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लेखक: space4knews

नेपालले ओमानलाई दियो २५७ रनको लक्ष्य – Online Khabar

नेपाल ने ओमान को 257 रन का लक्ष्य दिया

नेपाल ने आईसीसी क्रिकेट विश्वकप लीग टू के तहत काठमांडू में ओमान को 257 रन का लक्ष्य दिया है। आसिफ शेख ने 94 रन बनाकर सबसे बड़ा योगदान दिया, जबकि अर्जुन कुमाल ने 48 और आरिफ शेख ने 43 रन जोड़े। नेपाल ने 49.5 ओवर में 256 रन बनाए, जिसमें ओमान के नदिम खान ने 3 विकेट लिए।

22 वैशाख, काठमांडू। आईसीसी क्रिकेट विश्वकप लीग टू के अंतर्गत काठमांडू में हो रही श्रृंखला के अंतिम मुकाबले में नेपाल ने ओमान को 257 रन का लक्ष्य दिया है। कीर्तिपुर स्थित टीयू अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैदान में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए नेपाल ने 49.5 ओवर में अपनी सभी विकेट गंवा कर 256 रन बनाए। बल्लेबाजी में आसिफ और आरिफ शेख दाजुभाई चमके। नेपाल के ओपनर आसिफ शेख ने सर्वाधिक 94 रन बनाए, जबकि अर्जुन कुमाल ने 48, आरिफ शेख ने 43 और उपकप्तान दीपेन्द्र सिंह ऐरी ने 33 रन जोड़े।

आसिफ ने 97 गेंदों पर 7 चौके और 5 छक्के लगाए। बड़े शॉट खेलते हुए 35वें ओवर की तीसरी गेंद पर आउट हुए आसिफ का कैच आउट बॉउंड्री लाइन के पास लिया गया। यह ODI में आसिफ का 14वां अर्धशतक है। 66 मैचों में उन्होंने एक शतक और 14 अर्धशतक लगाए हैं। दूसरे ओपनर विनोद भंडारी दूसरे ओवर में ही बिना कोई रन बनाए आउट हो गए, जिसके बाद आसिफ और अर्जुन कुमाल ने दूसरे विकेट के लिए 123 रन की साझेदारी की।

अर्जुन ने 87 गेंदों पर 4 चौकों की मदद से 48 रन बनाए, लेकिन दो रन की कमी से अर्धशतक से चूक गए। उपकप्तान दीपेन्द्र सिंह ऐरी ने 42 गेंदों पर 1 चौका लगाते हुए 33 रन बनाए। गुल्सन ने 23 गेंदों में 2 चौकों की मदद से 17 रन जोड़े। कप्तान रोहित पौडेल ने 16 गेंदों में सिर्फ 9 रन ही बनाए। 49 ओवर में नेपाल का स्कोर 237/9 था, जहां आसिफ ने आखिरी ओवर में लगातार तीन छक्के मारे और टीम का स्कोर बढ़ाया। लेकिन अंत के पांचवे गेंद पर आरिफ के आउट होते ही नेपाल की टीम ऑलआउट हो गई। ओमान के लिए नदिम खान ने सर्वाधिक 3 विकेट लिए, जबकि सकिल अहमद ने 2 विकेट हासिल किए।

सर्लाही में मोटरसाइकिल की ठोकर से वृद्ध की मृत्यु

२२ वैशाख, सर्लाही। सर्लाही जिले में मोटरसाइकिल की ठोकर लगने से एक वृद्ध पुरुष की मृत्यु हो गई है। बागमती नगरपालिका-२ के धरहरा चौक पर नई रोड-बरहथवा सड़क खंड में सोमवार शाम को हुई इस दुर्घटना में स्थानीय लगभग ७५ वर्षीय हरिबहादुर अधिकारी की मौत की पुष्टि पुलिस ने की है।

जिला प्रहरी कार्यालय सर्लाही के प्रवक्ता एवं डीएसपी सरोज राई के अनुसार, नई रोड से बरहथवा की ओर जा रही भारतीय नंबर प्लेट बीआर ३३ बीएफ ७८२१ वाली मोटरसाइकिल ने पैदल यात्रा कर रहे अधिकारी को लगभग शाम ६ बजे ठोकर मारी थी।

दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल अधिकारी का उपचार हेतु उन्हें वीरगंज ले जाया गया और बाद में बारा स्थित एलएस न्यूरो अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने शाम ७ बजे उन्हें मृत घोषित किया।

दुर्घटना के बाद मोटरसाइकिल को पुलिस चौकी ढुङ्ग्रेखोला की हिरासत में रखा गया है, जबकि चालक शिवम कुशवाहा, जो गोडैता नगरपालिका-२ के लगभग २० वर्ष के रहने वाले हैं, को इलाका प्रहरी कार्यालय हरिवन ने गिरफ्तार किया है। घटना से संबंधित आगे की जांच जारी है।

भारत विपक्षहीन होता जा रहा है

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा पूर्ण।

  • पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई और भाजपा ने बहुमत हासिल किया।
  • ममता बनर्जी की हार से भारत के विपक्षी दल दुर्बल हुए हैं और भाजपा का मनोबल बढ़ा है।
  • विपक्षी दलों में एकता की कमी और कमजोर रणनीति के कारण भाजपा ने कई राज्यों में सरकार बनाई है।

22 वैशाख, काठमांडू। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए बड़ा झटका हैं। पूर्व में 215 सीटें जीतने वाली पार्टी इस बार सौ सीट भी नहीं जीत सकी।

इससे भी बड़ी बात यह है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कड़े विरोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनाव जीत लिया।

ममता बनर्जी केंद्रीय सरकार में सत्तारूढ़ भाजपा के विरोधी दलों के बीच इतनी बड़ी प्रतिष्ठा रखती थीं कि उनसे समर्थन में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव तथा बिहार में आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव भी खड़े थे।

फिर भी, इतने विपक्षी नेताओं के समर्थन के बावजूद ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने में असफल रहीं। यह न केवल विपक्षी दलों के लिए बड़ा झटका है बल्कि भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी दलों की स्थिति और कमजोर होने का संकेत भी है।

2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ बने इंडिया ब्लॉक के मुखिया के रूप में भी ममता बनर्जी की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने लालू प्रसाद यादव और विपक्षी गुट के नीतिश कुमार को विपक्षी गठबंधन की पहली बैठक पटना में आयोजित करने का सुझाव दिया था।

यह सुझाव मानते हुए इंडिया ब्लॉक की पहली बैठक पटना में आयोजित भी हुई। इस रिपोर्ट में हम विधानसभा चुनाव में पराजय के कारण ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति पर और राष्ट्रीय तथा विपक्षी दलों के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा करेंगे।

‘विपक्ष कमजोर हुआ है’

तृणमूल कांग्रेस केंद्र में तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। 2024 में विपक्षी दलों में केवल कांग्रेस (99 सीट) और समाजवादी पार्टी (37 सीट) ने ज्यादा सीटें जीती थीं।

टीएमसी ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 29 सीटें जीती थीं। वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का कहना है, ‘इस जीत के साथ भाजपा अब पश्चिम बंगाल के सभी 42 सीटों पर दबदबे की कोशिश करेगी। ममता बनर्जी बड़ी नेता हैं, लेकिन उनकी पार्टी की हार से विपक्ष कमजोर हुआ और भाजपा और मजबूत हुई।’

उन्होंने आगे कहा, ‘विपक्षी दलों में एकता की कमी स्पष्ट हुई। विपक्षी दल ममता बनर्जी को सिर्फ परेशानी के तौर पर देखते रहे। ये सभी दल वैचारिक रूप से अलग हैं, जबकि दक्षिणपंथी राजनीति करने वाली भाजपा के लिए कोई विकल्प नहीं बचा।’

विपक्षी दलों की स्थिति को देखें तो केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन UDF को पुनः सत्ता मिली लेकिन असम में हार का सामना करना पड़ा।

तमिलनाडु में भाजपा के विरोध में खड़े DMK नेता एम के स्टालिन की भी हार हुई है। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘कुल मिलाकर विपक्ष कमजोर है। सभी बड़े विपक्षी नेता हार गए हैं। इसका असर ये हो सकता है कि जब विपक्ष के विरोध में विवाद उत्पन्न होंगे तो उनकी किरकिरी होगी। इसमें ममता बनर्जी और एम के स्टालिन दोनों शामिल होंगे।’

भाजपा नेताओं ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी और उनकी पार्टी पर बांग्लादेशी नागरिकों को शरण देने और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। तमिलनाडु में भी भाजपा और DMK के बीच हिंदी और सनातन धर्म के नाम पर विवाद चलता रहा है।

विपक्षहीन राजनीति

अमित शाह

पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में सत्ता गंवाने के बाद विपक्षी दल राष्ट्रीय राजनीति में कमजोर हुए हैं। हाल के वर्षों में भाजपा लगभग तीन दशक बाद दिल्ली में फिर से सत्ता में आई है। कुछ दिन पहले ही बिहार में भाजपा ने पहली बार सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया।

भाजपा के पास उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, असम जैसे कई राज्यों में सरकारें हैं। साथ ही कुछ राज्यों में उसकी गठबंधन सरकारें बहुमत में हैं।

पश्चिम बंगाल में मिली जीत ने भाजपा के लिए नए अवसर खोल दिए हैं। अब भाजपा कमजोर माने जाने वाले राज्यों में भी सरकार बनाने के लिए उच्च मनोबल के साथ आगे बढ़ सकती है।

एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज (पटना) के पूर्व निदेशक और राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘भाजपा विपक्षहीन राजनीति चाहती है। इस जीत से उन्हें मनोबल मिलेगा। विपक्ष को इस हार के बाद अपनी कमजोरियों पर पुनर्विचार करना होगा। संसदीय राजनीति अवसरवादी है, इसलिए सभी केवल अपने लाभ के लिए काम करते हैं।’

दिवाकर आगे कहते हैं, ‘विपक्ष या क्षेत्रीय दल टूटे-फूटे हैं। जैसे पश्चिम बंगाल में भाजपा ने विजय प्राप्त की, वैसे उत्तर प्रदेश में भी ऐसा हो सकता है। राजनीति में अब केवल छोटे दल भाजपा के खिलाफ बचे हैं, जो लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।’

रशीद किदवई कहते हैं, ‘पश्चिम बंगाल में वामपंथी दल, AIMIM, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस हैं जो धर्मनिरपेक्ष वोट साझा करते हैं, जबकि भाजपा बहुसंख्यक राजनीति करती है जिसके वोट बंटते नहीं।’

वे आगे कहते हैं, ‘विपक्ष की एक और समस्या ये है कि उनकी एकता और रणनीति अक्सर कागजों तक ही सीमित होती है। अगर कांग्रेस तमिलनाडु में विजय पार्टी के साथ समझौता करती तो बहुत फायदा होता, लेकिन पी चिदंबरम ने इनकार कर दिया और कांग्रेस अकेली रह गई।’

विपक्ष के सामने बची राह

विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)

