत्व स्तर के कर्मचारियों ने नीति निर्माण और निष्ठा पर उत्कृष्ट दृष्टिकोण दिया। सहजकर्ता ने पूछा, ‘ऐसे सक्षम कर्मचारी जब कार्यस्थल पर जाते हैं तो वह प्रतिबिम्बित क्यों नहीं होता?’
इन प्रश्नों से गहरा विचार करने पर एक और सवाल उठता है—क्या कर्मचारीतंत्र वास्तव में असक्षम और नालायक है? उत्तर है, नहीं। ‘जनजी’ आंदोलन के बाद बदलते राजनीतिक परिवेश में चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। छह महीने पहले निर्धारित यह चुनाव देशभर में शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण रहा। पहली बार मतदान करने वाली किशोरी की तरह हम सभी ने चुनाव आयोग के माध्यम से उत्कृष्ट कर्मचारीतंत्र का अनुभव किया। ऐसे सफल चुनाव सम्पन्न कराने में सहायक पक्ष निम्नलिखित हैं:
कार्य, परिणाम और समय सीमा की स्पष्टता: चुनाव के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों के काम, परिणाम और समय सीमा स्पष्ट रूप से परिभाषित थे। सभी का ध्यान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर केंद्रित था। स्पष्ट समय सीमा ने इसे पहली प्राथमिकता बना दिया। ‘क्या करना है, क्यों करना है और कब करना है’ की स्पष्टता थी। किसे कैसे काम करना है की समन्वय प्रभावी रही। मार्गदर्शन, आचार संहिता और अधिकारों के कारण कार्य में दुहराव नहीं हुआ और समय पर सम्पन्न हुआ।
व्यापक समन्वय और सहयोग: चुनाव अवधि में पूरा देश चुनावी माहौल में था। सरकार की प्राथमिकता कर्मचारीतंत्र की भी प्राथमिकता बन गई। देश भर के कार्यालयों ने मानव संसाधन उपलब्ध कराए। जोखिम प्रबंधन के लिए वैकल्पिक प्रबंध और प्रशिक्षण किए गए। इससे राष्ट्रीय ऊर्जा में समन्वय आया और कर्मचारीतंत्र ने ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाई।
राजनीतिक प्राथमिकता और अपनत्व: राजनीतिक प्राथमिकता के कार्यान्वयन में कर्मचारीतंत्र कभी पीछे नहीं हटता। राजनीतिक नेतृत्व के समर्थन से कर्मचारीतंत्र जोखिम उठाने और सहज कार्य सम्पन्न करने का माहौल बनाता है। चुनाव के दौरान ऐसा वातावरण स्थापित किया गया।
‘जनजी’ आंदोलन के प्रभाव से बनी संरचनाओं के वैकल्पिक प्रबंधन को भी इससे संभव हुआ। अनेक आलोचनाओं के बावजूद चुनाव सफल कराने में इसका महत्वपूर्ण योगदान नकारा नहीं जा सकता।
मापन योग्य जवाबदेहिता सुनिश्चित की गई है। चुनाव प्रक्रिया के प्रति स्टेकहोल्डर स्पष्ट हैं और नियमित अनुगमन, नियंत्रण और रिपोर्टिंग प्रक्रिया मौजूद है। समस्या आने पर तत्काल समाधान का अधिकार दिया गया है। त्रुटि होने पर कार्रवाई की सुनिश्चितता से जिम्मेदार अधिकारियों में ‘काम करना अनिवार्य’ की भावना विकसित हुई।
2054 साल के बाद लंबे समय तक स्थानीय चुनाव नहीं हो सके। 2074 साल में ही संघीय व्यवस्था के तहत चुनाव हुआ। उस अवधि में रिक्त स्थानीय निकाय की सेवा कर्मचारीतंत्र ने संभाली।
दर्जनों आपदा और संकट के दौरान कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर जनता की सेवा में लगे रहे हैं। प्रत्येक राजनीतिक परिवर्तन के बाद संक्रमण काल में भी नेपाली कर्मचारीतंत्र अग्रसर रहता है।
