समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा के रूप में।
- नेपाली कांग्रेस ने चुनाव में पराजय का कारण सदैव चली आ रही विसंगतियों का भार लेकर चुनाव में प्रवेश करते समय विशेष महामहाधिवेशन के विरोधी समूहों द्वारा किए गए असहयोग को बताया है, इसकी व्याख्या उपसभापति विश्वप्रकाश शर्मा ने की।
- शर्मा के अनुसार कांग्रेस की पराजय के कारण पार्टी के आंतरिक गुटबंदी, पुरानी संगठनात्मक संरचना, सोशल मीडिया के एल्गोरिदम, गठबंधन का प्रभाव तथा नागरिक असंतोष प्रमुख हैं।
- उपसभापति शर्मा ने स्पष्ट किया कि सभापति गगन थापा को इस्तीफा नहीं देना चाहिए और नए नेतृत्व से तुरंत विजय की अपेक्षा करना न्यायसंगत नहीं है।
६ चैत, काठमाडौं । नेपाली कांग्रेस की चुनाव में पराजय का मुख्य कारण विद्यमान विसंगतियों के बोझ के साथ चुनाव में प्रवेश करते समय विशेष महामहाधिवेशन का विरोध कर रहे समूहों द्वारा किया गया असहयोग माना गया है, जो प्रारंभिक विश्लेषण में सामने आया है।
चुनाव के बाद केंद्रीय समिति की पहली बैठक में उपसभापति विश्वप्रकाश शर्मा ने चुनावी पराजय का प्रारंभिक मूल्यांकन प्रस्तुत किया। उन्होंने पार्टी द्वारा अपेक्षित परिणाम न मिलने के २७ प्रमुख कारणों का विश्लेषण किया।
सभापति गगन थापा के दो दिन पहले इस्तीफा देने के कारण उनकी अनुपस्थिति में उपसभापति शर्मा ने बैठक की अध्यक्षता की। शर्मा के अनुसार पार्टी की पराजय में ‘साइलेंस किलिंग’ और ‘सैबोटेज’ दोनों का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवारों को पराजित करने के लिए पार्टी के एक पक्ष का इशारा करते हुए नाम नहीं लिया।
शर्मा ने आरोप लगाया कि जिन नेताओं ने उम्मीदवार बनने की इच्छा जताई पर टिकट न मिलने के कारण गंभीर असहयोग किया। पूर्वसभापति शेरबहादुर देउवा भी उम्मीदवार बनने का प्रयास करने के बावजूद टिकट नहीं पाने वाले और पूर्व संस्थान के नेताओं द्वारा अपने दल के उम्मीदवारों को पराजित करने में भूमिका निभाने की बात विश्लेषकों ने विशेष महामहाधिवेशन समर्थकों के तौर पर बताई है।
शर्मा ने असहयोग के दूसरे पक्ष पर कहा, ‘विशेष महामहाधिवेशन का विरोध करना एक व्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन रूख चिन्ह के उम्मीदवारों को समर्थन न देना विशेष महामहाधिवेशन के विरोध का बहाना नहीं हो सकता। जहां कोई प्रत्याशी लगातार चुनाव लड़ता है वहां दूसरे उम्मीदवार को सहयोग करना सामान्य नैतिक जिम्मेदारी है।’
कुछ नेताओं ने ‘साइलेंस किलिंग’ द्वारा मौन रहते हुए भूमिका निभाई, जिसका उल्लेख शर्मा ने किया। पूर्वसभापति देउवा, कृष्णप्रसाद सिटौला, प्रकाशमान सिंह जैसे नेताओं पर असहयोग का आरोप लगाया गया है, जो विशेष महामहाधिवेशन समर्थकों की समझ में है।
शर्मा का कहना है कि जो लोग कांग्रेस के उम्मीदवारों को पराजित करने में भूमिका निभाते हैं, उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग तत्परता के साथ ‘सैबोटेज’ के कार्यों में लगे हैं। इससे पार्टी को ही नहीं, संबंधित व्यक्तियों के भविष्य की राजनीति पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा है। मौनता और निष्क्रियता पर नैतिक प्रश्न उठ रहे हैं और अनुशासनात्मक जांच जारी है।’
चुनाव में अपेक्षित परिणाम न मिलने के मूल कारणों में विशेष महामहाधिवेशन के बाद पार्टी में समय की कमी के कारण नवीन दृष्टिकोण और नए नेतृत्व का संदेश मतदाताओं तक न पहुंचना भी शामिल है। लंबे समय से जारी नागरिक असंतोष को कम समय में विश्वास में न ले पाना भी एक कारण माना गया है।
शर्मा ने यह भी कहा कि पुरानी संगठनात्मक संरचना ने भी पराजय में भूमिका निभाई है, ‘‘हमने पुरानी प्रणाली से चुनाव लड़ा जो नई चुनौतियों का सामना करने में असफल रही। यह हमारी पराजय का संगठनात्मक कारण भी था।’
विशेष महामहाधिवेशन न होता तो चुनाव में सक्रियता कम होने से परिणाम और भी खराब होते। उन्होंने कहा, ‘‘विशेष महामहाधिवेशन से पार्टी में नयी ऊर्जा आई।’
उपसभापति शर्मा यह भी मानते हैं कि कांग्रेस की पराजय में पुरानी विसंगतियों का बड़ा योगदान है। उन्होंने यह भी कहा कि एक व्यक्ति द्वारा सम्मेलन से समिति गठन न करवाना भी इसका कारण है।
उन्होंने कहा, ‘‘विशेष महामਹाधिवेशन के पाँच दिन बाद उम्मीदवार पंजीकृत हुए और पचास दिन में चुनाव सम्पन्न हुआ। नए नेतृत्व ने पार्टी के निचले स्तर तक ऊर्जा पहुंचाई, लेकिन परिवर्तन का संदेश जल्दी नागरिकों तक नहीं पहुंचा। लंबे समय से असंतोष को जल्दी नहीं बदला जा सका।’’
शर्मा ने स्वीकार किया कि सभी पक्षों की भागेदारी रही इसलिए पराजय की जिम्मेदारी सभी की है, परन्तु सभापति को पद छोड़ने की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, ‘‘जो अंतिम स्तर पर आग लगने पर उसे बुझाने गए थे, अगर नहीं बुझाते तो आरोप लगाना उचित नहीं।’
‘पराजय के मूल में श्रृंखलाबद्ध विकृतियाँ’
शर्मा ने कहा कि कांग्रेस की पराजय का कारण पिछले सरकारों, चुनावी गठबंधनों, राजनीतिक भागबंदी, कांग्रेस-एमाले गठबंधन, सामाजिक नेटवर्क के एल्गोरिदम आदि जैसे कारण हैं।
२०७४ में स्थिर सरकार की आशा में जनता ने तत्कालीन नेकपा को मतदान किया, लेकिन पांच साल स्थिर सरकार न चलने से जनता में वितृष्णा बढ़ी। २०७९ के चुनाव में कोई दल बहुमत न पाकर बड़ा दल होते हुए भी कांग्रेस सरकार बनाने में असफल हुई, जिससे नुकसान हुआ।
उन्होंने कहा, ‘‘नया संविधान लागू होने के बाद २०७४ के चुनावों में दो तिहाई स्थिर सरकार बनने का सुनहरा अवसर था जिसे भ्रष्टाचार कर क्षति पहुंचाई गई। पांच साल नहीं चला सके तो मतदाताओं ने विकल्प खोजा।’’
प्रधानमंत्री का बार-बार एक ही चेहरा होना भी नागरिकों में पुरानी पार्टियों से वितृष्णा बढ़ा रहा है। २०७९ के चुनावों में सबसे बड़ा दल होते हुए भी असफलता और विपक्ष में न होने से नुकसान हुआ।
गठबंधन ने चुनाव केंद्रित काम किया फिर भी पार्टी में असंतोष बढ़ा और हार झेलनी पड़ी। स्थानीय स्तर पर असंतोष और भदौ २३-२४ के जेएनजी विद्रोह तक की स्थिति को समय पर नहीं सुलझा सके।
शर्मा ने कहा, ‘‘जेएनजी विद्रोह के दौरान भी आपातकालीन स्थिति घोषित कर परिवर्तन के द्वार नहीं खोले। लगभग सवा सौ दिन व्यर्थ आंतरिक बहस में बीते।’
घरेलू राजनीति कमजोर होने से सोशल मीडिया में विरोध के स्वर मजबूत हुए जो जेएनजी विद्रोह में मुख्य भूमिका निभाकर चुनाव नतीजों तक पहुंचे।
शर्मा ने संगठन में विचारों के बजाय व्यक्तिमुखीकरण, गुटबंदी और अत्यधिक राजनीति ने कांग्रेस को चुनावी नुकसान पहुंचाया बताया। राज्य के अंगों में भागबंदी से नागरिक वितृष्णा बढ़ी।
उन्होंने कहा कि चरम राजनीतिकीकरण, सुशासन और भ्रष्टाचार नियंत्रण में विफलता ने चुनाव परिणामों को प्रभावित किया।
‘३५ वर्षों में कुछ नहीं हुआ यह धारणा बनी’
सबसे बड़ी पार्टी बनी रास्वपा द्वारा पिछले ३५ वर्षों में कुछ नहीं होने की धारणा फैलाने से कांग्रेस की पराजय हुई, शर्मा ने कहा। ‘‘यह तथ्य जनता तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाया कि कांग्रेस लगातार शासन में थी।’
सशस्त्र संघर्ष का अंत, लोकतंत्र की पुनःस्थापना और संविधान निर्माण जैसी उपलब्धियां जनता तक न पहुंच पाने के कारण पराजय मिली।
उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस के नेतृत्व में देश ने नया संविधान और नया रास्ता पाया। जातीय, भौगोलिक और धार्मिक संघर्षों के बीच भी कांग्रेस ने संयम और परिपक्वता से देश को एकजुट किया। अनेक चुनौतियों के बावजूद देश ने आर्थिक और भौतिक प्रगति हासिल की, जो कांग्रेस के नेतृत्व और नीति का परिणाम है।’’
‘लोकप्रियता के आधार’ को नहीं समझ पाने से पराजय हुई। पुरानी सभी गलत बातें और कांग्रेस आने पर सब ठीक हो जाएगा जैसी धारणा ने जनमत को भ्रमित किया। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम के प्रभाव से भी पराजय आई।
किसी दल के चुनाव जीतने के बाद विदेश न जाने का प्रचार भी कांग्रेस की हार का एक कारण बना। ‘‘कुछ दलों का कहना है कि चुनाव जीतें तो विदेश जाना जरूरी नहीं, इससे उनके परिवार में भी भावनात्मक प्रभाव पड़ा,’’ उन्होंने लिखा।
विशेष महामहाधिवेशन से आए नेतृत्व को हार का कारण नहीं मानते उपसभापति शर्मा। वे कहते हैं, ‘‘नए नेतृत्व से जल्दी जीत की उम्मीद रखना न्यायसंगत नहीं और सभापति का पद छोड़ना भी संगठन के प्रति गलत होगा।’