23 जून 2023 को पटना में 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का सामना करने के लिए विपक्षी दलों की बैठक हुई। इस बैठक में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, आरजेडी के लालू प्रसाद यादव, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, फारुक अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ्ती सहित कई नेता शामिल थे।

कुछ महीनों बाद नीतिश कुमार ने लोकसभा चुनाव से पहले ही विपक्षी गठबंधन छोड़कर भाजपा से हाथ मिला लिया, जो विपक्षी गठबंधन के लिए पहला बड़ा झटका था।

इसके बाद बाकी विपक्षी दलों में भी लोकसभा चुनाव में पूर्ण एकता नजर नहीं आई। दिल्ली से पंजाब, पश्चिम बंगाल से बिहार तक इस एकता में दरार आ गई।

दिवाकर कहते हैं, ‘पश्चिम बंगाल की हार विपक्ष के मनोबल को तोड़ देगी लेकिन अगर विपक्ष सक्रिय रहेगा और हार के बाद निष्क्रिय नहीं होगा तो यह अच्छा होगा।’

वे आगे कहते हैं, ‘ममता बनर्जी के मामले में एन्टी-इन्कम्बेन्सी (सत्ताविरोधी लहर) थी, जनभावना थी, भाजपा आक्रामक थी जिसने उन्हें हराया। चुनाव आयोग का काम चुनाव में जनभागीदारी बढ़ाना है, लेकिन यह घट रही है, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।’

विपक्ष के सामने बड़ी चुनौती यह है कि जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बिहार में ‘मत अधिकार रैली’ कर रहे थे, तब ममता बनर्जी शामिल नहीं थीं। पश्चिम बंगाल में SIR जैसी घटनाएँ चल रही थीं लेकिन विपक्षी दलों ने पूरी तरह उनका समर्थन नहीं किया।

नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘ममता बनर्जी की हार के बाद विपक्ष के सामने एकमात्र राह कांग्रेस नेतृत्व को स्वीकार करना है और कांग्रेस को भी बड़ी उदारता दिखानी होगी। यदि ऐसा हुआ तो विपक्ष आगे बढ़ सकता है। यह समय न केवल विपक्षी दलों के लिए बल्कि भाजपा के लिए भी महत्वपूर्ण है कि वे आगे कैसी रणनीति अपनाते हैं।’

रशीद किदवई कहते हैं, ‘जब भाजपा हारती है तो वह तुरंत दूसरी तैयारी में लग जाती है, लेकिन विपक्ष हारने के बाद उदासीन हो जाता है, जैसे बिहार में हार के बाद विपक्ष निःसक्रिय हो गया और जनता की समस्याओं से दूर हो गया।’

(बीबीसी हिन्दी के लिए चंदन कुमार जजवाड़े की रिपोर्ट)

खुम्बु आइसफलमा दुई जना घाइते, उपचारका लागि काठमाडौं ल्याइयो

खुम्बु आइसफल्मा दो घायल, उपचार के लिए काठमांडु ले जाया गया

सगरमाथा आधार शिविर से दूसरे शिविर की ओर जाते समय खुम्बु आइसफल्मा बड़ा सेराक गिरने से भारतीय आरोही निमिष कुमार सिंह और शेर्पा गाइड पेम्बा टेन्डुक घायल हो गए हैं। यह घटना सुबह ५:४५ बजे हुई। बचाव के लिए लुक्ला से हेलीकॉप्टर सुबह ६:३० बजे घटनास्थल पर पहुंचा। उन्हें काठमांडु के ह्याम्स अस्पताल में उपचार के लिए ले जाया गया है और उनकी स्थिति खतरे से बाहर बताई गई है, पर्यटन विभाग ने यह जानकारी दी। २२ वैशाख, काठमांडु।

सगरमाथा आधार शिविर से दूसरे शिविर की ओर रोटेशन के लिए जाते समय खुम्बु आइसफल्मा आरोही और शेर्पा गाइड घायल हुए हैं। पर्यटन विभाग के अनुसार, हाल ही में खोले गए खुम्बु आइसफल्मा में जोखिमपूर्ण बड़े सेराक (बर्फ का टुकड़ा) के टूटने से आरोहियों के रास्ते प्रभावित हुए हैं। इस सेराक टूटने की वजह से भारतीय (पुणे) के ४० वर्षीय आरोही निमिष कुमार सिंह और ४४ वर्षीय शेर्पा गाइड पेम्बा टेन्डुक घायल हुए हैं।

घटना के तुरंत बाद पायोनियर एडवेंचर प्रा. लि. और समिट फोर्स एक्सपीडिशन के शेर्पा गाइड्स की टीम ने तुरंत बचाव कार्य किया और आधार शिविर को सूचित किया। आधार शिविर से सेवन समिट टीम के समन्वय में सुबह ६:३० बजे लुक्ला से हेलीकॉप्टर घटनास्थल पर पहुंचा और आरोहियों को बचाया गया। सेवन समिट ट्रेक के अनुसार, घायल लोगों को अभी काठमांडु स्थित ह्याम्स अस्पताल में उपचार के लिए ले जाया गया है। उनकी स्थिति खतरे से बाहर बनी हुई है, पर्यटन विभाग ने बताया।

प्रधानमंत्री बालेन ने विद्यार्थी और कर्मचारी संगठन खारेज पर स्पष्टता से कहा

२२ वैशाख, काठमाडौं । प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह (बालेन) ने विद्यार्थी संगठन और कर्मचारी ट्रेड यूनियन खारेज को पार्टी विरोधी संघर्ष के रूप में न देखने का आग्रह किया है। जब विद्यार्थी संगठन और कर्मचारी ट्रेड यूनियन खारेज का विरोध हो रहा था, तब उन्होंने सरकार के इस निर्णय को प्रणाली को बचाने का प्रयास बताया। ‘‘यह कोई पार्टी के खिलाफ लड़ाई नहीं है। यह प्रणाली बचाने का प्रयास है। यह भविष्य बचाने का प्रयास है,’’ प्रधानमंत्री ने फेसबुक पर लिखा, ‘‘यह देश को दलगत कब्जे से मुक्त कर संस्थागत मार्ग की ओर ले जाने का प्रयास है। शिक्षालय और कर्मचारीतंत्र को दलगत संक्रमण से मुक्त कराने का प्रयास है।’’

प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘‘विद्यार्थी और कर्मचारीतंत्र को पार्टीकरण से नुकसान हुआ’’ और पत्रकारों, नेताओं, अभियानकर्ताओं, व्यापारियों और आम जनता से समर्थन और सहयोग की उम्मीद जताई। ‘‘आपकी इच्छानुसार अध्यादेश के माध्यम से इन विकृतियों को हटाया गया है। हमें सभी का समर्थन और विश्वास चाहिए, आपकी साथ और विश्वास आवश्यक है,’’ उन्होंने कहा, ‘‘क्योंकि परिवर्तन भाषण से नहीं, निर्णय से आता है। हम आपकी जनचाहना के आधार पर सरकार में आए हैं। आप निश्चिंत रहें, जो भी हम करेंगे वह आम नेपाली जनता के हित में होगा।’’

सरकार के इस निर्णय से किसी अधिकार की छीनत Rox नहीं होगी, बल्कि पेशेवर स्वतंत्रता मजबूती से बढ़ेगी, प्रधानमंत्री बालेन ने कहा, ‘‘यह अधिकार छीनता नहीं है, बल्कि पेशेवर स्वतंत्रता को मजबूत बनाता है,’’ उन्होंने लिखा, ‘‘अब नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नति का आधार दलगत नजदीकी नहीं, बल्कि विधि, क्षमता और दक्षता होना चाहिए।’’

कोलोराडोमा नेपाल डे परेडको तयारी – Online Khabar

कोलोराडो में नेपाल दिवस परेड की तैयारी

कोलोराडो स्थित नेपालीभाषी समुदाय ने 16 मई को बोल्डर शहर में नेपाल दिवस परेड आयोजित करने की तैयारी शुरू कर दी है। रॉकी माउंटेन फ्रेंड्स ऑफ नेपाल द्वारा आयोजित इस परेड में बोल्डर सिटी के मेयर आरोन ब्रोकट सहित विभिन्न अतिथियों के शामिल होने की घोषणा की गई है। पर्याप्त संख्या में संघ-संस्थाओं को अपनी सांस्कृतिक झलक दिखाने वाले परिधानों और बैनरों के साथ कार्यक्रम में भाग लेने का आग्रह किया गया है।

कोलोराडो के नेपालीभाषी समुदाय का उद्देश्य नेपाली भाषा, संस्कृति और पहचान के संरक्षण के लिए विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ नेपाल दिवस परेड आयोजित करना है। रॉकी माउंटेन फ्रेंड्स ऑफ नेपाल के उपाध्यक्ष हरि गुरुङ के अनुसार हेल्पिंग हैंड हेल्थ एजुकेशन और एनआरएनए एनसीसी के सहयोग से यहां के सभी संघ-संस्थाओं की सहभागिता में यह परेड आयोजित की जाएगी। 16 मई, रविवार को दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक बोल्डर शहर में कार्यक्रम चलेगा। इस कार्यक्रम में स्थानीय बोल्डर सिटी के मेयर आरोन ब्रोकट सहित विभिन्न गेस्ट्स शामिल होंगे।

कार्यक्रम को और भी मनोरंजक बनाने के लिए नेवा: खलः, मगर समाज, तमु प्ये ल्हु संघ सहित कई संघ-संस्थाएं अपनी-अपनी संस्कृति को दर्शाने वाले संगीत प्रस्तुतियां देने की योजना बना रही हैं, इसकी जानकारी रॉकी माउंटेन फ्रेंड्स ऑफ नेपाल की अध्यक्ष आकृति राई ने दी। कोलोराडो के सभी संघ-संस्थाओं के प्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, समाजसेवी और नेपाल तथा नेपाली के प्रति सद्भाव रखने वाले सभी लोगों से आग्रह है कि वे उपस्थित होकर कार्यक्रम को सभ्य और भव्य बनाने में सहयोग करें, अध्यक्ष राई ने कहा है।

कोलोराडो के बोल्डर में यह परेड हर वर्ष आयोजित होती आ रही है। अमेरिका के अन्य विभिन्न राज्यों में भी नेपाली परेड आयोजित होने लगी हैं, लेकिन कोलोराडो की परेड बोल्डर सिटी और काउंटी के कार्यालय द्वारा 2004 से नेपाली भाषा, संस्कृति और पहचान के संरक्षण के लिए हर वर्ष नेपाल दिवस परेड आयोजित करने के ऐलान के बाद से शुरू हुई है। अमेरिका के पचास राज्यों में कोलोराडो ऐसा पहला राज्य है जो इस प्रकार का कार्यक्रम आयोजित करता है।

नेपाल ने ओमान के खिलाफ टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया

नेपाल ने ओमान के खिलाफ मैच में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया है। कप्तान रोहित पौडेल ने टॉस जीतकर यह फैसला किया। २२ वैशाख, काठमांडू। लीग २ क्रिकेट के अंतर्गत ओमान के खिलाफ नेपाल ने टॉस जीता है। नेपाल ने अपनी कमज़ोरियों को सुधारते हुए पहले मैच की हार का बदला लेने और श्रृंखला में तीसरी जीत हासिल कर सुखद अंत करने का लक्ष्य रखा है।

नेपाल अगले सप्ताह से लीग २ के शीर्ष २ टीमों अमेरिका और स्कॉटलैंड के खिलाफ मुकाबला करेगा। इसके लिए जारी श्रृंखला की लय महत्वपूर्ण होनी है। लीग २ ट्रैक रिकॉर्ड में फिलहाल ओमान ने २७ मैचों में ३१ अंक लेकर तीसरा स्थान बनाए रखा है, जबकि नेपाल २३ मैचों में १६ अंकों के साथ सातवें स्थान पर है। दूसरी टीम यूएई के २४ मैचों में १४ अंक हैं। पहले हुए पहले मैच में नेपाल ओमान से हार चुका है। नेपाल यूएई के खिलाफ दोनों मैच जीत चुका है। अब ओमान को भी हराकर नेपाल श्रृंखला में तीसरी जीत की खोज में होगा।

नेपाल और ओमान अब तक ODI फॉर्मेट में ९ बार आमने-सामने आए हैं। इनमें नेपाल ने ३ मैच जीते हैं, ५ में वह पराजित हुआ है और १ मैच रद्द रहा है। कीर्तिपूर में इन दोनों टीमों के ४ मुकाबले हुए हैं, जिनमें नेपाल ने १ मैच जीता है और ओमान ने ३ मैच जीते हैं। लीग २ क्रिकेट के तहत कीर्तिपूर में खेले गए मैचों में नेपाल ओमान को हराने में सफल नहीं रहा है। कीर्तिपूर में नेपाल की एकमात्र जीत ACC प्रीमियर कप के अंतर्गत हुई थी।

ममता बनर्जी के सत्ता खोने के ५ मुख्य कारण

समाचार सारांश

समीक्षा पश्चात तैयार किया गया।

  • पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार २०६ सीटें जीत कर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है और ममता बनर्जी अपनी भवानीपुर सीट से हार गई हैं।
  • ममता बनर्जी ने भाजपा पर मत चोरी का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बल की भूमिका को अनैतिक बताया है।
  • एसआईआर प्रक्रिया ने टीएमसी को भारी नुकसान पहुँचाया और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण ने भाजपा की जीत में मुख्य भूमिका निभाई है, ऐसा विश्लेषकों का मानना है।

२२ वैशाख, काठमांडू। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहली बार राज्य की सत्ता में आ रही है और उसने दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल किया है। भाजपा ने २०६ सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को मात्र ८० सीटें हासिल करने तक सीमित कर दिया है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट से भाजपा के नेता शुभेंदु अधिकारी से १५ हजार से अधिक मतों से हार गई हैं। मतगणना के दौरान उन्होंने भाजपा पर वोट चोरी का आरोप लगाया था।

उन्होंने मीडिया से कहा, ‘भाजपा ने सौ से अधिक सीटें लूटी हैं। भाजपा की जीत अनैतिक है। चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ मिलकर जो किया, वह पूरी तरह से अनैतिक है।’

उन्होंने जबरदस्ती एसआईआर प्रक्रिया का आरोप लगाते हुए कहा, ‘उन्होंने अत्याचार किया। काउंटिंग एजेंटों को गिरफ्तार किया। हम पुनः वापसी करेंगे।’

पंद्रह साल तक लगातार सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस की इस चुनावी हार के पीछे क्या कारण हो सकते हैं, इस पर भारी चर्चा हो रही है।

अब तक उपलब्ध परिणामों और रुझानों के आधार पर इस हार के पीछे पांच मुख्य कारण माने जा रहे हैं:

१. महिला सुरक्षा का मुद्दा

पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक ममता बनर्जी की पार्टी का समर्थन करता आया था।

स्कूली छात्राओं को साइकल वितरण योजना समेत ‘लक्ष्मी भंडार’, ‘कन्याश्री’ और ‘सबुज साथी’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच तृणमूल सरकार को लोकप्रिय बनाया था।

लेकिन इस बार वह समर्थन कमजोर हुआ नजर आ रहा है। इसका मुख्य कारण पार्टी की महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों में कथित असफलता हो सकता है।

दो साल पहले हुए आर.जी. कर आंदोलन ने चुनाव पर प्रभाव डाला। इसका उदाहरण पानीहाटी है, जो पारंपरिक रूप से तृणमूल का गढ़ माना जाता था। वहां आर.जी. कर मामले की पीड़ित महिला की मां भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ीं और २८,८३६ मतों के अंतर से विजयी रहीं।

(आर.जी. कर भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के कोलकाता में स्थित एक प्रसिद्ध सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम है। अगस्त २०२४ में यहाँ रात में ड्यूटी पर तैनात एक प्रशिक्षु महिला डॉक्टर का अत्यंत क्रूरता से बलात्कार और हत्या कर दी गई थी। उनका नाम अभया रखा गया था। इस घटना के बाद कोलकाता और पूरे भारत में महिला सुरक्षा की मांग को लेकर डॉक्टरों सहित आम जनता ने लंबा आंदोलन किया था। आईपीएएन में ममता सरकार और पुलिस प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगा था।)

पश्चिम बंगाल की कुछ महिलाओं ने सुरक्षा मुद्दे उठाए थे। चुनाव प्रचार के दौरान एक महिला ने कहा था, ‘क्या अब हम सुरक्षित रह भी सकते हैं? ऐसा डर है। महिलाओं का अब कोई सम्मान बचने वाला नहीं है। वे हमें तोड़ देंगे। क्या राज्य की हालत इतनी खराब हो गई है?’

कोलकाता में एक महिला ने कहा, ‘आर.जी. कर घटना के बाद मैं हमेशा सुरक्षा उपाय साथ लेकर चलती हूँ।’

एक अन्य युवा महिला ने कहा, ‘कुछ जगहें असुरक्षित लगती हैं और रात ९-१० बजे के बाद और भी खतरनाक महसूस होता है।’

२. एसआईआर प्रक्रिया

एसआईआर

मतदाता सूची में व्यापक संशोधन अर्थात् एसआईआर प्रक्रिया में ९० लाख से अधिक नाम हटाए गए और सबसे अधिक नुकसान टीएमसी को हुआ है।

सच यह है कि कई वैध मतदाताओं के नाम भी हटाए गए, लेकिन कई नकली या मृत मतदाताओं के नाम भी हटाए गए।

भाजपा हमेशा दावा करती रही है कि ऐसी अनियमितताओं का फायदा टीएमसी वर्षों से उठा रही थी और अब वह कम होगा।

कोलकाता के प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान शिक्षक ज़ैद मैनहूड ने कहा, ‘टीएमसी ने भ्रष्टाचार और सिंडिकेट संस्कृति को हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बना दिया था। लेकिन भाजपा ने दिखाया कि ३० प्रतिशत आबादी को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखकर भी जीत संभव है।’

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी एसआईआर को चुनावी बदलाव का मुख्य कारण माना है। उन्होंने कहा, ‘भले ही भाजपा की सीटें अधिक दिखीं, मतभेद केवल ३ प्रतिशत का है। अगर ४.३ प्रतिशत लोग मतदान करते, जिनमें कई मुस्लिम थे और ज्यादातर गैरमुस्लिम टीएमसी समर्थक थे, तो क्या यही नतीजा होता? निश्चित ही नहीं।’

३. प्रशासनिक कमजोरी

आरजी कर मेडिकल कॉलेज घटना के बाद सुरक्षा बलों के सामने महिलाएं

भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन, दैनिक जीवन में कमीशन, सिंडिकेट संस्कृति के बढ़ाव और टीएमसी के १५ वर्ष शासन के दौरान प्रशासनिक कमजोरी पश्चिम बंगाल की राजनीति के इतिहास में महत्वपूर्ण आरोप के रूप में ली गई है।

२०१६ और २०२१ में पार्टी ने बंगाली पहचान, महिला कल्याणकारी योजना और धर्मनिरपेक्षता जैसे विषयों को लेकर आलोचना झेली थी।

इस बार ममता बनर्जी ने एसआईआर को लोगों के कष्ट का राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता के आरोपों के कारण यह सफल नहीं रहा।

४. हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

शुभेंदु अधिकारी

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी की लंबी जीत का बड़ा कारण मुस्लिम समुदाय का लगभग एकमत समर्थन था। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की जनसंख्या ३० प्रतिशत है और ८५ से ९० प्रतिशत वोट टीएमसी को मिलते थे।

लेकिन इस बार हिंदू वोटों के ‘उल्टे ध्रुवीकरण’ का साफ़ संकेत मिला, जिसका फायदा भाजपा को हुआ। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में भी भाजपा की बढ़त देखी गई।

मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों में ममता बनर्जी ने कई हिंदू मंदिरों का निर्माण और मरम्मत सरकारी खर्च से कराया था। यह हिंदुत्व का नरम स्वरूप दिखाने का प्रयास था।

लेकिन यह रणनीति प्रभावी नहीं हुई और कई हिंदू मतदाता भाजपा की आक्रामक राजनीतिक सोच की ओर आकर्षित हुए।

कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक सुकांत सरकार कहते हैं, ‘इस बार हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की स्पष्टता बहुत अधिक देखी गई।’

शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराने के बाद कहा, ‘यह हिंदुत्व की जीत है। यह बंगाल की जीत है। यह नरेंद्र मोदी जी की जीत है।’

उन्होंने बताया, ‘सीपीएम समर्थकों ने भी मुझे वोट दिया। भवानीपुर में १३ हजार सीपीएम वोट थे, जिनमें से कम से कम १० हजार वोट मेरे पक्ष में आए। सभी बंगाली हिंदू खुले तौर पर मतदान किए।’

५. केन्द्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती

केंद्रीय बल

समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मतगणना में केंद्रीय सुरक्षा बलों के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव के समय परंपरागत रूप से सत्ता पार्टी को कुछ लाभ प्राप्त होता रहा है।

लेकिन इस बार तृणमूल कांग्रेस को वह लाभ लगभग नहीं मिला। चुनाव आयोग ने राज्य प्रशासन पर कड़ी निगरानी रखी और जिलों के अधिकारियों व पुलिस निरीक्षकों का बड़ा पैमाने पर परिवर्तन किया।

मतदान से पहले ही राज्य में २ लाख ४० हजार से अधिक केंद्रीय सुरक्षा कर्मी तैनात किए गए, जो अभूतपूर्व था।

कई विश्लेषक कहते हैं कि इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था ने चुनाव को शांतिपूर्ण बनाया और मतदाता भयमुक्त होकर बहादुरी से मतदान कर सके।

पिछले कुछ महीनों से टीएमसी ने चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। अब पीछे मुड़कर देखने पर उन शिकायतों के कारण और स्पष्ट होते दिखते हैं।

इस चुनाव में चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ देखी गई है।

ममता बनर्जी ने २९ अप्रैल को आरोप लगाया था कि केंद्र की शक्तियां और सरकारी तंत्र टीएमसी को हराने में लगे हुए हैं।

कोलकाता एयरपोर्ट जाते वक्त केंद्रीय बलों ने उनकी कार की जांच करने की कोशिश करने का भी उन्होंने आरोप लगाया था।

टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों द्वारा आतंक फैलाने का आरोप लगाया था।

(यह सामग्री शुभज्योति घोष द्वारा संपादित है)

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तर्कपूर्ण संवाद युग का अंत

समाचार सारांश

  • डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी जनता की सलाह के बिना ईरान पर हमला करने का निर्णय लिया और कहा कि उनकी शक्ति “मेरी अपनी नैतिकता और मेरा विवेक” है।
  • दार्शनिक जुर्गेन हेबरमास ने कहा कि लोकतंत्र का सार सार्वजनिक विमर्श और बहस में निहित है, और सभी राजनीतिक शक्तियाँ नागरिकों की संवादात्मक शक्ति से प्राप्त होती हैं।
  • हेबरमास ने बताया कि सोशल मीडिया ने लोकतांत्रिक बहस को असंभव बना दिया है और ट्रम्प की निरंकुश कार्यशैली ने अमेरिकी लोकतंत्र में विघटन ला दिया है।

अमेरिकियों का युद्ध हेतु कानूनी बहाने प्रस्तुत करने का एक लंबा इतिहास रहा है। 1898 में अमेरिकी नौसैनिक विशेषज्ञों ने जहाज दुर्घटना पर आधारित विस्फोट को कारण बताया, जबकि पीली प्रेस ने ‘USS Maine’ डूबने के लिए स्पेन को दोषी ठहराकर युद्ध का उन्माद फैलाया था। उस समय जॉर्ज डब्ल्यू. बुश प्रशासन ने सद्दाम हुसैन को 9/11 हमलों से जोड़कर और उन पर व्यापक विनाशकारी हथियार बनाने का आरोप लगाकर इराक पर आक्रमण का औचित्य साबित करने का प्रयास किया, लेकिन ये दावे बाद में झूठे साबित हुए।

ईरान से जुड़े युद्ध में डोनाल्ड ट्रम्प ने एक नया मानक स्थापित किया। उन्होंने अमेरिकी जनता को झूठ बोलने की झंझट से बचाते हुए बिना सलाह के युद्ध आरंभ करने वाले पहले राष्ट्रपति बने क्योंकि अमेरिकी जनता की राय उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। ईरान पर हमला करने में न तो कांग्रेस के अधिकारी और न ही बौद्धिक या नागरिक समाज के साथ कोई परामर्श हुआ।

ट्रम्प ने जनवरी में न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा था कि एक कमांडर-इन-चीफ के रूप में उनकी शक्ति “मेरी अपनी नैतिकता और मेरा विवेक” से निर्धारित होती है। उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे रोक सकता है केवल यही।’

वाद सभ्यता के गूढ़ विश्लेषक, दार्शनिक जुर्गेन हेबरमास युद्ध संबंधी टिप्पणी करने में असमर्थ रहे। अमेरिका और इजरायल के आक्रमण शुरू होने के दो सप्ताह बाद, 96 वर्ष की उम्र में 14 मार्च को उनका निधन हो गया। लेकिन इस युद्ध ने उदार लोकतंत्र के भविष्य को लेकर उनकी गहरी चिंताएं उजागर कीं, जिन्हें उन्होंने अपने पूरे जीवन में विश्लेषण और संरक्षण दिया। हेबरमास के अनुसार लोकतंत्र का सार ‘डिस्कोर्स’ यानी विचार और मूल्य के सतत विमर्श में निहित है।

उन्होंने ‘पब्लिक स्फीयर’ (सार्वजनिक क्षेत्र) की अवधारणा प्रस्तुत की, जहां नागरिक निर्णय लेने के लिए एकत्रित होते हैं। संवादात्मक क्रिया भाषा को सहयोगात्मक शक्ति बनाती है। उन्होंने लिखा, “सभी राजनीतिक शक्ति नागरिकों की संवादात्मक शक्ति से उत्पन्न होती है। एक आदर्श लोकतंत्र में सभी प्रश्न और योगदान बहस और वार्ता से उठाए जाते हैं और उससे निर्णय हासिल होता है।”

हेबरमास के लंबे और समृद्ध जीवन के अंत को त्रासदी नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित श्रद्धांजलियों ने लोकतंत्र की दुःखद दशा को उजागर किया। नवंबर में म्यूनिख में उन्होंने कहा था कि ट्रम्प की निरंकुश कार्यकारी शक्ति के विस्तार से अमेरिकी लोकतंत्र में विघटन आया है।

यदि आप किसी विरोधी विचार के धारक हैं तो आपका सोशल मीडिया फीड वही विचारविरोधी मान्यताओं से भर जाता है, जो केवल आपकी मान्यताओं की पुष्टि करते हैं और कभी चुनौती नहीं देते। इससे लोकतांत्रिक बहस असम्भव हो जाती है।

अमेरिका की निरंकुशता की ओर मोड़ ने हेबरमास के जीवन के अंत को अंधकारमय बना दिया, जबकि उन्होंने कहा था कि उनका जीवन राजनीतिक रूप से अनुकूल था। वह जीवन इतनी निचली स्थिति से शुरू हुआ था कि उठने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

हेबरमास का जन्म 1929 में जर्मनी में हुआ था और वे नाजी काल में बड़े हुए थे। वे हिटलर यूथ के सदस्य रहे और उनके पिता द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन सेना के अधिकारी थे। उन्होंने पश्चिमी जर्मनी में लोकतंत्र की मजबूत जड़ें और स्वतंत्र यूरोप के पुनर्गठन को देखा।

यह सुखद अंत अनिवार्य नहीं था, लेकिन सिद्धांतकार और तीव्र वक्ता के रूप में हेबरमास ने महान योगदान दिया। 1950 के दशक में उन्होंने पश्चिम जर्मनी में अपनी कैरियर की शुरुआत की, जब शैक्षणिक क्षेत्र में अभी भी पूर्व नाजियों का प्रभुत्व था।

नाजी शासन के सहयोग के बावजूद उन्होंने मार्टिन हाइडेगर के प्रभाव के खिलाफ जाकर थियोडोर एडोर्नो का मार्गदर्शन पाया, जो फ्रैंकफर्ट स्कूल के संस्थापक और नाजी काल से निर्वासित सामाजिक आलोचक थे। हेबरमास ने दूसरे पीढ़ी के नेतृत्व के रूप में फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय में अपने करियर बिताए।

एडोर्नो ने होलोकॉस्ट के बाद आधुनिक सभ्यता के प्रति आशा खो दी, जबकि हेबरमास ने पश्चिमी बौद्धिक परंपरा में स्वतंत्रता का स्रोत खोजा। यह खोज 1962 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर’ में शुरू हुई, जो उनकी सबसे चर्चित किताब है।

हेबरमास ने पाया कि आधुनिक जनमत की अवधारणा 18वीं शताब्दी के यूरोप के कॉफी हाउस, सैलून और पत्रिकाओं से विकसित हुई, जिसने आम जनता को बहस करने और शासकों के निर्णय पर टिप्पणी करने का अवसर दिया।

फ्रांसीसी क्रांति का आधार यही माहौल था, जिसने उन्हें राजनीतिक प्रेरणा दी। सार्वजनिक क्षेत्र का अर्थ दमन का अंत है ताकि विचार मात्र जनमत के बाध्यकारी अंतर्दृष्टि से छूए जा सकें, न कि किसी अन्य आधार पर।

फिर भी हेबरमास ने स्वीकार किया कि उदार लोकतांत्रिक आदर्श कभी पूर्णतया साकार नहीं हो सका। न 18वीं सदी के कुलीन पुरुषों के लिए खुला सार्वजनिक क्षेत्र, न ही 20वीं सदी में जब जनमत निष्क्रिय हो गई और प्रचार द्वारा प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा, “संपर्क माध्यमों द्वारा निर्मित दुनिया केवल दिखावटी सार्वजनिक क्षेत्र है।”

हेबरमास अकेले नहीं थे; वामपंथी चिंतकों ने उदारवाद को सिर्फ पूंजीवादी आवरण माना। लेकिन उन्होंने उदारवाद की यूटोपियन संभावनाओं में विश्वास रखा।

सचेत लोकतंत्र पूर्ण रूप से अस्तित्व में न हो, पर किसी भी अच्छी समाज की नींव इसके सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने 1992 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘बिट्वीन फैक्ट्स एंड नॉर्म्स’ में लिखा, “कानून की वैधता अंततः संवादात्मक व्यवस्था पर निर्भर करती है।”

नागरिकों को तार्किक बहस में भाग लेना चाहिए, स्वतंत्र रूप से विचार व्यक्त करना चाहिए और समस्याओं के सामूहिक समाधान खोजने चाहिए।

ट्रम्प को निरंकुश कहना हेबरमास के लिए सही था, लेकिन सोशल मीडिया ने उन्हें ‘स्ट्रांगमैन’ बना दिया है – उनका अनजान और अनिश्चित व्यवहार यह दर्शाता है कि उन्हें क्या करना है पता नहीं और उनकी कोई परवाह नहीं।

हेबरमास की बहस में गतिशील अध्ययन ने उन्हें राजनीतिक दर्शन से बहुत आगे तक ले गया। उनके बौद्धिक चर्चाएँ समाजशास्त्र, भाषाविज्ञान, मनोविज्ञान और सांस्कृतिक अध्ययन के साथ संवाद में थीं। उनका लेखन जर्मन दर्शन की तरह गहरा और जटिल था। फिर भी वे अपने काम को ‘डिस्कोर्स एथिक्स’ का जीवित उदाहरण मानते थे जहाँ ईमानदार और निरंतर वैचारिक आदान-प्रदान होता है।

वे मानते थे कि भाषा लोगों को लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क के लिए प्रतिबद्ध बनाती है। 1981 में उन्होंने ‘द थ्योरी ऑफ कम्युनिकटिव एक्शन’ में भाषा को केवल सत्य या असत्य की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि संवाद का आवश्यक माध्यम बताया।

हेबरमास ने कहा कि कोई भी वार्ता तभी सफल होती है जब उसे मान्यता देने वाला इसे स्वीकार करता है। यह निर्णय हमेशा संभावित आधार या कारण पर आधारित होता है। हमें कोई बात कहने वाला कट्टर और स्पष्ट कारण देना आवश्यक है, और जरूरत पड़ने पर उसे प्रस्तुत भी करना चाहिए।

उनका निष्कर्ष था कि ‘अनुनय’ (प्रेरणा) भाषा के उपयोग का मूल आधार है; मानव भाषा का अंतिम लक्ष्य लोगों के बीच समझदारी स्थापित करना है।

हम भाषा का उपयोग तर्कसंगत प्रेरणा के लिए करने के साथ-साथ आदेश या धमकी के लिए भी करते हैं। लेकिन हेबरमास के अनुसार केवल पुरस्कार या हानि पर आधारित सहमति असली सहमति नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण होती है।

सार्वजनिक बहस तभी वास्तविक होती है जब कोई प्रतिभागी वंचित ना हो, कोई विचार प्रतिबंधित ना हो और किसी पर दबाव ना हो। आज के युग में इस तरह की स्थितियां दुर्लभ हैं, फिर भी हम इस आदर्श की ओर बढ़ सकते हैं या उससे दूर हो सकते हैं।

बीसवीं सदी के मध्य में, उन्होंने ‘स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन’ में लिखा कि सार्वजनिक बहस के मुख्य अवरोध तकनीकी थे। रेडियो, टेलीविजन और बड़े समाचारपत्र जनता को विचार व्यक्त करने का मौका नहीं देते थे, जिससे एकतरफा संवाद होता और संपादित सामग्री शक्तिशाली के एजेंडे के अनुरूप होती।

लेकिन जीवन के बाद के वर्षों में तकनीक के विकास ने विपरीत समस्या उत्पन्न की। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने विचारों के बाजार को खोल दिया। हालांकि एक बेहतर विपरीत किसी लाखों के लिए आधिकारिक हो गया, वहीं समाचार नेटवर्क और पत्रिकाएं अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही हैं।

जब क्रूरता और संवेदनाहीनता राजनीतिक संयोजन बन जाती है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि तर्कपूर्ण बहस का युग, अर्थात् जुर्गेन हेबरमास का युग पूर्णतः समाप्त हो चुका है।

इंटरनेट को शुरू में वरदान माना गया था और कई लोग सोचते थे कि यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा। लेकिन आज विचारों की प्रचुरता लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों बन रही है?

हेबरमास ने 2023 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘अ न्यु स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर एंड डिलिबरेटिव पोलिटिक्स’ में इस प्रश्न का उत्तर खोजा है। उन्होंने लिखा है, ‘प्रिंट मीडिया ने सभी को पाठक बनाया, आज की डिजिटल दुनिया सभी को लेखक बना रही है।’

बहस के लिए गंभीरता की कमी के कारण सार्वजनिक बहस असंभव है। सच्ची बहस के लिए सत्य बोलने और दूसरों के दृष्टिकोण सुनने की ज़िम्मेदारी जरूरी है।

इंटरनेट ऐसा वातावरण पैदा नहीं कर रहा। समस्या केवल झूठ या गलत सूचना नहीं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र में विभाजन है, जिससे लोग एक-दूसरे की उपेक्षा करते हैं।

यदि आप किसी विरोधी विचार के समर्थक हैं तो सोशल मीडिया पर आपको केवल समान विचारधारा वाले ही मिलेंगे, जो आपकी मान्यताओं की पुष्टि करते हैं और चुनौती नहीं देते, जो लोकतांत्रिक बहस को असंभव बना देता है।

हेबरमास ने लिखा, ‘विवेकी राजनीति का मुख्य उद्देश्य हमारी मान्यताओं को सुधारना और समस्या का वास्तविक समाधान खोजने में सक्षम होना है।’ इसके लिए विरोध और व्याख्या जरूरी है, जो बिना संवाद के संभव नहीं।

सोशल मीडिया की चुनौती को उन्होंने शुरू में कम आंका था। यह केवल विभाजन नहीं, बल्कि रिक्तता और ऑनलाइन अस्तित्व की हल्केपन ने निराशावाद को बढ़ावा दिया है। टिकटक, ट्विटर जैसे प्लेटफार्मों पर ट्रोलिंग ज्यादा होती है, जहां क्या कहा जा रहा है उससे ज्यादा यह मायने रखता है कि कौन कह रहा है।

ट्रम्प को निरंकुश कहना हेबरमास के लिए सही था, लेकिन सोशल मीडिया ने उन्हें अस्थिर, तुच्छ और अकथनीय बना दिया है, जो न तो जानते हैं कि क्या कर रहे हैं और न ही परवाह करते हैं। वे अपने व्यवहार से लोगों और संस्थानों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

इसलिए ट्रम्प राजनीतिक सिद्धांत के लिए रहस्य बने हैं, लेकिन सोशल मीडिया के लिए सितारे हैं। कार्ल मार्क्स की बात लें तो, “जो भी ठोस है, वह हवा में विलीन हो जाता है।”

जब क्रूरता और जवाबदेही की अनुपस्थिति प्रभावी राजनीतिक संयोजन बन जाती है, तब स्पष्ट हो जाता है कि तर्कपूर्ण बहस का युग, अर्थात जुर्गेन हेबरमास का युग पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

(द एटलांटिक में प्रकाशित एडम किर्स के विचारों का भावानुवाद। कवि, आलोचक और सम्पादक एडम किर्स ‘द एटलांटिक’ और ‘द न्यू यॉर्कर’ के नियमित लेखक हैं, जिन्होंने ‘द पीपल एंड द बुक्स’ और ‘द डिस्कार्डेड लाइफ’ (कविता संग्रह) सहित 10 पुस्तकें लिखी हैं।)

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तर्कसंगत बहस के युग का अंत

समाचार सारांश

  • डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी जनता को सलाह दिए बिना ही ईरान पर हमला करने का निर्णय लिया, और कहा कि उनका शासन “मेरी अपनी नैतिकता और मेरा अपना अंतरमन” पर आधारित है।
  • दर्शनशास्त्री जुर्गेन हाबर्मास ने कहा कि लोकतंत्र की आत्मा जनता के संवाद और बहस में निहित होती है और सभी राजनीतिक शक्तियां नागरिकों की संचार क्षमता से जन्म लेती हैं।
  • हाबर्मास ने कहा कि सोशल मीडिया ने लोकतांत्रिक बहस को असंभव बना दिया है और ट्रम्प की अधिनायकवादी शैली ने अमेरिकी लोकतंत्र में बाधाएं उत्पन्न की हैं।

अमेरिकियों का संदिग्ध कारणों पर युद्धों में फंसने का लंबा इतिहास है। 1898 में, नौसेना विशेषज्ञों ने तनावपूर्ण विस्फोट को दुर्घटना माना, लेकिन “पिले प्रेस” ने स्पेन पर USS मेन डूबाने का आरोप लगाकर युद्ध का माहौल बनाया। इसी प्रकार, जॉर्ज डब्ल्यू. बुश प्रशासन ने इराक आक्रमण के लिए सद्दाम हुसैन को 9/11 आतंकवादी घटनाओं से जोड़ कर और विनाशकारी हथियार विकास के आरोप लगाए, जो बाद में गलत साबित हुए।

ईरान पर युद्ध करते समय डोनाल्ड ट्रम्प ने एक नया मानदंड स्थापित किया। उन्होंने पहली बार बिना किसी मीडिया झूठ या जनता की राय किसी से लिए युद्ध शुरू किया, क्योंकि अमेरिकी जनता की राय उनके लिए महत्वहीन थी। कांग्रेस के पदाधिकारियों, चिंतकों या नागरिक समाज को ईरान पर आक्रमण करने की कोई सलाह नहीं दी गई।

ट्रम्प ने जनवरी में न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि उनकी सत्ता “मेरी अपनी नैतिकता और मेरा अपना अंतरमन” पर आधारित है। उन्होंने कहा, “मुझे रोकने वाली एकमात्र चीज वही है।”

प्रसिद्ध दार्शनिक और नागरिक संवाद के गहन विश्लेषक जुर्गेन हाबर्मास ईरान युद्ध पर टिप्पणी नहीं कर पाए। वे मार्च 14 को 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया, जो अमेरिका और इज़राइल के आक्रमण शुरू करने के दो हफ्ते बाद की बात है। फिर भी, यह संघर्ष उनके जीवनभर के विश्लेषण और संरक्षण किए गए उदार लोकतंत्र के भविष्य को लेकर गहरी चिंता को दर्शाता है। हাবर्मास के अनुसार लोकतंत्र की मूल भावना “संवाद” में निहित है, अर्थात निरंतर विचार और मूल्य आधारित संवाद।

उन्होंने “सार्वजनिक क्षेत्र” की अवधारणा दी, जहां नागरिक निर्णय लेने के लिए एकत्रित होते हैं। संचारात्मक क्रिया भाषा को सहयोग की शक्ति बनाती है। उन्होंने लिखा, “सभी राजनीतिक शक्ति नागरिकों की संचारात्मक क्षमता से उत्पन्न होती है। आदर्श लोकतंत्र में सभी सवाल और योगदान बहस और बातचीत से आते हैं और उसके अनुसार निर्णय होते हैं।”

हाबर्मास का लंबा और फलदायक जीवन कोई त्रासदी नहीं था, लेकिन उनके निधन के बाद सम्मान ने लोकतंत्र की खराब स्थिति को उजागर किया। नवंबर में म्यूनिख में उन्होंने ट्रम्प के असीमित कार्यकारी अधिकार के विस्तार से अमेरिकी लोकतंत्र में आई बाधा पर दुःख व्यक्त किया था।

अगर आप असहमत विचार रखते हैं, तो आपके सोशल मीडिया में केवल वे विचार ही होते हैं जो आपकी अपनी मान्यताओं को पुष्ट करते हैं लेकिन चुनौती नहीं देते, जिससे लोकतांत्रिक बहस असंभव हो जाती है।

अमेरिका में अधिनायकवादी बदलाव ने हाबर्मास के जीवन को अंधकारमय बना दिया, जो अपनी राजनीतिक अस्तित्व को संकीर्ण सोच के अनुकूल मानते थे। उनका जीवन इतना पतन पर था कि उनका एकमात्र विकल्प ऊपर उठना था।

उनका जन्म 1929 में जर्मनी में हुआ था, जहां उन्होंने नाजी युग में पालन-पोषण किया। वे हिटलर यूथ के सदस्य थे और उनके पिता द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन सेना के एक अधिकारी थे। उन्होंने पश्चिमी जर्मनी में सुदृढ़ लोकतंत्र और स्वतंत्र यूरोप के पुनर्निर्माण को देखा।

यह परिणाम पूर्णतः बेहतर नहीं था, लेकिन उन्होंने एक सिद्धांतकार और तीव्र वक्ता के रूप में अहम योगदान दिया। उन्होंने 1950 के दशकों में पश्चिमी जर्मनी में अपनी करियर की शुरुआत की, उस समय भी पूर्व-नाजी प्रभाव शैक्षिक क्षेत्र में मौजूद था।

नाजी शासन के साथ सहयोग में, उन्होंने मार्टिन हाइडगर के प्रभाव के खिलाफ खड़े हुए और फ्रैंकफर्ट स्कूल के संस्थापक तथा नाजीकालीन निर्वासन में रहे सामाजिक आलोचक थियोडोर एडोर्नो से मार्गदर्शन प्राप्त किया। हाबर्मास ने दूसरे पीढ़ी का नेतृत्व किया और पूरा करियर फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय में बिताया।

एडोर्नो ने होलोकास्ट के बाद आधुनिक सभ्यता में निराशा व्यक्त की, लेकिन हाबर्मास ने पश्चिमी बौद्धिक परंपरा में स्वतंत्रता की खोज जारी रखी। यह खोज 1962 में प्रकाशित “सार्वजनिक क्षेत्र का संरचनात्मक रूपांतरण” पुस्तक से शुरू हुई, जो उनकी सबसे प्रशंसित कृति है।

हाबर्मास ने आधुनिक सार्वजनिक राय की अवधारणा 18वीं सदी के यूरोपीय कॉफी हाउस, सैलून और पत्रिकाओं में पाई, जिसने सामान्य नागरिकों को शासकों के निर्णयों पर बहस और टिप्पणी करने का अवसर दिया।

इस परिवेश ने फ्रांसीसी क्रांति की आधारशिला रखी और उन्हें राजनीतिक प्रेरणा दी। सार्वजनिक क्षेत्र ने उत्पीड़न के अंत को दिखाया ताकि विचार केवल सार्वजनिक समझ से ही आगे बढ़ें और किसी अन्य आधार पर नहीं।

लेकिन हाबर्मास स्वीकारते थे कि उदार लोकतांत्रिक आदर्श कभी पूर्णत: साकार नहीं हुए — न 18वीं सदी का खुला सार्वजनिक क्षेत्र जो सीमित पुरुष वर्ग के लिए था, न ही 20वीं सदी जब सार्वजनिक राय निष्क्रिय और प्रचार के तहत नियंत्रित थी। उन्होंने कहा, “संचार माध्यमों द्वारा निर्मित दुनिया केवल सार्वजनिक क्षेत्र की छाया मात्र है।”

हाबर्मास अकेले नहीं थे; वामपंथी चिंतकों ने उदारवाद को केवल पूंजीवादी आवरण माना। लेकिन वे उदारवादी यूटोपियन संभावनाओं में विश्वास करते थे।

जागरूक लोकतंत्र कभी पूर्णतः अस्तित्व में नहीं आया, लेकिन हर अच्छे समाज को इसके सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। 1992 की उनकी पुस्तक “तथ्यों और मान्यताओं के बीच” में उन्होंने लिखा, “कानून की वैधता अंततः संचारात्मक व्यवस्था पर निर्भर करती है।”

नागरिकों को तर्कसंगत बहस में हिस्सा लेना चाहिए, स्वतंत्रता से विचार व्यक्त करना चाहिए और पारस्परिक समझ पर आधारित समाधान खोजने चाहिए।

हाबर्मास ने ट्रम्प को अधिनायकवादी बताया, और सही था, लेकिन सोशल मीडिया ने उन्हें “मजबूत व्यक्ति” बना दिया — जिसे पता नहीं कि क्या करना है, अविवेकपूर्ण और परिणामों के प्रति लापरवाह।

हाबर्मास के सिद्धांत में संवाद की गति की सीमा केवल राजनीतिक दर्शन तक सीमित नहीं थी। उन्होंने समाजशास्त्र, भाषाविज्ञान, मनोविज्ञान और सांस्कृतिक अध्ययन से भी जुड़ाव रखा। उनकी गहरी और जटिल शैली के बावजूद उन्होंने अपने काम को “संवाद नैतिकता” का जीवित उदाहरण कहा, जिसमें ईमानदारी और निरंतर बौद्धिक आदान-प्रदान होता है।

उनका विश्वास था कि भाषा लोगों को लोकतांत्रिक तर्क के लिए प्रतिबद्ध करती है। 1981 की “संचारात्मक क्रिया का सिद्धांत” में उन्होंने भाषा को केवल सत्य या असत्य अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अच्छा संवाद का एक आवश्यक माध्यम माना।

हाबर्मास ने कहा कि भाषण कार्य तभी सफल होता है जब श्रोता उसे स्वीकार करें, जो संभावित कारणों और आधार पर आधारित हो। भाषणकर्ता प्रभावशाली व स्पष्ट कारण प्रस्तुत कर सकें।

उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “प्रेरणा” भाषा की मूलभूत आधार है; मानव भाषा का लक्ष्य पारस्परिक समझ है।

भाषा आदेश और धमकी में भी उपयोग होती है, लेकिन हाबर्मास के अनुसार पुरस्कार या दंड पर आधारित सहमति सच्ची सहमति नहीं है, यह आत्मसमर्पण है।

सार्वजनिक बहस तभी वास्तविक होगी जब कोई सहभागी बाहर न रखा जाए, कोई विचार प्रतिबंधित न हो और कोई दबाव न हो। आज राजनीति में ऐसी स्थिति दुर्लभ है, फिर भी हम हमेशा इस आदर्श की ओर या इससे दूर जा सकते हैं।

20वीं सदी के मध्य में जब उन्होंने “संरचनात्मक रूपांतरण” लिखा तब सार्वजनिक बहस के मुख्य अवरोध तकनीकी थे। रेडियो, टेलीविजन और बड़े पत्रिकाओं ने लोगों को भागीदारी से वंचित कर एकतरफा संचार बना दिया।

लेकिन बाद के वर्षों में तकनीकी प्रगति ने स्थिति उलट दी। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने विचारों के बाजार को खोल दिया। एकल स्ट्रीमर लाखों के लिए अधिकारिक बन सकता था जबकि समाचार चैनल और पत्रिकाएं अस्तित्व के लिए संघर्ष करती रहीं।

जब राजनीतिक निर्दयता और असंवेदनशीलता मिलती है, तब स्पष्ट होता है कि तर्कसंगत बहस का युग — यानी जुर्गेन हाबर्मास का युग — पूरी तरह समाप्त हो गया है।

इंटरनेट को शुरू में वरदान माना गया था और कईयों ने सोचा कि यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा। लेकिन आज विचारों की प्रचुरता लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों बन गई?

हाबर्मास ने इस प्रश्न को अपनी 2023 की पुस्तक “सार्वजनिक क्षेत्र का नया संरचनात्मक रूपांतरण और विचारशील राजनीति” में समीक्षा किया। उन्होंने लिखा, “प्रिंट ने सभी को पाठक बनाया; आज की डिजिटलीकरण सभी को लेखक बना रही है।”

गंभीर संलग्नता के बिना सार्वजनिक संवाद असंभव है। सच्चा बहस सच्चाई बोलने और दूसरों के दृष्टिकोण सुनने के कर्तव्य की मांग करता है।

इंटरनेट ऐसा माहौल प्रदान नहीं करता। समस्या केवल झूठी जानकारी और गलत संदेश नहीं है; सार्वजनिक क्षेत्र समूहों में विभाजित है जो एक-दूसरे की अनदेखी करते हैं।

जब आप विभिन्न विचार प्रकट करते हैं, तो आपका सोशल मीडिया केवल उन विचारों से भरा होता है जो आपकी मान्यताओं को पुष्टि करते हैं, लेकिन कभी चुनौती नहीं देते, जिससे लोकतांत्रिक बहस असंभव होती है।

हाबर्मास ने लिखा, “तर्कसंगत राजनीति का मुख्य लक्ष्य हमारे विश्वासों में सुधार करना और समस्या समाधान के प्रयासों का मार्गदर्शन करना है।” इसके लिए विवाद और व्याख्या आवश्यक है, जिसके बिना संवाद संभव नहीं है।

उन्होंने प्रारंभ में सोशल मीडिया की चुनौती को कम आंका था। यह केवल विभाजन नहीं बढ़ाता, बल्कि ऑनलाइन अस्तित्व की नश्वरता और तुच्छता के द्वारा निहिलिज्म को भी प्रोत्साहित करता है। टिकटॉक और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म पर ट्रोलिंग होती है जहां “किसने क्या कहा” मायने रखता है, “क्या कहा गया” नहीं।

हाबर्मास ने ट्रम्प को अधिनायकवादी कहा तो सही था, लेकिन सोशल मीडिया ने उन्हें अस्थिर और संकीर्ण मानसिकता वाला बताया — जो अपने कार्यों में अनिश्चित और परिणामों के प्रति लापरवाह है। वे लोगों और संस्थानों को नुकसान पहुँचाते हैं, फिर भी कुछ लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते।

यह ट्रम्प को राजनीतिक सिद्धांत में रहस्य बनाता है, लेकिन सोशल मीडिया के लिए सितारा। कार्ल मार्क्स के उद्धरण के साथ कहें तो, “सभी ठोस बातें हवा में घुल जाती हैं।”

जब निर्दयता और जिम्मेदारीहीनता प्रभावशाली राजनीतिक संयोजन बनती है, तब स्पष्ट होता है कि तर्कसंगत बहस का युग — जुर्गेन हाबर्मास का युग — पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

(एडम किर्सच द्वारा द एटलान्टिक में प्रकाशित लेख से रूपांतरण। एडम किर्सच कवि, आलोचक, संपादक हैं और द एटलान्टिक तथा द न्यूयोर्कर के नियमित सहयोगी हैं। वे 10 पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें कविता संग्रह ‘द पीपल एंड द बुक्स’ और ‘द डिस्कार्ड लाइफ’ शामिल हैं। )

कांग्रेस संसदीय दल के नेता आङ्देम्बे ने तमोर कॉरिडोर के निर्माणाधीन पुलों का निरीक्षण किया

२२ वैशाख, काठमाडौं। प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस संसदीय दल के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे ने तमोर कॉरिडोर सड़क खंड में निर्माणाधीन पुलों का स्थलगत निरीक्षण किया है। निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि सड़क का कालोपत्रण पूरा हो चुका है, लेकिन पुलों का निर्माण अपेक्षाकृत धीमी गति से हो रहा है, जिसके कारण उन्होंने निर्माण कंपनी की कार्यशैली पर असंतोष जताया। वर्षा ऋतु में बाढ़ के कारण वाहनों के आवागमन में निरंतर बाधा उत्पन्न होने की समस्या को देखते हुए उन्होंने निर्माण कार्य की गति तेज करने का निर्देश दिया है।

नेता आङ्देम्बे ने कहा, ‘बजट के लिए पहल करने मैं हूँ, लेकिन यहां काम तेजी से पूरा होना चाहिए।’ पूर्वी पहाड़ों को तराई से जोड़ने वाले अहम मार्ग तमोर कॉरिडोर को ‘लाइफलाइन सड़क’ के रूप में जाना जाता है। हालांकि, लखुवा, नावाखोला, रगुवा और छरु नदियों पर पुल निर्माण में हो रही देरी के कारण वर्षा के मौसम में वाहनों के आवागमन बाधित होता रहा है। नदी में पानी बढ़ने से वाहन बहने या डूबने का खतरा भी स्थानीय लोगों ने व्यक्त किया है।

लोगों द्वारा वर्षों से उठाए जा रहे इस मुद्दे के प्रति गंभीरता दिखाते हुए नेता आङ्देम्बे ने पुल निर्माण की जिम्मेदारी वाली कंपनी के प्रतिनिधियों को कार्य में देरी न करने की चेतावनी दी है। उन्होंने आवश्यक बजट प्रबंधन के लिए खुद पहल करने की प्रतिबद्धता भी जताई है।

इरान के यूएई निशानेबाजी पर अमेरिका ने किया ‘जवाबी हमला’ का दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में अमेरिका द्वारा तेज गति वाली ७ इरानी ‘फास्ट बोट’ पर आक्रमण करने की बात कही है। वाशिंगटन ने कहा है कि यह कार्रवाई खाड़ी में फंसे जहाजों को इस बंद-सी जलमार्ग से बाहर निकालने के लिए की गई। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और दक्षिण कोरिया ने सोमवार को अपने जलयान पर हुए हमलों की सूचना दी थी। इरान की कार्रवाई के बाद यूएई ने फुजैरा के ईंधन पोर्ट पर आग लगने की पुष्टि की है। शिपिंग कंपनी मेर्स्क ने बीबीसी को बताया कि अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा में उनका एक अमेरिकी ध्वजवाहक जलयान सफलतापूर्वक स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से बाहर निकल सका है। ट्रम्प ने अमेरिकी सुरक्षा उपायों को “प्रोजेक्ट फ्रीडम” नाम दिया है।

इरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि वहां हुई घटनाओं ने “राजनीतिक संकट का कोई सैन्य समाधान नहीं होने” को स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, “प्रोजेक्ट फ्रीडम दरअसल प्रोजेक्ट गतिरोध है।” मेर्स्क ने बताया कि उनका एक व्यावसायिक जलयान बिना किसी घटना के अपनी यात्रा पूरी कर चुका है, चालक दल के सदस्य स्वस्थ और सुरक्षित हैं। अमेरिका और इजरायल ने फरवरी में इरान पर हवाई हमले किए थे, जिसके बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज काफी हद तक बंद रहा है।

तेहरान ने जवाबी कार्रवाई में इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को अवरुद्ध कर दिया है, जिससे विश्व के २० प्रतिशत तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन होता है। अप्रैल की शुरुआत में अमेरिका और इरान के बीच लड़ाई विराम की घोषणा के बाद, इरान ने खाड़ी के देशों जैसे संयुक्त अरब अमीरात पर ड्रोन और मिसाइल हमले बंद कर दिए थे। लेकिन तब से इस जलमार्ग से माल ढुलाई करने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम रही है। अमेरिका ने भी इरानी बंदरगाहों पर पाबंदी लगा रखी है। ट्रम्प ने कहा, “हमने ७ छोटे नावों को निशाना बनाया है, जिन्हें वे फास्ट बोट कहते हैं। अब उनके पास वही बचे हैं।”

अमेरिकी सेना ने आक्रमण के लिए हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया है। इस हमले के बाद फंसे जहाज को इरान की सरकारी मीडिया ने बाद में खारिज कर दिया और ट्रम्प की स्पीड बोट पर आक्रमण की बात को गलत ठहराया है। तास्निम समाचार एजेंसी ने सैन्य सूत्रों के हवाले से बताया कि दो छोटे मालवाहक जहाजों पर हमला हुआ जिसमें ५ आम नागरिकों की मौत हुई है। इससे पहले अमेरिका ने सोमवार को बताया था कि उसके नौसेना और अमेरिकी ध्वजवाहक व्यावसायिक जहाजों ने इस जलमार्ग को पार किया है।

इरान ने इस दावे को “पूरी तरह गलत” बताया है और कहा है कि उसकी सेना ने अमेरिकी युद्धपोतों को चेतावनी गोलियां चलाई हैं, जिसे अमेरिकी सेना ने नकार दिया है। मेर्स्क के अनुसार, फरवरी में अमेरिका और इजरायल ने इरान पर हमला किया था, तब उनकी अमेरिकी ध्वजवाहक जहाज अलायंस फेयरफैक्स खाड़ी में फंसा हुआ था। इसके बाद अमेरिकी सैन्य सुरक्षा में वह जहाज स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से बाहर निकल पाया। कंपनी ने कहा, “अमेरिकी सैन्य सहायता ने इस जहाज को फारस की खाड़ी क्षेत्र से बाहर निकलने का अवसर दिया।”

इस बीच, यूएई के विदेश मंत्रालय ने बताया है कि सरकारी स्वामित्व वाली तेल कंपनी एडेनोक के एक टैंकर की स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में दुर्घटना हो गई है। दक्षिण कोरिया ने भी संयुक्त अरब अमीरात के नजदीक अपने एक जहाज पर विस्फोट की सूचना दी है। यूएई के अधिकारियों ने कहा है कि उन्हें १२ बैलिस्टिक मिसाइल, ३ क्रूज मिसाइल और ४ ड्रोन का सामना करना पड़ा। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, फुजैरा के प्रमुख तेल बंदरगाह पर हुए हमले में बड़ी आग लगी है, जिसमें ३ लोग घायल हुए हैं। अबू धाबी ने इस हमले को “खतरनाक तनाव” करार देते हुए कहा है कि वे प्रतिक्रिया देने का पूरा अधिकार रखते हैं। इरान की सरकारी टेलीविजन ने एक अनाम सैन्य अधिकारी के हवाले से कहा है कि इरान की यूएई को निशाना बनाने की कोई योजना नहीं है।

५० वर्षपछि भारतका कुनै पनि राज्यमा रहेन वामपन्थी सरकार, केरलमा कांग्रेसको जित

५० वर्षों के बाद भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं, केरल में कांग्रेस की जीत

२२ वैशाख, काठमाडौं। ५० वर्षों के बाद पहली बार भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार का अस्तित्व नहीं रहेगा। वामपंथी दलों का अंतिम मजबूत गढ़ माने जाने वाले केरल भी इस बार उनकी पकड़ से बाहर हो गया है। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने केरल राज्य में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन को १० वर्षों बाद फिर सत्ता में ला दिया है। कुल १४० सीटों वाले केरल में कांग्रेस पार्टी अकेले ही ६३ सीटें जीत गई है। कांग्रेस के सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने २२ सीटें हासिल की हैं जबकि अन्य सहयोगी दलों ने १७ सीटें जीती हैं। दूसरी ओर, वामपंथी दलों ने केवल ३५ सीटें जीत पाई हैं। इससे केरल में वामपंथी सत्ता गंवाने की स्थिति निश्चित हो गई है।

केरल में वर्ष २०१६ से २०२६ तक दो कार्यकाल तक वामपंथी सरकार रही है। केरल खो जाने के बाद भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी दल की सरकार नहीं रहने की स्थिति बन गई है, ऐसा भारतीय मीडिया ने बताया है। समाचार एजेंसी आईएएनएस के अनुसार, १९७० के दशक के बाद पहली बार ऐसा होगा जब भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं होगी। वर्ष १९७७ में पश्चिम बंगाल में सीपीआई-एम की सरकार बनी थी, जो २०११ तक चली। उसके बाद राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी। हालिया विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस केवल ८१ सीटों तक सीमित रही, जबकि भाजपा ने २०६ सीटें हासिल कीं। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ने केवल २ सीटें जीतीं। इसी प्रकार, १९९८ से २०१८ तक त्रिपुरा में भी लेफ्ट फ्रंट की सरकार थी। २०१८ में वह राज्य भी भाजपा के नियंत्रण में आ गया था।

भैंस चराने क्षेत्र से पर्यटन स्थल तक की यात्रा

२२ वैशाख, इलाम। इलाम के पर्यटन स्थल अंतु पोखरी चार दशक पहले भैंस चराने का क्षेत्र था। २०४० साल तक यहां चार गांव के लोग भैंस चराते थे। एक तरफ पानी की कमी थी। हालांकि अंतु पोखरी कभी सूखा नहीं करता था। आसपास घर नहीं थे। जंगल भी नहीं था। लेकिन दिन में भी यहाँ सूना सन्नाटा होता था। उस समय दिन में भी अंतु पोखरी के आसपास ऐसा था, लेकिन अब वहां मध्यरात्रि तक रोशनी रहती है। ‘हम जब बच्चे थे तब २०-२२ भैंस चराई थी। अंतु डांडा, बुधेडांडा, उनियुटार, तकपत, छिरुवा की भैंसों को चराने और पानी पी कराने के लिए यहां लाया जाता था,’ स्थानीय खगराज घिमिरे ने बताया, ‘दोपहर के बाद अंधेरा हो जाता था। लोग चलने से डरते थे। भैंस चराने वाले लोग ढाप पोखरी (अंतु पोखरी का पुराना नाम) में पानी पीकर समय पर भैंसों को गोठ ले जाते थे।’ उस समय काशीनाथ घिमिरे (खगराज के पिता), तारानिधि घिमिरे, तीलविक्रम नेम्बांग जैसे कुछ सीमित घर थे, जो पोखरी से काफी दूर थे। सड़क नहीं थी, केवल पगडंडी। लेकिन अब वही जगह विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन चुकी है। पर्यटक रोज़ाना ८०० से २००० तक नाव सैर करने और फिशिंग के लिए आते हैं। शाम से लेकर मध्यरात्रि तक संगीत चलता है। खाना-पीना, नाच-गाना, कैम्प फायर करना अंतु की संस्कृति का हिस्सा बन गया है।

भैंस चराने वाले क्षेत्र से पर्यटन स्थल बनने की प्रक्रिया २०४० साल से शुरू हुई। उस समय कृष्णप्रसाद भट्टarai जिला पंचायत अध्यक्ष थे। जिला पंचायत ने २० हजार रुपए देने के बाद पोखरी संरक्षण अभियान शुरू किया। स्थानीय लोग भी संरक्षण में जुटे। ‘पोखरी के पूर्व और पश्चिम की ओर दीवार बनाई गई। पानी इकट्ठा किया गया। सफाई की गई,’ खगराज ने बताया। ‘२०५९ मंसिर २७ को जिला प्रशासन कार्यालय में अंतु पर्यटन विकास केन्द्र संस्था पंजीकृत हुई। उसी संस्था के नेतृत्व में २०६२/६३ में नेपाल सरकार ने ५५ हजार तथा बाद में १ लाख ७० हजार रुपए बजट दिया। इससे दीवार बनाने और पानी जमा करने का काम और बढ़ा।’ पचास के दशक से स्थानीय लोग इस जगह को पर्यटन स्थल बनाने में जुटे रहे। पोखरी बनने के बाद स्थानीय लोग मिलकर पहले भारत के मिर्मक से नाव किराए पर लाए। बाद में कोलकाता जाकर दो नाव खरीदीं और संचालन शुरू हुआ। २०६२/६३ में तत्कालीन सभामुख सुवासचन्द्र नेम्बांग ने परेवा उड़ाकर पोखरी में नाव संचालन शुरू किया। उस समय नाव समिति चला रही थी, अब नगरपालिका ने निवेश बढ़ाकर संचालन संभाला है और अच्छा आय अर्जित कर रही है।