‘जनजी’ आंदोलन से प्रभावित संरचनाओं और अभिलेखों का वैकल्पिक प्रबंधन इसी वजह से संभव हुआ। आलोचनाओं के बावजूद चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में कर्मचारीतंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कर्मचारीतंत्र से परिणाम की अपेक्षा करते समय इसकी व्यावसायिक कमियों और सीमाओं को समझना आवश्यक है। नियम, कानून और प्रक्रियाओं के भीतर काम करने की बाध्यता के बावजूद व्यावसायिक चरित्र में समस्या देखी गई है जिसे सुधारना अपरिहार्य है:
1. राजनीतिक तटस्थता का अभाव: कर्मचारीतंत्र में कुछ दल विशेष के ट्रेड यूनियन सक्रिय हैं। स्थानांतरण, पदोन्नति और दंड में उनकी दबाव के कारण चरित्र में दोष दिखता है। इसे कानून द्वारा प्रतिबंधित करना चाहिए।
2. मूल्यांकन प्रणाली का अभाव: कार्य प्रदर्शन का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन प्रणाली नहीं है। काम करने और न करने में स्पष्ट भेद नहीं होने से उचित प्रतिस्पर्धा की कमी है। अच्छे कर्मचारियों का मनोबल घटा है जबकि संरक्षण पाने वालों का बढ़ा है। कानून में मापन योग्य संकेतक रख कर दंड और पुरस्कार प्रणाली बनानी चाहिए।
3. बिचौलियों का प्रभाव: व्यावसायिक अनुगमन कमजोर है। दलविहीनकरण में कमी और खरीद प्रक्रिया से लेकर बड़े परियोजनाओं तक बिचौलियों का प्रभाव कर्मचारीतंत्र को कमजोर करता है। राजनीतिक एवं प्रशासनिक नेतृत्व को हर क्षेत्र में बिचौलियों के प्रभाव को समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।
जहाँ कर्मचारीतंत्र स्वतंत्र रूप से काम कर पाया है और राजनीतिक दबाव का सामना किया है, वहाँ उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। ऐसी सफल प्रथाओं को प्रचारित कर कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने की संस्कृति विकसित करनी चाहिए।
जैसे भी राजनीतिक संक्रमण हो, संयम से देश को संभालने का अनुभव नेपाली कर्मचारीतंत्र के पास है और यह अभी भी सक्षम है, यह हाल के चुनावों ने प्रमाणित किया है। अब इसे और चुस्त बनाना तथा मनोबल बढ़ाना आवश्यक है।
राजनीतिक नेतृत्व यदि सही नियंत्रण और समर्थन प्रदान करे तो ही कर्मचारीतंत्र प्रभावशाली परिणाम दे सकता है। स्पष्ट नीति, कानून, संसाधन और समयसीमा के साथ अनुगमन हो तो कर्मचारीतंत्र स्वयं को रूपांतरित कर आपदा दिखा सकता है। इसलिए ‘कर्मचारीतंत्र ने घुमाया या असहयोग किया’ कहना जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है, जो नेतृत्व की कमी है। कर्मचारीतंत्र की क्षमता नेतृत्व की क्षमता के सापेक्ष होती है।
संविधान के लागू होने के बाद भी कर्मचारीतंत्र को व्यवस्थित करने हेतु उपयुक्त कानून की कमी चुनौतीपूर्ण है। इसका विकृत स्वरूप देख कर्मचारीतंत्र सुधार के प्रति तत्पर है। कानून द्वारा रूपांतरण करते हुए परिणाममुखी बनाने के बड़े अवसर अब की सरकार और संसद के हाथ में हैं, जिन्हें भलीभांति उपयोग करना चाहिए।
– निरौला नेपाल सरकार की सहसचिव एवं पौडेल नेपाल प्रशासनिक प्रशिक्षण प्रतिष्ठान की अध्ययन निदेशक हैं।
सुशासन श्रृंखला पढ़ें: