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लेखक: space4knews

जुलाई के अंदर होने वाला समझौता विलंबित

समाचार सारांश समीक्षा सामग्री। जापान द्वारा लागू किए जाने वाले नए ईएसडी कार्यक्रम के सेवा शुल्क से संबंधित प्रावधानों पर नेपाल के साथ सहमति ना बनने के कारण समझौता प्रक्रिया में देरी हुई है। जापान ने दो महीने के वेतन के बराबर सेवा शुल्क प्रस्तावित किया था, जबकि नेपाल सरकार श्रमिकों पर आर्थिक बोझ कम करने की मांग पर बनी हुई है। समझौता में विलंब से जापान जाने वाले नेपाली श्रमिकों को असर पड़ सकता है, जिसके कारण मंत्रालय ने एक अध्ययन समिति का गठन कर निर्णय की तैयारी की है।
२४ साउन, काठमांडू। जापान द्वारा विदेशी श्रमिकों को भेजने हेतु लॉन्च किए जाने वाले नए ‘इम्प्लॉयमेंट फॉर स्किल डेवलपमेंट’ (ईएसडी) कार्यक्रम के लिए नेपाल के साथ आवश्यक समझौता अभी तक नहीं हो पाया है। जापान की ओर से भेजे गए समझौते के मसौदे में सेवा शुल्क संबंधी प्रावधान पर नेपाल ने सहमति नहीं दी है, जिससे प्रक्रिया लंबित हो गई है। जापान ने इस नए कार्यक्रम को लागू करने से पहले नेपाल को तीन महीने का समय देते हुए समझौता करने को कहा था, जुलाई के अंदर समझौता करने की बात कही गई थी, लेकिन नेपाल ने अगस्त तक औपचारिक मत सार्वजनिक नहीं किया। समझौता ना होने के कारण जापान में श्रमिक भेजने की वर्तमान प्रक्रिया प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है।
जापान पहले से संचालित तकनीकी प्रशिक्षु प्रशिक्षण कार्यक्रम (टीआईटीपी) को २०२७ से क्रमशः ईएसडी कार्यक्रम से बदलने की योजना बना रहा है। नेपाल वैदेशिक रोजगार व्यवसायी संघ के अध्यक्ष डिकबहादुर खत्री के अनुसार, जापान ने समझौता मसौदे में दो महीने के वेतन के बराबर सेवा शुल्क लेने का प्रस्ताव रखा है, जबकि नेपाल सरकार इसे अधिक मानते हुए सेवा शुल्क एक माह तक सीमित रखने की मांग कर रही है।
खत्री बताते हैं, ‘‘जापान ने दो महीने के वेतन के बराबर सेवा शुल्क प्रस्तावित किया है, लेकिन हमारे मंत्रालय के अनुसार यह अवधि बहुत अधिक है। इसलिए इस प्रस्ताव पर लंबा समय से चर्चा चल रही है।’’ जापान ने यह तर्क दिया है कि कौशल विकास, प्रशिक्षण और उपयुक्त श्रमिक चयन की लागत के कारण दो महीने की सेवा शुल्क आवश्यक है। नौकरीदाता एवं श्रमिकों से शुल्क इसी आधार पर निर्धारित करने का प्रस्ताव व्यवसायियों ने रखा है।
खत्री आगे कहते हैं, ‘‘यदि सेवा शुल्क दो महीने से कम होता है तो जापान का मानना है कि वह आवश्यक स्तर के कुशल श्रमिक उपलब्ध कराना मुश्किल होगा। वे प्रशिक्षण एवं कौशल विकास के खर्चों के कारण सही उम्मीदवार भेजने पर संदेह व्यक्त कर रहे हैं।’’ नेपाल ने श्रमिकों के आर्थिक बोझ को कम करने के लिए सेवा शुल्क में कटौती की मांग को लेकर अड़ान बनाई हुई है। श्रम मंत्रालय ने वैदेशिक रोजगार में नियोक्ताओं द्वारा लागत वहन करने वाली ‘इम्प्लॉयर पे प्रिंसिपल’ नीति पेश की है।
युवा, श्रम तथा रोजगार मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, समझौते का अंतिम मसौदा बनाने का कार्य चल रहा है। मंत्रालय ने सेवा शुल्क से संबंधित विषयों के अध्ययन हेतु समिति गठित कर रखी है। सहसचिव पिताम्बर घिमिरे के संयोजन में बनी इस समिति ने शीघ्र ही रिपोर्ट प्रस्तुत करने की तैयारी की है। मंत्रालय योजना बना रहा है कि रिपोर्ट के आधार पर जापान द्वारा प्रस्तावित समझौते में सेवा शुल्क के विषय पर पुनः विचार किया जाएगा। इसी कारण समझौते में देरी हो रही है।
जापान ने दो माह से अधिक सेवा शुल्क न लेने का प्रावधान रखा है, लेकिन दो माह से कम में कितनी राशि ली जाएगी, इस पर नेपाल ने अभी निर्णय नहीं लिया है। अधिकारी बताते हैं, ‘‘टीआईटीपी के तहत जापान जाने वालों के लिए कम से कम ५०,००० रुपये सेवा शुल्क तय था। अब टीआईटीपी समाप्त होने के बाद नए सेवा शुल्क की स्पष्टता देनी होगी।’’ मंत्रालय शीघ्र सेवा शुल्क तय कर समझौते का मसौदा अंतिम रूप देने में लगा है और एक से डेढ़ महीने के भीतर प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद रखता है।
व्यवसायी समझौता विलंबित होने से जापान जाने वाले श्रमिकों को प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त करते हुए जल्द निर्णय लेने का आग्रह कर रहे हैं। नेपाल से जापान भेजे जाने वाले श्रमिकों के लिए वैदेशिक रोजगार गणतंत्र मंच के महासचिव कुञ्छा दोर्जे डिम्दोङ का कहना है कि ईएसडी कार्यक्रम जापान द्वारा पुराने टीआईटीपी को विकल्प के रूप में पेश किया गया है। उनके अनुसार जापान वर्ष २०२४ के भीतर कानूनी सुधार करके ईएसडी कार्यक्रम लागू करने की तैयारी कर रहा है, जो २०२७ से पूर्ण रूप से क्रियान्वित होगा। डिम्दोङ के अनुसार, ईएसडी का मुख्य उद्देश्य विदेशी श्रमिकों को जापानी भाषा और कौशल सिखाकर दक्ष बनाना है। करीब तीन वर्षों के दौरान श्रमिकों को काम के साथ-साथ भाषा और कौशल का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
उन्होंने कहा, ‘‘यह कार्यक्रम काम के साथ कौशल विकास, रोजगार अवसर और दक्ष श्रमिक उत्पन्न करने के लक्ष्य के साथ स्थापित है।’’ टीआईटीपी में प्रशिक्षु के रूप में जापान जाने वालों की तुलना में ईएसडी में कौशल और भाषा पर अधिक जोर दिया जाएगा तथा कुछ परिस्थितियों में श्रमिकों को कंपनी बदलने का अधिकार भी मिलेगा।
डिम्दोङ के अनुसार, नए व्यवस्था में भर्ती प्रक्रिया में शुल्क पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जाएगी। ‘‘अधिक शुल्क वसूलने की शिकायतों के चलते नई व्यवस्था में शुल्क पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है और कौशल एवं भाषा विकास पर जोर दिया जाएगा।’’ समझौता ना होने से श्रमिक भेजने की प्रक्रिया प्रभावित होने की संभावना बढ़ गई है।
नेपाल और जापान के बीच १२ चैत २०७५ को दक्ष श्रमिक भेजने को लेकर समझौता हुआ था। इसके तहत स्पेसिफाइड स्किल्ड वर्कर (एसएसडब्ल्यू) प्रणाली में भाषा और कौशल परीक्षण के बाद कृषि, नर्सिंग केयर, होटल सहित १२ क्षेत्रों में श्रमिक भेजे जाने का प्रावधान था। इसके पहले नेपाल सन् २००९ में जारी प्राविधिक अभ्यासार्थी कामगार निर्देशिका के तहत जापान भेज रहा था। जिट्को से मान्यता प्राप्त मैनपावर कंपनियां कामगार भेजती थीं।
जापान ने सन् २०१७ में जिट्को प्रणाली को समाप्त कर टीआईटीपी शुरू कर दिया था, जबकि नेपाल में पुरानी निर्देशिका लंबे समय तक लागू थी। तब के श्रम मंत्री शरतसिंह भण्डारी ने वर्ष २०८० में ‘जापान में कुशल श्रमिक भेजने संबंधी कार्यविधि’ जारी कर पुरानी निर्देशिका समाप्त कर दी थी। जापान के नए प्रणाली के लागू होने के कारण मंत्रालय ने नया कार्यविधि लाना पड़ा था। अब जापान टीआईटीपी को हटाकर ईएसडी लागू करना चाहता है, जिसके लिए नेपाल के साथ नया समझौता आवश्यक है।
व्यवसायियों के अनुसार, अगर नेपाल समय पर समझौता नहीं करता है तो टीआईटीपी के तहत जापान जाने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है तथा ईएसडी लागू होने तक जापान में रोजगार के रास्ते अनिश्चित हो सकते हैं। खत्री का कहना है, ‘‘समझौता ना होने पर टीआईटीपी या ईएसडी दोनों के तहत जापान जाने वालों को समस्या हो सकती है। इसलिए उचित समझदारी से शीघ्र समझौता करना जरूरी है।’’
मंत्री के अधिकारियों के अनुसार, सेवा शुल्क के विषय में निर्णय के बाद ही समझौता प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। हालांकि जापान द्वारा प्रस्तावित सेवा शुल्क को स्वीकार किया जाएगा या नेपाल अपनी सीमाओं के अनुसार निर्णय करेगा, यह अंतिम रूप से तय होना बाकी है। नेपाल सरकार ने वैदेशिक रोजगार में श्रमिकों से शुल्क न लेने एवं नियोक्ता द्वारा खर्च वहन करने वाली ‘इम्प्लॉयर पे प्रिंसिपल’ नीति लागू की है, जिससे जापान के दो महीने के सेवा शुल्क संबंधी प्रावधान पर आलोचना की संभावना मंत्रालय में देखी जा रही है।

मल की कमी के बावजूद ९६ प्रतिशत धान की रोपाई पूरी

कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार देशभर में धान की रोपाई लगभग ९५.५ प्रतिशत पूरी हो चुकी है। सुदूरपश्चिम प्रदेश में धान की रोपाई १०० प्रतिशत पूरी हुई है जबकि मधेस प्रदेश में पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। विभाग ने बताया कि मल की कमी के बावजूद १३ लाख ८ हजार ३८३ हेक्टेयर क्षेत्रफल में रोपाई पूरी की गई है। २४ सावन, काठमांडू। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी किसानों को रासायनिक मल की कमी और विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ा। सरकार समय पर मल उपलब्ध न करा पाने के कारण रोपाई के प्रमुख समय में किसान निराश हुए थे। लेकिन आवश्यक मल न मिलने के बावजूद देशभर में धान की रोपाई लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। कृषि विभाग के अनुसार २२ सावन तक देशभर में लगभग ९६ प्रतिशत रोपाई पूरी हो चुकी है। पिछले वर्ष इसी अवधि तक धान की रोपाई केवल ९१.३१ प्रतिशत थी। इस वर्ष धान की खेती के लिए उपलब्ध क्षेत्रफल में से ९५.५ प्रतिशत पर रोपाई पूरी की जा चुकी है। कुल १३ लाख ७० हजार ६२ हेक्टेयर धान योग्य जमीन में से अब तक १३ लाख ८ हजार ३८३ हेक्टेयर पर रोपाई हुई है। प्रदेशवार, सुदूरपश्चिम में १ लाख ५४ हजार १५० हेक्टेयर, अर्थात १०० प्रतिशत क्षेत्र में रोपाई पूरी हो चुकी है। वहीं, बागमती प्रदेश में ९७.८२ प्रतिशत, कर्णाली प्रदेश में ९६.८२ प्रतिशत, गण्डकी प्रदेश में ९५.५७ प्रतिशत और लुम्बिनी प्रदेश में ९४.८३ प्रतिशत रोपाई पूर्ण हुई है। कोशी प्रदेश में ९३.६९ प्रतिशत क्षेत्र में रोपाई हुई है जो अन्य प्रदेशों की तुलना में थोड़ा कम है। मुख्य अन्न भण्डार माने जाने वाले मधेस प्रदेश में इस वर्ष रोपाई में स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है। सिंचाई की कमी और मानसून की देरी के कारण पिछले वर्ष साउन २५ तक मधेस में केवल ७६.५४ प्रतिशत क्षेत्र में रोपाई हो पाई थी। किन्तु इस वर्ष इस प्रदेश में ९४.६५ प्रतिशत क्षेत्र, अर्थात् ३ लाख ६४ हजार २९१ हेक्टेयर में रोपाई पूरी हो चुकी है।

नाट्टाको नयाँ नेतृत्वका लागि त्रिपक्षीय प्रतिस्पर्धा जारी

नेपाल एसोसिएसन अफ टुर एन्ड ट्राभल एजेन्ट्स (नाट्टा) को ५९ औं वार्षिक साधारणसभा र नयाँ कार्यसमिति निर्वाचन आगामी शुक्रवार हुन लागेको छ। नाट्टाको नेतृत्वका लागि जिस्वाँ तुलाधर श्रेष्ठ, युबिका भण्डारी र भरतजंग पाण्डेको नेतृत्‍वमा तीन छुट्टाछुट्टै प्यानलहरू चुनावी प्रतिस्पर्धामा रहेका छन्। तीनै प्यानलले पर्यटन व्यवसायलाई अर्थतन्त्रको मुख्य आधार बनाउने विषयलाई आफ्नो प्राथमिकतामा राख्दै प्रतिबद्धतापत्र सार्वजनिक गरेका छन्। २४ साउन, काठमाडौं।

सन १९६६ मा स्थापना भएको टुर तथा ट्राभल व्यवसायीहरूको छाता संगठन नेपाल एसोसिएसन अफ टुर एन्ड ट्राभल एजेन्ट्स (नाट्टा) को नयाँ नेतृत्वका लागि त्रिपक्षीय प्रतिस्पर्धा हुने भएको छ। आगामी शुक्रवार नाट्टाको ५९ औं वार्षिक साधारणसभा र २५ औं कार्यसमिति निर्वाचन हुने तय गरिएको छ। नाट्टाको आगामी नेतृत्वका लागि जिस्वाँ तुलाधर श्रेष्ठ, युबिका भण्डारी र भरतजंग पाण्डेको नेतृत्वमा छुट्टाछुटै प्यानल चुनावी मैदानमा छन्। यसपटक प्रतिस्पर्धीहरूले पर्यटन व्यवसायलाई नेपालको अर्थतन्त्रको मुख्य आधार बनाउने विषयलाई आफ्नो एजेन्डामा सर्वोच्च प्राथमिकता दिएका छन्। हाल नाट्टाको अध्यक्ष कुमार मणि थापलिया रहेका छन्। यो निर्वाचन सन् २०२६ देखि २०२८ कार्यकालका लागि नयाँ कार्यसमिति चयनसमेत हुनेछ।

नाट्टाको आगामी नेतृत्वका लागि वरिष्ठ उपाध्यक्ष जिस्वाँ तुलाधर श्रेष्ठको नेतृत्वमा प्यानल घोषणा गरिएको छ। ‘सबल नेतृत्व, सुरक्षित व्यवसाय र समृद्ध पर्यटन’ भन्ने नारासाथ यो समूह चुनावी प्रतिस्पर्धामा छ। शनिबार यस समूहले १२ बुँदे निर्वाचन प्रतिबद्धतापत्र सार्वजनिक गरेको छ। यो समूहले नाट्टालाई सबल, समावेशी, पारदर्शी, प्रविधिमैत्री र व्यवसायमुखी संस्था बनाउने प्रतिबद्धता व्यक्त गरेको छ। नयाँ पुस्ताका पर्यटन उद्यमीलाई प्रोत्साहन गर्ने विषय पनि यस समूहको प्राथमिकतामा छ।

नाट्टाको वर्तमान कार्यसमितिमा महासचिवको जिम्मेवारीमा रहेकी युबिका भण्डारी आगामी नेतृत्वका लागि प्रतिस्पर्धा गरिरहेकी छन्। शशिज होलिडेज इन्टरनेसनल ट्राभल एण्ड टुर्स प्रालिका प्रबन्ध निर्देशक युबिकाको प्यानल ‘पर्यटन उठे, नेपाल उठ्छ’ नारासहित चुनावी मैदानमा छ। भण्डारीसँग दुई दशकभन्दा बढी पर्यटन अनुभव छ। उनले नाट्टा कार्यसमितीमा पटकपटक काम गरिसकेकी छन्। यस समूहले उपत्यका बाहिरका व्यवसायीलाई पनि समान प्राथमिकता दिने प्रतिबद्धता जनाएको छ।

भरतजंग पाण्डे नेतृत्वको प्यानलले पनि चुनावी प्रतिस्पर्धा गरिरहेको छ। पाण्डे एभरेस्ट मिराकल ट्राभल एण्ड टुर्सका प्रबन्ध निर्देशक हुन्। उनले ‘नाट्टा रूपान्तरण’ भन्ने नारा लिएको प्यानलमा ‘सशक्त नाट्टा, समृद्ध पर्यटन सदस्यसँगै सदस्यका लागि’ भन्ने मूलमन्त्र छ। यस प्यानलले सुशासन, पारदर्शिता र सदस्य सहभागितामा जोड दिएको छ।

हरेक वर्ष करिब २ लाख नेपाली विदेश भ्रमण करते हैं

अध्यागमन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में हर साल लगभग दो लाख नेपाली लोग पर्यटन और तीर्थयात्रा के उद्देश्य से विदेश जाते हैं। विभाग ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में सात लाख से अधिक नेपाली विभिन्न कारणों से विदेश गए हैं, जिनमें से ५२ प्रतिशत ने वैदेशिक रोजगार चुना है। शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले नेपाली की संख्या 2021 में 26 हजार थी, जो 2025 तक पाँच गुना बढ़कर 1 लाख 33 हजार हो गई है।

अध्यागमन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2025 तक वार्षिक औसतन 1 लाख 99 हजार 976 नेपाली पर्यटन और तीर्थयात्रा के लिए विदेश गए हैं। इन आंकड़ों में अध्ययन, परिवार से मिलने, अस्थायी और स्थायी बसोबास के लिए विदेश जाने वाले नेपाली शामिल नहीं हैं। केवल 2025 में पर्यटन और तीर्थयात्रा के लिए 2 लाख 33 हजार 118 नेपाली विदेश गए हैं।