संघीय व्यवस्था के बाद स्थानीय सरकार की नजर अंतु पर पड़ी। नगरपालिका ने अंतु पोखरी और अंतु डांडा के आधारभूत विकास, संरक्षण और सौंदर्यीकरण पर लगभग ५ करोड़ रुपए खर्च किए हैं, पूर्व प्रमुख रणबहादुर राई ने बताया। ‘पोखरी के आसपास चलना मुश्किल था, कीचड़ भरा होता था। पर्यटक कीचड़ की वजह से पोखरी में जाना पसंद नहीं करते थे। खास चहल-पहल नहीं थी,’ पूर्व प्रमुख राई ने कहा। ‘आसपास ट्रैक बनाया गया, लाइट लगाई गई। अब यह एकीकृत स्थल के रूप में विकसित हो रहा है। २०७४ में जब हम जनप्रतिनिधि बने थे तब कटेज और होमस्टे कम थे, अब बड़े होटल बन गए हैं। अंतु में हमने लगभग ५ करोड़ खर्च कर पर्यटन हब बनाया है।’ पोखरी से ऊपर अंतु डांडा है, जहां से सूर्योदय देखा जाता है। अंतुपोखरी और अंतु डांडा पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण हैं।

२०७४ में अंतु डांडा तक सड़क नहीं थी। ‘छिपिटार से अंतु तक के लिए रास्ता था, पर सड़क विभाग ने भंञ्ज्यांग (पोखरी से नीचे) तक सड़क बनाई और पैसे वापस लौटाने की धमकी दी। जब हम स्थानीय सरकार में आए तो कहा कि बिना सड़क के व्यू टावर तक नहीं पहुंचा जा सकता, अतः रास्ता ऊपर पहुंचाया गया,’ उन्होंने बताया। ‘अंतु डांडा का टावर अव्यवस्थित था। संघीय और स्थानीय सरकार के समन्वय से व्यवस्थित बनाया गया। खेल मैदान से डांडा पहुंचने वाला रास्ता कीचड़ भरा था, उसका सोलिंग और ग्रेवेल किया गया। अब पर्यटक आसानी से ऊपर पहुंचते हैं।’ अंतु के अधिकांश क्षेत्रों में बिजली की व्यवस्था है। पहले पर्यटक टिकट से सालाना आय केवल १ लाख रुपए थी, मगर कूड़ा ज़्यादा था। ‘आंतरिक राजस्व बढ़ाने के लिए नगरपालिका ने अपने कर्मचारी रखे और वार्षिक ५६ लाख रुपए तक राजस्व जुटाया। पर्यटन मेले आयोजित किए और प्रचार-प्रसार व्यापक हुआ,’ प्रमुख राई ने कहा। वर्तमान में संघीय सरकार के अधीन शहरी और भवन निर्माण आयोजन अंतु के सुंदरता विकास का काम कर रहा है। आयोजन के सब-इंजीनियर प्रकाश चापागाईं ने बताया कि वे सौंदर्यीकरण, द्वितीय गेट से आने वाले रास्ते के नाली निर्माण, फुटपाथ बनाना, घेराबंदी और सडक विस्तार का कार्य कर रहे हैं। पर्यटक अब अंतुपोखरी के आसपास कई घंटे बिताते हैं, स्थानीय व्यवसायी बताते हैं।

पर्यटन व्यवसायी संघ के अध्यक्ष रुद्र घिमिरे के अनुसार, अब पर्यटकों की संख्या बढ़ गई है। ‘दिन में ८०० से २००० पर्यटक आते हैं। अंतु पर्यटन व्यवसायी संघ में होटल, कटेज और होमस्टे के ११० इकाई हैं। सामुदायिक होमस्टे ५० हैं और नियमित सेवा देने वाले ३५ हैं,’ उन्होंने कहा, ‘संघ के होटल में ३१० लोग प्रत्यक्ष रोजगार पाते हैं। चाय बागान के बीच सुंदर कटेज, होमस्टे, नौका सैर, मौसमी मछली पकड़ना, घुड़सवारी प्रमुख आकर्षण हैं। अंतु पोखरी में चार नाव चलती हैं, एक नाव में चार लोग बैठते हैं। एक बार पोखरी सैर का टिकट ५० रुपए है जो नगरपालिका की आमदनी है। दिन भर नाव खाली नहीं रहती। सूर्योदय से सूर्यास्त तक की सैर होती है।

अंतु डांडा सूर्योदय देखने के लिए लोकप्रिय है। पर्यटक एक दिन पहले आकर अंतुपोखरी घुमते हैं, रात तक नाच-गाना करते हैं और अगली सुबह सूर्योदय का आनंद लेते हैं। मेची राजमार्ग के कन्याम स्थित छिपिटार से अंतु का रास्ता अलग होता है, जो लगभग ११ किलोमीटर दूर है। सड़क कालीन है। जिप, कार, वैन, मोटरसाइकिल से कन्याम से अंतु पहुंचा जा सकता है। अंतु का सूर्योदय भदौ के अंत में शुरू होता है और मौसम साफ होने पर पुष–माघ और वैशाख तक चलता है। यहां से सूर्योदय का दृश्य मनमोहक होता है। यहां हर साल सैकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक सूर्योदय देखने आते हैं। अंतु पूर्वी नेपाल का व्यस्त पर्यटन स्थल बन गया है। यहां से उत्तर में हिम श्रृंखला, कोणधारी धुपी-सल्ला, झुम्का-झुम्का इलायची, मौसमी फल और अन्य फसलें सजावट करती हैं। यहां से झापा, कन्याम, भारत के दार्जिलिंग, मिरिक, सिलीगुड़ी जैसी बाज़ारों की झलक महसूस होती है। गर्म इलाकों जैसे झापा, मोरंग, सुनसरी, सप्तरी से पर्यटक यहां आराम के लिए आते हैं। पश्चिम बंगाल के सैकड़ों पर्यटक यहां सालाना आते हैं, दो-चार दिन ठहरते हैं। तराई के अधिक गर्मी के समय यहां के प्राकृतिक एयर कंडीशन का लाभ उठाने वालों की भीड़ रहती है। पश्चिम नेपाल और पश्चिम बंगाल के अधिक पर्यटक आते हैं। कुछ स्कूल के विद्यार्थी समूह भी अध्ययन भ्रमण पर यहां आते हैं।

सूर्योदय नगरपालिकाएं पर्यटन से आर्थिक समृद्धि की ओर अग्रसर है, नगरपालिका प्रमुख दुर्गा कुमार बराल ने बताया। ‘अंतु और कन्याम ही नहीं, यहां के हर वार्ड और गांव पर्यटन के लिए उपयुक्त हैं। कृषि उत्पाद, जड़ी-बूटियां, विलुप्त रेडपांडा, धार्मिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक स्थल सूर्योदय के पर्यटन स्थल हैं। कोशी प्रदेश सरकार ने इसे पर्यटन नगर घोषित किया है। अंतु और कन्याम हमारे प्रमुख पर्यटन स्थल हैं, लेकिन हम अन्य जगहों को भी पर्यटन में विकसित करेंगे। हमारी आर्थिक समृद्धि का प्रमुख आधार पर्यटन है,’ उन्होंने कहा।

फिल्म से राजनीतिक नायकत्व तक का सफ़र

२२ वैशाख, काठमाडौं । भारत के दो बड़े दलों के बीच लगातार सत्ता परिवर्तन हो रहे तमिलनाडु की राजनीति में इस बार एक नई ताकत तीव्र गति से उभर रही है। अभिनेता सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व में राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देते हुए इस दल ने सत्ता की बागडोर संभालने का मजबूत संकेत दिया है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आते ही तमिलनाडु ने देश की राजनीति में नए नेतृत्व और वैकल्पिक शक्ति का संदेश दिया है। पिछले चुनावी रुझानों को देखते हुए विजय के तमिलनाडु के आगामी मुख्यमंत्री बनने की संभावना प्रबल दिख रही है। दशकों से दो मुख्य क्षेत्रीय दलों के नियंत्रण में रहने वाली तमिलनाडु की राजनीति में इस परिणाम को ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। जिस विजय की फिल्म ‘जननायक’ को प्रदर्शन पर रोक लगी थी, वही विजय मुख्यमंत्री बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि उनकी फिल्म प्रदर्शित नहीं हो सकी, लेकिन ‘फर्स्ट रोअर’ नामित उस ट्रेलर में मुद्रित दो पंक्तियों ने आम जनता का मन जीत लिया था। उस ट्रेलर में विजय ने कहा था, ‘मैं आ रहा हूँ और वापस जाने का मेरा कोई इरादा नहीं है।’ उनकी यही अडिग संकल्प शक्ति आज उन्हें राजनीतिक सफलता के करीब लाया दिख रहा है।

सन् २०२४ के फ़रवरी २ को निर्वाचन आयोग में पंजीकरण के लिए आवेदन देने वाली ‘तमिलग वेत्री कझगम’ (टीवीके) को उसी वर्ष ८ सितंबर को आधिकारिक मान्यता मिली थी। गठन के मात्र दो वर्षों के भीतर यह पार्टी अब राज्य में सरकार बनाने की काबिल स्थिति में पहुंच गई है। तीन दशक से तमिल फिल्म उद्योग में सुपरस्टार के रूप में स्थापित ५१ वर्षीय विजय ने अपने करियर के शिखर पर अभिनय छोड़कर पूर्णकालिक राजनीति में प्रवेश किया है। अपने रैलियों में वे बार-बार कहते रहे हैं कि वे सब कुछ त्याग कर केवल जनता की सेवा के लिए चुनावी मैदान में उतरे हैं। प्रचार में तकनीक के अप्रतिम उपयोग ने विजय के चुनावी अभियान को बेहतरीन बनाते हुए खूब चर्चा बटोरी। उन्होंने चुनावी सभाओं में ‘होलोग्राम’ तकनीक का व्यापक उपयोग किया, जिसे साल २०२४ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार प्रयोग किया था। मोदी ने बाद में इसका कम उपयोग किया, लेकिन विजय ने तमिलनाडु के दूर-दराज के गांवों में होलोग्राम के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कर मतदाताओं के बीच खास क्रेज पैदा किया। जहां वे शारीरिक रूप से जा नहीं पाते थे, वहां वे होलोग्राम के माध्यम से पहुंच कर जनता से संवाद करते थे, जो बहुत प्रभावशाली साबित हुआ। तकनीक के साथ-साथ विजय ने फिल्म क्षेत्र की ‘बॉडी डबल’ अवधारणा को भी प्रचार में अपनाया। फिल्म के जोखिमपूर्ण दृश्यों में इस्तेमाल की जाने वाली जैसी दिखने वाली शख्सियतों को उन्होंने चुनावी मैदान में उतारा, जिससे मतदाता इसे अपने बीच विजय की मौजूदगी के रूप में महसूस करने लगे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने ही स्वरूप के ‘मैनिकिन’ का भी प्रयोग किया। निर्वाचन आयोग द्वारा २२ जनवरी २०२६ को प्रदत्त ‘सिठी’ (सीटी) चिन्ह को जनता तक पहुंचाने के लिए उन्होंने होलोग्राम और ऑडियो के प्रभावशाली संयोजन का सहारा लिया।