हाल ही में नेपाली प्रवासन दर लगातार बढ़ रही है। पिछले 5 वर्षों में कुल 71 लाख 26 हजार 459 नेपाली विभिन्न उद्देश्यों से विदेश गए हैं, जिनमें से ५२ प्रतिशत वैदेशिक रोजगार में गए हैं। विभाग ने कहा, ‘यह आंकड़ा नेपाल की अर्थव्यवस्था में वैदेशिक रोजगार आधारित संरचनात्मक निर्भरता को दर्शाता है।’

अध्यागमन विभाग के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा नेपाली यूएई जाना पसंद करते हैं। पिछले 5 वर्षों में विदेशी प्रस्थान करने वालों में यूएई जाने वालों की संख्या सबसे अधिक है। यूएई में वार्षिक औसतन 2 लाख 71 हजार 893 नेपाली पहुंचते हैं।

नेपाल ने तेक्वांडो में 4 स्वर्ण समेत 15 पदक जीते

चीन के नानजिंग में सम्पन्न तेक्वांडो ग्रैंडस्लैम यूथ लीग फाइनल्स में नेपाली खिलाड़ियों ने 4 स्वर्ण, 5 रजत और 6 कांस्य पदक सहित कुल 15 मेडल हासिल किए हैं। काठमाडौं जिला तेक्वांडो संघ के अध्यक्ष विक्रम खड्गी के अनुसार, उनिका पौडेल, आदिश बिष्ट, प्रिशा ज्ञवाली और अफेस खत्री ने स्वर्ण पदक जीते हैं।

टोली के प्रशिक्षक पूजा खड्का के नेतृत्व में शामिल नेपाली खिलाड़ियों ने विभिन्न स्पर्धाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए ये पदक प्राप्त किए हैं। रजत पदक विजेताओं में लोचन भट्टराई, सिबेन सुब्बा, साश्वत निरौला, अभिषेक डल्लाकोटी और आवश्यक बिष्ट शामिल हैं।

कांस्य पदक विजेता खिलाड़ियों में सर्वम महतरा, सव्यं महतरा, प्रिशा ज्ञवाली, आराध्य खरेल, गौतम श्रेष्ठ और अनिश अधिकारी शामिल हैं।

गैस की कमी से उपभोक्ताओं की परेशानी, मंत्री के प्रयास विफल

देशभर खाना पकाने के लिए एलपी गैस की गंभीर कमी के कारण उपभोक्ता परेशान हैं। उपत्यका में कालाबाजारी रोकने के लिए पुलिस तैनात की गई है, लेकिन गैस वितरण प्रणाली में सरकारी संस्थान पूरी तरह असफल साबित हो रहा है। उद्योग मंत्री गौरीकुमारी यादव के बाजार निरीक्षण और फोन सेवा को उपभोक्ता अधिकारियों ने केवल साख बढ़ाने वाला प्रदर्शन करार दिया है। २४ साउन, काठमाडौं। साउन के करीब समाप्ति पर देशभर के उपभोक्ता खाना पकाने के लिए एलपी गैस की कमी से जूझ रहे हैं। शहर के बड़े चौराहों पर सिलेंडरों की लंबी कतारें अभी भी जारी हैं। उपभोक्ता गैस न मिल पाने के कारण रसोई में खाना बनाने में असमर्थ हैं। कुछ विक्रेता एक सिलेंडर का दाम ७ से ८ हजार रुपये तक बढ़ाकर उपभोक्ताओं को अतिरिक्त तकलीफ दे रहे हैं।

इस समस्या की हकीकत समझने के लिए काठमाडौँ जिले में पुलिस को तैनात करके गैस वितरण शुरू किया गया, जिससे गैस वितरण प्रणाली की विफलता साफ नजर आती है। कालाबाजारी रोकने के लिए पुलिस ने उपत्यका में साधारण वर्दी में टीम तैनात की है। शनिवार को पुलिस ने काठमाडौँ के ५५ स्थानों से लगभग ८ हजार सिलेंडर वितरण करने के आंकड़े जारी किए हैं। लेकिन गैस वितरण करने का काम पुलिस का नहीं है। डीलर सहज गैस आपूर्ति करने में असमर्थ होने और कालाबाजारी बढ़ने पर पुलिस को तटस्थ भूमिका में लाना पड़ा है।

यह स्पष्ट करता है कि सरकार की वाणिज्य एवं आपूर्ति प्रणाली पूरी तरह कमजोर है।

उपभोक्ता को मंत्री का फोन: प्रदर्शन या सुधार?

इसी गैस की कमी के बीच शनिवार को उद्योग मंत्रालय में एक अजीब नजारा देखा गया। कुछ यूट्यूब चैनल वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। उद्योग, वाणिज्य तथा आपूर्ति मंत्री गौरीकुमारी यादव ने मंत्रालय द्वारा जारी टोल-फ्री नंबर पर आए फोन स्वयं उठाए। शिकायत करने वाले एक उपभोक्ता को उन्होंने “कल तक गैस मिल जाएगी” का भरोसा दिया। एक अन्य उपभोक्ता को उन्होंने कहा “साल्ट ट्रेडिंग में गैस उपलब्ध है, वहां जाकर लें, गैस पर्याप्त है, आवश्यकता अनुसार ले सकते हैं”।

मंत्री यादव दोपहर में टेकु स्थित नेपाल आयल निगम के पुराने भवन, कालीमाटी स्थित साल्ट ट्रेडिंग कार्यालय और बालाजु स्थित नेपाल गैस उद्योग पहुंचे और औपचारिकता के तौर पर निरीक्षण भी किया। सामान्यतः यह सक्रियता उपभोक्ता के प्रति जवाबदेही लग सकती है, सामाजिक मीडिया पर ऐसे दृश्य की प्रशंसा भी होती है। पर सवाल यह है— क्या मंत्री का काम केवल कुछ उपभोक्ताओं के फोन उठाना है? समस्या तो सम्पूर्ण देशव्यापी है। क्या मंत्री की जिम्मेदारी उपभोक्ताओं को साल्ट ट्रेडिंग या गैस उद्योग तक दौड़ाना ही है? उपभोक्ताओं का सिलेंडर लेकर टेकु, साल्ट ट्रेडिंग या बालाजु घुमना सिस्टम की विफलता ही तो है।

सुशासन की बात करने वाली सरकार का ऐसी स्थिति बनाना उपहास है जो सिलेंडर लेकर उद्योगों, गलियों और चौराहों तक पहुंचना मजबूरी बनाता है। समस्या का समाधान केवल काठमाडौँ उपत्यका में सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि देशव्यापी होना चाहिए, जिसके कारण उपभोक्ताओं को खाली सिलेंडर लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करना पड़ रहा है।

उद्योग मंत्री यादव के बाजार दौरे को उपभोक्ता अधिकारकर्मी माधव तिमल्सिनाले सस्ते प्रदर्शन (स्टन्ट) का नाम दिया है। “मंत्री एक-दो उपभोक्ताओं के फोन उठाकर उन्हें गैस लेने निर्देश देना मात्र स्टन्ट है, जो दीर्घकालीन आपूर्ति में सुधार नहीं लाता,” तिमल्सिनाले कहा, “अनुगमन जिला प्रशासन कार्यालय, वाणिज्य विभाग और आयल निगम के कर्मचारी करते हैं। मंत्री को नीतिगत स्तर पर काम करना चाहिए और संकट प्रबंधन करना चाहिए।”

वर्तमान संकट के मुख्य कारण मांग-आपूर्ति में असंतुलन और आयल निगम की गैरजिम्मेदारी बताए गए हैं। नाकाबंदी, भूकंप, कोरोना जैसी आपदाओं से सीखकर आपातकालीन स्थिति में ‘बफर स्टॉक’ रखने और ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ लागू करने में सरकार नाकाम रही है। “निगम डेढ़ लाख से अधिक सिलेंडर उपलब्ध बता रहा है, जबकि बाजार में रोजाना मांग लगभग 1 लाख है, पर आपूर्ति केवल 20 हजार है,” उन्होंने कहा, “गैस उपभोक्ताओं के नजदीकी डीलर्स से मिलनी चाहिए, मगर वर्तमान तनावजनक स्थिति में मंत्रालय से ही वितरण हो रहा है, जिससे उद्योगी को ढुलाई और कमीशन के रूप में सिलेंडर पर ९० से १०० रुपये तक मुनाफा होता है। यह पूरा सिस्टम गलत है।”

आंकड़ों के अनुसार नेपाल एलपी गैस उद्योग संघ ने एलपी गैस की कमी पूरी तरह समाप्त होने में अभी १०-१५ दिन लगने का अनुमान जताया है। सरकार और आयल निगम उपभोक्ताओं की ‘पैनिक बाइंग’ और जरूरत से ज्यादा सिलेंडर जमा करने की प्रवृत्ति को दोष देते रहे हैं। भारतीय स्रोत से आयात कोटा बढ़ाने के आंकड़े निगम ने प्रस्तुत किए हैं। निगम प्रवक्ता मनोज ठाकुर के अनुसार नियमित कोटा ४९ हजार ५ सौ टन से बढ़ाकर अब ५४ हजार से ५५ हजार टन किया गया है। “पहले ४६-४७ हजार टन आ रहा था, लेकिन पिछले तीन महीनों में आयात कम हुआ। मांग बढ़ने पर लगभग ५५ हजार टन का आवंटन भेजा जा रहा है,” ठाकुर ने बताया।

नेपाल आयल निगम ने भारत से गैस आपूर्ति में किसी समस्या से इनकार किया है। निगम के आंकड़े के अनुसार साउन १० से २१ तक के १२ दिनों में १७ लाख ५४ हजार १५४ सिलेंडर के बराबर गैस आयात और बिक्री हुई है। रोजाना बाजार में औसतन 1 लाख १० हजार सिलेंडर बिक्री होते हैं। सरकार रोजाना की खपत से अधिक गैस आने का दावा कर रही है, लेकिन उपभोक्ता कतार कम नहीं हो रही। पिछले चार महीनों से आधा सिलेंडर ही आ पा रहा है। ऐसी स्थिति में नियमित से अधिक आयात और बेहतर वितरण प्रणाली लागू करना सरकार और निगम दोनों के लिए चुनौती साबित हो रहा है।

निगम के कार्यकारी निदेशक नागेन्द्र साह ने एक सप्ताह के भीतर गैस वितरण प्रणाली सामान्य होने का दावा किया है। वे बता रहे हैं कि भारतीय इन्डियन आयल कॉर्पोरेशन के साथ बातचीत पूरी हो चुकी है और मांग के अनुसार गैस आ रही है। “इन्डियन आयल ने मांग के अनुसार गैस दी है, जितना ला सकते हैं उतना ला रहे हैं,” उन्होंने कहा, “एक सप्ताह के अंदर स्थिति सामान्य करने का प्रयास जारी है।”

प्रदर्शन नहीं, प्रणाली चाहिए

मंत्री को समझना होगा कि स्वयं एक-दो उपभोक्ताओं को गैस दिलाने से लाखों की समस्या हल नहीं होती। उद्योग मंत्रालय जाकर निरीक्षण का अभिनय करने की बजाय जिम्मेदार अधिकारियों को तैनात करके वितरण प्रणाली सुधारनी चाहिए। पहले भी इस तरह के निरीक्षण किए गए हैं लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं हुआ। गैस की कमी दूर करने के लिए आपूर्ति बढ़ाने व नीति निर्धारण सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि गैस पर्याप्त है लेकिन कालाबाजारी हो रही है तो दोषी डीलर या उद्योगी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी। उपभोक्ता की समस्या केवल मंत्री के फोन उठाने या निर्देश देने से नहीं सुलझेगी क्योंकि समस्या की जड़ नीतिगत स्तर पर है। मंत्री को प्रणाली को प्रभावी रूप से संचालित करना होगा जो उपभोक्ताओं को सहज गैस उपलब्ध कराए। सरकार को वितरण प्रणाली पारदर्शी व सरल बनाकर निकटतम डीलर से गैस उपलब्ध करानी होगी। अन्यथा मंत्री की लोकप्रियता से ऊपर कुछ नहीं होगा। गैस की कमी में नागरिकों को मंत्री का ‘प्रदर्शन’ नहीं, काम करने वाली ‘प्रणाली’ चाहिए।

पब्जी मोबाइल में होरा ईस्पोर्ट्स सीधे फाइनल में प्रवेश

फ्रांस के पेरिस में आयोजित पब्जी मोबाइल विश्व कप के ग्रैंड फाइनल में नेपाल की टीम होरा ईस्पोर्ट्स सीधे प्रवेश कर चुकी है। समूह ‘बी’ के तहत मुकाबला कर रही होरा ईस्पोर्ट्स ने ९८ अंकों के साथ चौथे स्थान पर रहकर तालिका में शीर्ष पांच में जगह बनाई है। छठवें से १३वें स्थान तक के टीमें सर्वाइववल स्टेज में प्रतिस्पर्धा करके फाइनल में प्रवेश करेंगी। २४ साउन, काठमांडू।

रविवार को संपन्न मुकाबलों में समूह ‘बी’ की १६ टीमों में से शीर्ष ५ में शामिल होरा ने फाइनल में स्थान बनवा लिया। होरा ने एक चिकन डिनर सहित कुल ९८ अंक जुटाए और चौथे स्थान के साथ फाइनल में प्रवेश किया। समूह ‘बी’ से वाइटालिटी मिशन ने १४८ अंकों के साथ फाइनल में प्रवेश किया जबकि आईडीए, एसटुजी और गडलाइक भी होरा के साथ फाइनल में पहुंचे हैं।

पहले दिन ५९ अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रही होरा ने दूसरे दिन छह मैचों में ३९ अंक जोड़कर टीम के प्रदर्शन को मजबूत किया। अंतिम मुकाबले से पहले शीर्ष पांच में बनी रहने वाली होरा आखिरी मैच में छठे स्थान पर रहने के बावजूद शीर्ष पांच में बनी रही। होरा ने पहले दिन दो मुकाबलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए दूसरे मैच में चिकन डिनर हासिल किया था। कुल मिलाकर ३७ प्लेसमेंट पॉइंट्स और ६१ किल्स के साथ होरा ने ९८ अंक बनाकर बेहतरीन खेल दिखाया।

समूह में चौथे स्थान के बाद होरा ने ५७,५०० अमेरिकी डॉलर का पुरस्कार सुनिश्चित कर लिया है। अब ग्रैंड फाइनल में जीत के लिए करोड़ों डॉलर का पुरस्कार हासिल करने की चुनौती होगी। ग्रैंड फाइनल का विजेता ५ लाख अमेरिकी डॉलर का नकद पुरस्कार प्राप्त करेगा। समूह ‘ए’ से भी शीर्ष पांच टीमें फाइनल में पहुंची हैं। पाकिस्तान की फोर थ्राइव, भारत की ओरांगुटान, मंगोलिया की ऑरोरा, वियतनाम/सिंगापुर की टीम फ्लैश और मिडल ईस्ट की निग्मा गैलेक्सी शीर्ष पांच में रहकर फाइनल में जगह बना चुकी हैं।

अब दोनों समूहों के छठे से १३वें स्थान तक की १६ टीमें सर्वाइववल स्टेज में मुकाबला करेंगी, जिसमें से शीर्ष ६ टीमें फाइनल में प्रवेश करेंगी। समूह चरण के अंतिम तीन स्थानों पर रहने वाली ६ टीमों का उत्साह समाप्त हो जाएगा। १४ से १६ अगस्त तक चलने वाले ग्रैंड फाइनल में कुल १६ टीमें प्रतिस्पर्धा करेंगी, जिनमें से १० टीमों ने जगह पक्की कर ली है। बाकी ६ टीमों का फैसला ११ और १२ अगस्त को होने वाले सर्वाइववल स्टेज मैचों से होगा। पब्जी मोबाइल ग्रैंड फाइनल में प्रतिस्पर्धा करने वाली सभी १६ टीमें नगद पुरस्कार प्राप्त करेंगी। विजेता को ५ लाख अमेरिकी डॉलर, उपविजेता को २ लाख ५० हजार डॉलर और तीसरे स्थान पर रहने वाली टीम को १ लाख ५० हजार डॉलर पुरस्कार मिलेगा। चौथे स्थान पर आने वाली टीम को १ लाख २० हजार, पांचवें को १ लाख, छठे को ९० हजार, सातवें को ८० हजार और आठवें को ७० हजार डॉलर पुरस्कार मिलेगा। नौवें से १६वें स्थान तक की टीमें क्रमशः ६० हजार से २५ हजार डॉलर तक पुरस्कार पाएंगी।

मनमोहक कमलदह की सुंदरता में डूबते हुए

२३ साउन, रुकुमपूर्व। हरियाली पहाड़ों से घिरा शांत दह। पानी पर तैरते गुलाबी कमल। और उनके ऊपर चहचहाते पक्षी।

रुकुमपूर्व के कमलदह पहुंचने वाले पर्यटकों को यही दृश्य मंत्रमुग्ध कर रहा है।

सिस्ने गाउँपालिका–५, रुकुमकोट में स्थित कमलदह में कमल खिलने का मौसम शुरू होते ही पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी है। स्थानीय और बाहर से आने वाले लोग कमल के फूल देखने, फोटो खींचने और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने कमलदह आते हैं।

कमल के पंखुड़ी के बीच तैरते गुलाबी फूल दह की सुंदरता को और भी आकर्षक बना रहे हैं। दह में दिखने वाले फूल, पानी में प्रतिबिंब और आसपास की हरियाली ने कमलदह को फोटो खींचने और घूमने आने वालों के लिए एक मनमोहक स्थल बना दिया है।

हाल के दिनों में कमलदह की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हैं, जिससे यहां की पहचान जिले के बाहर भी फैल रही है। कमल खिलने के सीजन में यहां आने वालों की संख्या और भी अधिक हो जाती है, स्थानीय लोग बताते हैं।

कमलदह की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इसे सुव्यवस्थित पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। दह तक आसान पहुंच, पैदल मार्ग, विश्राम स्थल, पीने का पानी, शौचालय और कूड़ा प्रबंधन जैसे बुनियादी ढांचे को और बेहतर बनाने के लिए स्थानीय प्रशासन सक्रिय है, क्षेत्र के नागरिक मदन शाह ने जानकारी दी।

पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ ही दह की प्राकृतिक सुंदरता को संरक्षित करना भी एक चुनौती है। कमल के फूलों और जल क्षेत्र की रक्षा करते हुए पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए तो कमलदह स्थानीय आय और रोजगार का स्रोत बन सकता है, शाह ने बताया।

इस समय कमलदह में तैरते गुलाबी कमल पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस खूबसूरती को संरक्षित कर इसके प्रचार-प्रसार से रुकुमपूर्व का कमलदह और भी प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन सकता है, स्थानीय लोगों का विश्वास है।

तस्वीरें :

 

कर्णाली रंगशाला में अत्याधुनिक तैराकी पूल का निर्माण पूर्ण

कर्णाली प्रदेश रंगशाला परिसर में आगामी दशवीं राष्ट्रीय खेलकूद हेतु लक्षित अत्याधुनिक तैराकी पूल का निर्माण पूरा हो गया है। कर्णाली प्रदेश खेलकूद विकास परिषद के सदस्य-सचिव रविंद्र चंद ने बताया कि इस पूल से खिलाड़ियों के प्रशिक्षण को प्रभावी बनाया जाएगा। नया बुनियादी ढांचा कर्णाली के तैराक खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास और प्रतियोगिताओं की तैयारी में मजबूती प्रदान करेगा। २४ साउन, काठमांडू।

कर्णाली प्रदेश की राजधानी वीरेंद्रनगर में स्थित कर्णाली प्रदेश रंगशाला में अत्याधुनिक तैराकी पूल का निर्माण कार्य सम्पन्न हो चुका है। दशवीं राष्ट्रीय खेलकूद प्रतियोगिता को ध्यान में रखते हुए बनाया गया यह पूल कर्णाली के तैराक खिलाड़ियों को नियमित प्रशिक्षण के लिए सुविधाजनक वातावरण उपलब्ध कराएगा। पहले तैराकी खेल के लिए आवश्यक पूर्वाधार की कमी के कारण खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। नए पूल का निर्माण इस क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

कर्णाली प्रदेश खेलकूद विकास परिषद के सदस्य-सचिव रविंद्र चंद ने कहा, “तैराकी पूल बनने के बाद प्रदेश के खिलाड़ियों के लिए नियमित अभ्यास करना आसान हो जाएगा और दशवीं राष्ट्रीय खेलकूद की तैयारी और भी प्रभावकारी होगी।” उन्होंने आगे जोड़ा, “इससे खिलाड़ियों की क्षमताओं के विकास में भी मदद मिलेगी।”

दशवीं राष्ट्रीय खेलकूद को लक्षित करते हुए कर्णाली में हाल ही में खेलकूद पूर्वाधार के विकास और स्तरोन्नति को प्राथमिकता दी गई है। नया तैराकी पूल न केवल प्रतियोगिता की तैयारी में लगे खिलाड़ियों बल्कि प्रदेश में समग्र तैराकी खेल के विस्तार में भी योगदान देगा। नियमित प्रशिक्षण से नई प्रतिभाओं की खोज और खिलाड़ियों की क्षमताओं के विकास में सहायता मिलने का विश्वास जताया गया है। तैराकी खेल में संभावनाएं होने के बावजूद पूर्वाधार की कमी से नियमित अभ्यास बाधित होता था, अब इस सुविधा के उपलब्ध होने से खिलाड़ियों को बाहरी जिलों पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा।

‘सरकार के काम करने का तरीका उचित नहीं है, लेकिन नियत तो ठीक ही है’

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा की गई।

  • प्रतिनिधि सभा के सांसद डॉ. तारा जोशी ने कम्युनिस्ट राजनीति छोड़कर रास्वपा में आने के बाद अपने अनुभव और पार्टी के पहले महाधिवेशन पर चर्चा की।
  • डॉ. जोशी ने रास्वपा का आधार सिद्धांत सामाजिक लोकतंत्र बताया और कहा कि एमाले और रास्वपा की स्कूलींग में ज्यादा अंतर नहीं है।
  • सरकार की कार्यक्षमता में आई कमियों और पार्टी के अंदर असहमति पर चर्चा करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि सरकार की नियत अच्छी है लेकिन प्रबंधन पक्ष में कुछ कमजोरियां हैं।

नेपाली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शेरबहादुर देउवा ने सन् 2048 से 2079 तक लगातार डडेलधुरा से चुनाव जीतते रहे। लेकिन गत 21 फाल्गुन को हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव में वे टिकट पाने में असफल रहे। कांग्रेस ने उनकी जगह नेविसंघ के पूर्व अध्यक्ष नैनसिंह महर को उम्मीदवार बनाया, जो चुनाव हार गए। उन्हें रास्वपा के उम्मीदवार डॉ. तारा जोशी ने पराजित किया।

लंबे समय तक नेकपा एमाले में रहे और राजनीति में सक्रिय डॉ. जोशी कुछ समय तत्कालीन एकीकृत समाजवादी में भी थे। सन् 2079 के चुनाव में सत्ता गठबंधना से डडेलधुरा प्रदेशसभा टिकट न मिलने पर उन्होंने विद्रोह कर स्वतंत्र उम्मीदवार बनकर जीत हासिल की।

चुनाव से पहले, जोशी ने उज्यालो नेपाल के संस्थापक कुलमान घिसिंग की उज्यालो नेपाल पार्टी के साथ निकटता बनाई। हालांकि रास्वपा और उज्यालो नेपाल पार्टी का संयुक्त जीवन छोटा रहा। जोशी अब भी रास्वपा में हैं। उज्यालो नेपाल पार्टी का एक हिस्सा आज भी जोशी के नेतृत्व में रास्वपा में शामिल है।

डॉ. जोशी के साथ नई पार्टी और संसद सदस्य के अनुभव, रास्वपा के पहले महाधिवेशन, पार्टी के अन्दर देखी गई असहमतियों सहित मुद्दों पर बातचीत प्रस्तुत है, जिसे पत्रकार लिलु डुम्रे ने किया।

आपने लंबे समय तक कम्युनिस्ट राजनीति में काम किया है। रास्वपा में अभी चार महीने हुए हैं। इस अवधि में आपका अनुभव कैसा रहा?

मैं लंबे समय से वाम राजनीति में हूं और समाज को अक्सर मार्क्सवादी दृष्टिकोण से देखता आ रहा हूं। मार्क्सवाद एक दृष्टिकोण है जिससे सभी नागरिक समाज का विश्लेषण कर सकते हैं।

मैंने एमाले में भी काम किया है। कम्युनिस्ट जो एजेन्डे उठाते हैं, वे अक्सर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी भी उठा सकती है। ये एजेंडें मूल रूप से अलग नहीं होते। इसलिए कल और आज की राजनीतिक प्रैक्टिस में ज्यादा अंतर महसूस नहीं होता।

कम्युनिस्ट पार्टी जो मुद्दे उठाती है, वे बाकी पार्टियों द्वारा भी उठाए जा सकते हैं। कम्युनिस्ट या गैर-कम्युनिस्ट के नाम से चाहे जितनी अलग-अलग हो, हमारे समाज के एजेंडों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। जनप्रतिनिधि के तौर पर मेरी प्रैक्टिसऔर पूर्व प्रैक्टिस में शायद कुछ फर्क होगा लेकिन एजेंडा तो समान है।

क्या एमाले की स्कूलींग के कारण अब अलग परिवेश में अनुकूलन मुश्किल होगा?

स्कूलींग में ज्यादा फर्क नहीं है। रास्वपा के महाधिवेशन में हमने सामाजिक लोकतंत्र को आधार सिद्धांत बनाया है।

सामाजिक लोकतंत्र आर्थिक, भौगोलिक और मूल्य मान्यताओं पर आधारित होता है और सामाजिक कल्याणकारी कार्य हो सकता है—ऐसा विचार महाधिवेशन में बना। एमाले भी इन बातों में विश्वास करती है, पर उनकी ईमानदारी में कुछ फर्क दिखता है। रास्वपा और एमाले के रास्ते में ज्यादा भिन्नता नहीं है। इसलिए स्कूलींग के मामले में भी बहुत दूर-दूर नहीं है। यदि एमाले कम्युनिस्ट परंपरा में खड़ा होता तो कुछ फर्क होता।

रास्वपा और एमाले के संगठन निर्माण में फर्क है। इसे आप कैसे देखते हैं?

संगठन निर्माण में थोड़ा फर्क होता है। एमाले संगठन पर अधिक भरोसा करने वाली पार्टी है, जो समर्थक बनाती है। पर हर जगह समर्थक बनाने के लिए संगठन जरूरी नहीं होता। सदस्यता की एक सीमा भी होती है। बड़े संगठन बनाने के लिए अनावश्यक सदस्यता देना जरूरी नहीं है।

सरकार के काम करने का तरीका शायद सही नहीं है, लेकिन काम करने की नियत तो है। कभी-कभार इससे नुकसान भी हो सकता है। काम करने की विधि का अभाव और नियत खराब होना अलग चीजें हैं।

एमाले में किसी को पार्टी के लिए जरूरी मानकर उद्देश्य बनाना और स्कूलींग में शामिल करना होता था, लेकिन रास्वपा में स्वेच्छा ज्यादा होती है। रास्वपा लिबरल प्रकार की पार्टी है, जिसकी मान्यता है कि सभी को न बांधकर विषय के आधार पर बांधना चाहिए। हमारे मूलभूत सिद्धांत सामाजिक लोकतंत्र ही हैं।

वर्तमान सरकार की कार्यक्षमता और शैली को आप कैसे आंकते हैं?

मैं जितनी उम्मीद करता था, उतना नहीं मिला। लेकिन उन्होंने अच्छे काम भी किए हैं। प्रशासन सुधार में सरकार ने प्रगति की है और कुछ मुद्दों पर मैं संतुष्ट हूं।

क्या सरकार आम जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी?

सरकार का दायित्व था कि वह नागरिकों की अपेक्षा से अधिक करे, इसलिए आक्रोश है। लेकिन दीर्घकालीन आर्थिक बदलाव में समय लगता है। फिलहाल सरकार जो जरूरी काम कर सकती है, वह कर रही है। कुछ कमियां हैं, जिन्हें सुधारा जाना चाहिए। पर काम करने की नियत अच्छी है।

सरकार की नियत सही होने के बावजूद काम करने की विधि विफल मानी जा रही है, क्या आप सहमत हैं?

काम करने का तरीका कम हो सकता है, लेकिन काम करने का इरादा है। कभी-कभी इससे नुकसान भी हो सकता है, पर नियत खराब होना अलग बात है। कुछ समस्याएं हैं जिन्हें स्वीकार करना जरूरी है।

सरकार की जल्दबाजी में लिए गए फैसले जैसे सुकुमवासी हटाने का निर्णय, प्रशासनिक रूप से बेहतर प्रबंधन नहीं हो पाया। आप क्या सोचते हैं?

सभी सुकुमवासी संकट में नहीं हैं, कुछ जगह समस्याएं आईं जिन्हें सुलझाना होगा। सरकार ने मासिक 25 हजार रुपए दिए हैं, जिससे सामान्य ग्रामीण परिवार चला सकता है। इससे पता चलता है कि सरकार ने प्रबंधन पर ध्यान दिया है।

सरकार के संगठन जल्द समाधान करना चाहते हैं और अच्छे काम करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन टाइम फ्रेमिंग में पूरी स्थिति का आकलन नहीं हुआ।

सरकार ने प्रतिशोधात्मक कदम उठाये और पूर्व-पकड़ के आरोप लगे, आपकी क्या राय है?

यह केवल सरकार की बात नहीं है, बल्कि राज्य के अन्य अंग भी अपनी भूमिका निभाते हैं। सभी राज्य अंग सिर्फ सरकारी आदेशों पर नहीं चलते। जरूरत के अनुसार वे जांच करते हैं। अधिकतर लोग अपराधी नजर आते हैं, लेकिन सच में प्रबंधन पुरानी व्यवस्था की चुनौती है।

क्या अदालत के प्रक्रिया में केवल प्रमाण के आधार पर गिरफ्तारी होती है?

हाँ, कानूनी तौर पर प्रमाण स्वीकार या अस्वीकार किए जाते हैं। ऐसा हो कि दोषी बच जाए या निर्दोष फँस जाए, यह नहीं होना चाहिए।

प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया कैसी रही?

प्रधानमंत्री ने इस विषय पर ज़्यादा टिप्पणी नहीं की, लेकिन वे सभी संस्थानों से ऊपर हैं। मैंने सड़क और समाज की समस्याएं उठाईं।

शक्तिशाली सरकार से आर्थिक विकास की उम्मीद थी, पर बजट विवादित बना। आप क्या कहते हैं?

बजट इतना विवादित नहीं है। यह अर्थव्यवस्था को नए ट्रैक पर ले जाने और डिजिटलीकरण पर केंद्रित है। व्यापार और निवेश में कुछ सुविधाएं भी दी गई हैं।

रास्वपा एक अलग-अलग समूहों से जुड़ी पार्टी है, जिसमें मैं भी एक समूह से हूं।

स्वास्थ्य और शिक्षा पर कर लगाने पर जनता ने तीव्र प्रतिक्रिया दी, जो बाद में सुधारा गया।

भोजपुर में प्रधानमंत्री और अर्थमंत्री निजी क्षेत्र व उद्यमियों से लगातार चर्चा करते हैं, फिर भी निजी क्षेत्र की आत्मविश्वास कमजोर क्यों है?

आत्मविश्वास जाग रहा है, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार के खिलाफ असामान्य हमला हो रहा है, जिससे भ्रम पैदा हो रहा है। प्रधानमंत्री बालेन शाह अभी भी लोकप्रिय हैं।

कुछ व्यापारियों की गिरफ्तारी के बाद बाजार में नकारात्मक प्रभाव हुआ है, लेकिन कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था बहुत प्रभावित नहीं हुई है।

अब पार्टी की बात करें। रास्वपा ने अपना पहला महाधिवेशन संपन्न किया, पर प्रबंधन की दिक्कतों को लेकर आलोचना हुई। आपकी क्या राय है?

महाधिवेशन दक्षता, नेतृत्व और विचारधारा की परीक्षा होती है। तीन दिन में महाधिवेशन पूरा करना जरूरी नहीं था, अब सीख लेकर अगली बार बेहतर करने की उम्मीद है।

एमाले के महाधिवेशन में प्रतिनिधियों की सहमति न होने पर शुरू होता था, पर रास्वपा में सहमति के बिना महाधिवेशन शुरू हुआ, इसका क्या मतलब है?

पार्टी ने जल्दी सहमति बनाई क्योंकि सभी को यह स्वीकार था। एमाले में वैसी स्थिति नहीं थी, जहां प्रतिनिधि को पर्यवेक्षक और प्रतिनिधि की तरह अलग किया जाता। रास्वपा में सभी मित्रवत थे। प्रतिनिधि चयन में पार्टी लिबरल थी और पदाधिकारियों में कोई खास तत्परता नहीं दिखी।

क्या पदाधिकारियों के चुनाव में केवल 30% मत मिलने पर वैधता विवाद हुआ?

यह कोई समस्या नहीं था। सभी प्रतिनिधियों को साथी माना गया। जिन्होंने वोट नहीं दिया, उन्हें न्यूट्रल माना गया और केवल मतदान को वैध माना गया।

बन्द सत्र में रिपोर्ट पर गहन बहस न हो पाने की शिकायत का कारण?

बहस के लिए पर्याप्त जगह और अवसर था, लेकिन मुख्य चर्चा केंद्रीय समिति में हुई थी। जो कोई बहस करना चाहता था, अपनी बात रख सकता था।

महाधिवेशन में नए और पुराने राजनीतिक उम्मीदवार कैसे चुने गए? आप उम्मीदवार क्यों नहीं बने?

पुराने और वर्तमान पार्टी में कुछ फर्क है। मुझे उम्मीदवार बनने की जरूरत नहीं लगी। केंद्रीय सदस्य और सांसद दोनों का भूमिका एक जैसी है। पार्टी में जिम्मेदारी निभाने का तरीका अलग होता है, पर पद और सम्मान में फर्क नहीं।

सुदूरपश्चिम के साथियों ने कहा कि “आप फिर आ सकते हैं।”

अध्यक्ष को 51 केंद्रीय सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है। क्या आपने वचन देकर उम्मीदवार नहीं बने?

मैं प्रतिबद्धता के कारण नहीं लड़ा। रास्वपा में विभिन्न समूह हैं, जिनमें मैं भी एक समूह से आता हूं। इसे कैसे देखना है यह पार्टी नेतृत्व निर्णय करेगा।

पार्टी और सरकार के बीच टकराव की आशंका है, आपकी राय क्या है?

पार्टी और सरकार के बीच कोई अहित नहीं है। बाहरी लोगों की गलत जानकारी से ऐसा लगता है। सरकार में रहने वालों और न रहने वालों के बीच कुछ मतभेद हैं, पर नेतृत्व स्तर पर विचारधारा का संघर्ष नहीं है।

सरकार और पार्टी नेतृत्व में मतभेद दिखाई देते हैं। मीडिया में विवाद, सुकुमवासी मामले में दो धाराएं हैं, आप क्या कहते हैं?

मीडिया में बहस उचित नहीं। ऐसा कोई स्पष्ट कहावत प्रधानमंत्री ने नहीं दी है।

पुरानी राजनीति की तुलना आज के सरकार और विपक्ष से करें तो भिन्नता दिखती है। सत्ता पक्ष की आलोचनाएँ ज्यादा सुनाई देती हैं, लेकिन इससे सरकार को मदद नहीं मिलती। सरकार के अस्तित्व को लेकर सवाल पूछे जाते हैं तो समर्थन भी मिलता है। कुछ मंत्रियों के काम पर मुझे संतोष नहीं है। प्रधानमंत्री की भी हर बात से सहमति होना संभव नहीं है।

फोटो / वीडियो: कमल प्रसाईं

नेपालय ने २५ वर्ष से कम उम्र के ७५ युवा लेखकों की कृतियाँ जारी कीं

नेपालय ने २५ वर्ष से कम उम्र के ७५ युवा लेखकों की कहानियाँ, कविताएँ और निबंधों को समेटे कृति शनिवार को काठमांडू में जारी की। नारायण वाग्ले, श्रवण मुकारूंग और भूषिता वशिष्ठ ने युवा लेखकों की सृजनात्मकता और वैचारिक परिपक्वता की प्रशंसा करते हुए इस दिन को ऐतिहासिक बताया। नेपालय के २०वें वार्षिकोत्सव पर आयोजित साहित्य महोत्सव में पठन संस्कृति के साथ ही आख्यान विधा के विभिन्न विषयों पर चर्चा और संवाद भी किया गया। काठमांडू के कालिकास्थान में स्थित नेपालय का आरशाला दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था। आमतौर पर साहित्यिक सभाओं में देखे जाने वाले परिचित चेहरे से अलग युवा चेहरे की मौजूदगी ने कार्यक्रम का स्वरूप मधुर बना दिया। ऑस्ट्रिया के वियना विश्वविद्यालय में प्राध्यापनरत लेखिका अलका आत्रेय चुड़ाल ने कहा, ‘युवा लेखकों की इतनी उत्सुकता देखकर मैं अचंभित रह गई। वे किताबें खरीदकर पढ़ रहे हैं, साहित्य के प्रति उत्साह जागृत हुआ है। आज का दृश्य बहुत सुंदर लगा।’

पिछले वर्ष नेपालय ने २५ वर्ष से कम उम्र के लेखकों से कहानियाँ, कविताएँ और निबंधों (ककनी) के लिए आमंत्रण दिया था। चयनित ७५ लेखकों की रचनाएँ शनिवार को लोकार्पित की गईं। २५ वर्ष से कम उम्र के २५ कथाकार, २५ कवि और २५ निबंधकारों की रचनाओं के संगम ने नेपालय के आंगन में नई आवाजों की सृजनात्मक लहर ला दी है। इतनी कम उम्र में लेखक बनने पर वे एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। चयनित कवि आर्य निरौला धरान के हैं और काठमांडू में मनोविज्ञान में स्नातक अध्ययनरत हैं। उन्होंने कहा, ‘मुझे ऐसा मंच मिला जो मेरे लिए असंभव था।’

कथा विधा में प्रकाशित पुस्तक में अजय कार्की, अनिता धिताल, अनुष्का लामिछाने, अमित भट्टराई, आर्या अधिकारी, ईशान ढकाल, उमेश कार्की, कविराज क्षत्री, कृतिशा अमात्य, तेजकुमार राई, दीपक गौतम, दीपिका खतिवड़ा, नवीन धमला, निश्चल भण्डारी, नीरव, परीक्षा शर्मा, प्रनिका श्रेष्ठ, प्रशांत वाग्ले ‘प्राकृतिक’, मुधुसुदन घिमिरे, रोदिनलाल श्रेष्ठ, शिवराज शाही, समर्पण न्यौपाने, समिन गैरे, सुमन पौडेल और सोमनाथ लुइटेल की कहानियाँ संकलित हैं। इन चयनित कथाकारों के साथ नारायण वाग्ले ने एक घंटे की खुली बातचीत की। ‘आपकी कथा शैली और कला पढ़कर मैं हैरान रह गया,’ चयनकर्ता ने कहा, ‘आज आपके परिपक्व प्रश्नों और धारणा ने मुझे जेनजी के आख्यान आंदोलन का अनुभव कराया।’

इसी प्रकार कविता विधा में अनिता तिवारी, अनुपा गैरे, आर्य निरौला, उत्सव आचार्य, उषा लिम्बू, कम्मन रावल, गायत्री नेपाल, गौरव न्यौपाने, जोनसन श्रेष्ठ, डोल्मा लामा, तीर्थराज विश्वकर्मा, दुर्गा खतिवड़ा, नवीनकुमार नेपाली, नारन न्यौपाने, प्रज्वल लोहनी, प्रदीप योङ्हाङ्, प्रिशा शशी, युक्ता सुनुवार, रसिला धमला, श्रव्य आरिया, समृद्ध हमाल, सुजता बस्याल, सुदर्शनप्रकाश खड्का, सुरंगा सेढ़ाई और स्पन्दन झा चयनित हुए हैं। इन कवियों के साथ कवि और आख्यानकार श्रवण मुकारूंग ने एक खुला सत्र आयोजित किया। ‘आपकी कविताओं ने मुझे पुरानी थोड़ी कोट जैसी अनुभूति दी, यह आपका समय है,’ श्रवण ने कहा, ‘नई आवाजें सुनना चाहने वालों के लिए मैं आपकी कृतियों की सिफारिश करता हूं।’

निबंध विधा में अनुकृत लामिछाने, अविरल जाग्री, कञ्चनकुमार बस्नेत, कवीन्द्र जोशी, कृषा दहाल, जयनी पंडित, जिज्ञासा सोनम, धीरजप्रताप मल्ल ठकुरी, नुमा थाम्सुहाङ, परिमलप्रकाश नेपाल, भूमिका थारू, मनस्वी बान्तवा, ममता घिमिरे, महिता श्रेष्ठ, मोहन संग्राम, विक्रम नेपाल, विनोद लामिछाने, विवेक भट्टराई, शून्य नयन, सलिना बास्तोला, संयोग बस्याल, संस्कृति रिजाल, सन्जिला खनाल, सागर घले और सापेक्ष चयनित हुए हैं। निबंधकार भूषिता वशिष्ठ ऑनलाइन माध्यम से नवप्रवेशी निबंधकारों से जुड़ी थीं। ‘आपकी रचनाएँ पढ़ पाना मेरे लिए केवल सौंदर्यपूर्ण ही नहीं बल्कि शिक्षाप्रद भी रहा,’ उन्होंने कहा, ‘आपके विषय वस्तु, शैली और साहित्यिक परिपक्वता अत्यंत सुंदर है।’

तीन विधाओं की रचनाओं के चयनकर्ता श्रवण मुकारूंग, नारायण वाग्ले और भूषिता वशिष्ठ ने ७५ रचनाकारों के साथ संवाद किया। कुछ लेखक देश और काठमांडू के बाहर से ऑनलाइन प्रस्तुत हुए। युवा लेखकों के परिपक्व विचार, तीव्र प्रश्न और गहरी जिज्ञासा ने तीनों चयनकर्ताओं को चकित कर दिया। श्रवण ने कहा, ‘आज का दिन नेपाली साहित्य के लिए ऐतिहासिक है, जहां मजबूत लेखक सृजनात्मक और वैचारिक हस्तक्षेप के साथ उभरे हैं।’

“पल्पसा कैफ़े” उपन्यास प्रकाशन से शुरू हुए हमारे २० वर्षों के सफर के अवसर पर नए पुस्तकों के लेखकों की खोज की गई है,’ नेपालय के टीम लीडर किरनकृष्ण श्रेष्ठ ने कहा, ‘उत्साही युवा लेखकों को एक साथ देखने से मुझे अपने साहित्यिक समुदाय के विस्तार का एहसास हुआ।’ सन् २०२५ में “२५ वर्ष के २५” शीर्षक से खुला रचना आह्वान किया गया था। ‘विश्वभर से उत्साहजनक सहभागिता मिली,’ आह्वान के प्रमुख और संपादक विमल आचार्य ने कहा, ‘युवाओं की मजबूत उपस्थिति ने साहित्य में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।’ युवाओं के न पढ़ने और न लिखने की धारणा पर भी गंभीर अनुसंधान हुआ है, आचार्य ने उल्लेख किया और ‘ककनी की कहानी’ अंतर्गत आह्वान ने विभिन्न पहलुओं पर तीन पुस्तकें प्रकाशित की हैं। नेपालय ने शनिवार सुबह ९ बजे से शाम ६ बजे तक विभिन्न कार्यक्रमों के साथ साहित्य उत्सव का आयोजन किया। इसके तहत इतिहासकार, समाजशास्त्री और “सन्धिकाल” पुस्तक के लेखक लोकरंजन पराजुली ने “नेपाल में पुस्तकालय और पठन परंपरा” विषय पर मुख्य वक्तव्य दिया। उन्होंने सार्वजनिक पुस्तकालय की आवश्यकता और महत्व पर युवा लेखकों के बीच सारगर्भित विचार रखे। नेपालय ने पिछले वर्ष प्रकाशित तीन उपन्यास — “जगज्जननी उनकी आमाको नाम होइन” के लेखक नारायण ढकाल, “सलह” के लेखक श्रवण मुकारूंग और “पैकेलो” के लेखक ओम रिजाल के बीच “आज का आख्यान” शीर्षक पर सृजना खड़का के संयोजन में चर्चा का आयोजन किया। उत्सव के अंत में नेपथ्य बैंड ने सन् २००४ की नेपाल यात्रा पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म प्रदर्शित की। साथ ही नेपालय ने हर अंग्रेजी महीने की तीसरी शुक्रवार को आरशाला में फिल्म क्लब स्थापना की घोषणा की। युवा लेखकों की कहानियाँ, कविताएँ और निबंधों सहित तीन पुस्तकों के सेट की कीमत १९९५ रुपये है। ये पुस्तकें देश के विभिन्न पुस्तक स्थलों और अनेक वेबसाइटों तथा अमेज़न के माध्यम से विश्वभर खरीदी जा सकती हैं।

गाजा विवाद में ट्रम्प की १५ बिंदु योजना को नेतन्याहू ने अस्वीकार किया

२४ साउन, काठमाडौं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रस्तावित गाजा संबंधी १५ बिंदु योजना को अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है, “जब तक हमास पूरी तरह से हथियार नहीं छोड़ता, इजरायली सेना गाजा से वापस नहीं आएगी।” रविवार को नेतन्याहू ने कहा, “इजरायल उक्त १५ बिंदु समझौते को स्वीकार नहीं करेगा, जब तक हमास पूर्ण रूप से हथियार त्याग नहीं देता, तब तक इजरायल की सेनाएं वहां से पीछे हटेंगी नहीं। साथ ही, इजरायल अपने सैनिकों और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।”

पिछले महीने ट्रम्प की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र समूहों के पूर्ण निशस्त्रीकरण का समझौता होने का दावा किया था। हालांकि, हमास ने बड़े पैमाने पर हथियार सौंपने का निर्णय इजरायल के आक्रमण रोकने और गाजा क्षेत्र से सैनिकों को वापस बुलाने पर निर्भर रहने का स्पष्ट किया है। नेतन्याहू ने कहा कि हमास को पहले हथियार छोड़ना होगा और यह प्रक्रिया केवल कागजी या दिखावा आधारित नहीं होनी चाहिए। इस संदर्भ में अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत जारी है, जिसके तहत कुछ प्रस्ताव आए हैं जिन्हें इजरायल स्वीकार नहीं कर सकता।

एक वर्ष में 4 लाख 20 हजार से अधिक लोग लंदन छोड़े, राजधानी के आकर्षण में कमी

ब्रитан के राजधानी लंदन में बढ़ती जीवनयापन लागत, महंगे किराए और बेरोजगारी के कारण एक वर्ष में 4 लाख 20 हजार से अधिक लोग शहर छोड़कर अन्य स्थानों पर रहने चले गए हैं। वर्क फ्रॉम होम संस्कृति के विकास और बेहतर जीवनशैली की तलाश करते हुए युवा पीढ़ी राजधानी को छोड़कर बकिंघमशायर, बर्मिंघम और स्कॉटलैंड जैसे सस्ते और शांत शहरों की ओर आकर्षित हो रही है। लंदन का महत्व कायम रहने के बावजूद इस बढ़ती प्रवासन का शहर के आवास और श्रम बाजार पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने का विश्लेषण करते हुए मेयर सादिक खान आवास और रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

लंदन को दशकों से अवसरों का शहर माना जाता रहा है। बेहतर नौकरी, उच्च शिक्षा, विश्वस्तरीय चिकित्सा सेवा और अंतरराष्ट्रीय जीवनशैली के कारण लाखों लोगों की पसंद रहा यह शहर अब नए चुनौतियों का सामना कर रहा है। हाल ही में जारी नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस के आंकड़ों के अनुसार, जून 2025 तक एक वर्ष में 4 लाख 20 हजार 492 लोगों ने राजधानी छोड़ी और ब्रिटेन के अन्य शहरों या ग्रामीण इलाकों में बसने चले गए। विश्लेषकों के मुताबिक यह केवल सामान्य प्रवासन नहीं, बल्कि जीवनशैली में बदलाव का संकेत है।

लंदन में किराया और घरों की कीमत लगातार बढ़ रही है। दैनिक उपभोक्ता वस्तुएं, परिवहन और अन्य सेवाओं की लागत भी ब्रिटेन के अधिकांश शहरों से अधिक है। इसलिए कई परिवार और युवा पेशेवर कम खर्च वाले शहरों की ओर जाने लगे हैं। कोरोना महामारी के बाद घर से काम करने की वर्क फ्रॉम होम संस्कृति तेजी से विकसित हुई है। पहले नौकरी के लिए लंदन में रहना अनिवार्य होता था, लेकिन अब कई कंपनियां दूर से काम करने की सुविधा देती हैं, जिससे लोगों को बड़े शहर में रहने की आवश्यकता कम लगने लगी है।

लंदन में 6.5 प्रतिशत बेरोजगारी दर ब्रिटेन के किसी भी अन्य क्षेत्र के मुकाबले सर्वाधिक है, जबकि राष्ट्रीय औसत दर 4.9 प्रतिशत है। कर से जुड़ी जानकारियों के अनुसार, अन्य क्षेत्रों की तुलना में लंदन में वेतन वृद्धि दर भी धीमी है। आंतरिक प्रवासन के विश्लेषण से पता चलता है कि लंदन छोड़कर बकिंघमशायर, बर्मिंघम, स्कॉटलैंड, एसेक्स, ब्राइटन और ब्रिस्टल प्रमुख गंतव्य हैं। राजधानी छोड़ने वालों में विशेष रूप से 30 से 40 वर्ष के आयु वर्ग के लोग और उनके बच्चे अधिक संख्या में हैं।

नए शोध से पता चला है कि अपराध की स्तर, करियर के अवसरों की कमी और बढ़े हुए किराए के कारण आने वाले पांच वर्षों में पांच में से दो युवा लंदन छोड़ सकते हैं। ‘लंदन हेरिटेज क्वार्टर’ की नई रिपोर्ट में 18 से 30 वर्ष की आयु समूह के लोगों में जीवन स्तर में तेज गिरावट देखी गई है। इस प्रक्रिया में कई लंदन के युवाओं ने राजधानी की जिंदगी को अवसर से अधिक ‘‘जिंदगी बचाने के संघर्ष’’ के रूप में देखना शुरू कर दिया है।

हालांकि, लंदन का महत्व कम नहीं हुआ है। यह अभी भी ब्रिटेन का सबसे बड़ा आर्थिक, वित्तीय और सांस्कृतिक केंद्र है। हर साल हजारों अंतरराष्ट्रीय छात्र, कुशल जनशक्ति और प्रवासी लंदन आते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आंतरिक प्रवासन बढ़ने के बावजूद विदेश से आने वाली आबादी भविष्य में इस कमी को संतुलित कर सकती है। लंदन के मेयर सादिक खान के प्रवक्ता ने कहा है कि मेयर को लंदन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ शहर बनाने में कोई संदेह नहीं है। “सादिक लंदन को सभी के लिए उपयुक्त शहर बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। वे काउंसिल हाउसिंग का निर्माण कर रहे हैं, 3 लाख 30 हजार से अधिक नए रोजगार सृजन में सहयोग कर रहे हैं, अपराध कम करने के लिए मेट्रोपोलिटन पुलिस के साथ काम कर रहे हैं,” प्रवक्ता ने कहा, “साथ ही सभी उम्र के लोग उन्नति कर सकें, अवसर पा सकें और गुणवत्तापूर्ण जीवन यापन कर सकें, इसे सुनिश्चित करने में वे सक्रिय हैं।

यालुङ री हिमपहिरो: ९ महीनों बाद दोलखा के हिमालय में पांच लोगों के शव मिले, प्रतिकूल मौसम में क्यों किया गया संचयन?

यालुङ री

तस्वीर स्रोत, Reuters/Mingma Sherpa

तस्वीर का कैप्शन, यालुङ री को नेपाल में एक ट्रेकिंग पीक की सूची में शामिल है

दोलखा के यालुङ री हिमालय में हिमपहिरो में पिछले साल कार्तिक से लापता पाँच पर्वतारोही और शेर्पा गाइड के शव पिछले सप्ताह ‘हिम पिघलने’ के कारण सतह पर दिखने के बाद रविवार को संचयन किए गए, ऐसा बचावकर्मी और अधिकारियों ने बताया।

पर्वतारोही और हेलीकॉप्टर बचावकर्ताओं के एक समूह ने बीबीसी को बताया कि उक्त शव ‘ट्रेकिंग पीक’ के रूप में प्रसिद्ध इस पर्वत की चोटी के पास से एकत्रित किए गए। उन्होंने बताया कि शव को दोलखा के ना गांव लाया गया है।

“जीवन की उम्मीद खत्म हो गई थी पर महीनों से शव की खोज बंद नहीं हुई थी। अंततः कई प्रयासों के बाद अब उनके परिवार के पास शव प्राप्त होने का अवसर है,” बचाव में शामिल पर्वतारोही फुर्वा तेंजिंग शेर्पा ने ना गांव से बीबीसी से कहा।

“पिछले सप्ताह के अंत में कुछ स्थानीय लोगों ने शव दिखाई देने की सूचना दी थी। लेकिन मौसम के अनुकूल न होने के कारण वहां पहुंचने में समस्या थी। रविवार सुबह थोड़े समय के लिए खुला मौसम मिलने पर जल्दी-जल्दी शव नीचे लाने का कार्य संभव हुआ।”

वर्षा ऋतु जारी होने से फिर से हिमपात और हिमपहिरो में शव खो जाने की संभावना को लेकर चुनौतिपूर्ण तरीके से शव संग्रह किया गया, इसमें शामिल लोगों ने बताया।

हुथी विद्रोहीयों ने सऊदी के लाल सागर तट पर स्थित रिफाइनरी पर ड्रोन हमला करने का दावा किया

यमन के हुथी विद्रोहीयों ने सऊदी अरब के लाल सागर तट पर जिजान में स्थित तेल प्रसंस्करण केंद्र पर ड्रोन से हमला करने का दावा किया है। सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय ने रिफाइनरी में लगी आग को नियंत्रित कर लिया है और इस घटना में किसी भी व्यक्ति के घायल न होने की जानकारी दी है। हुथी विद्रोही के प्रवक्ता याह्या सारी ने कहा है कि यह हमला सऊदी ड्रोन हमलों के जवाब में किया गया है।

सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार रविवार सुबह जिजान की रिफाइनरी के एक केंद्र में आग लगी थी, जिसे औद्योगिक सुरक्षा और अग्नि नियंत्रण टीम ने नियंत्रित कर लिया है। मंत्रालय ने बताया कि इस घटना में किसी को कोई चोट नहीं आई है। आग लगने के कारण का अभी खुलासा नहीं किया गया है।

हुथी विद्रोहीयों ने जुलाई महीने में भी इसी रिफाइनरी को निशाना बनाकर हमला करने का दावा किया था। सऊदी अरब यमन में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है और एक दशक से अधिक समय से यमन के गृहयुद्ध में संलग्न है। 2022 में हुए युद्धविराम के बाद यह संघर्ष तुलनात्मक रूप से शांत दिखा था, लेकिन अब यह फिर से तनावपूर्ण हो गया है।