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लेखक: space4knews

एकता का सुन्दर संदेश

हिमाल की सफेद बर्फ सुंदरता का संदेश दे रही है। पहाड़ की कल-कल बहती झरना दोस्ती का संदेश दे रही है। तराई के हरे-भरे मैदान समृद्धि का संदेश दे रहे हैं। नेपाल माँ समुदाय के बीच एकता का संदेश दे रही है। बुद्ध, जनक भृकुटी और सीता सत्य का संदेश दे रहे हैं। दशरथ, गंगा, भक्ति और दुर्गा वीरता का संदेश दे रहे हैं। स्वर्गधारी और मनोकामना धार्मिकता का संदेश दे रहे हैं। नेपाल माँ समुदाय के बीच समानता का संदेश दे रही है। लालीगुराँस, गुलाब और चमेली विविधता का संदेश दे रहे हैं। दौरा, फरीया और धोती-कुर्ता पारम्परिकता का संदेश दे रहे हैं। सिसम, टीका, सिसौ और साल प्राकृतिक सुंदरता का संदेश दे रहे हैं।

मानव तस्करी नियंत्रण संशोधन विधेयक में २२ बिंदुओं में संशोधन के सुझाव

समाचार सारांश

  • मानव तस्करी तथा ओसार-प्रसार (नियंत्रण) अधिनियम २०६४ में संशोधन हेतु विधेयक को समयानुकूल बनाने पर जोर दिया गया है।

२२ साउन, काठमांडू। मानव तस्करी तथा ओसार-प्रसार (नियंत्रण) अधिनियम २०६४ में संशोधन के लिए तैयार किया गया विधेयक समयानुकूल होना चाहिए, यह बात संबंधित पक्षों ने कही है।

महिला, कानून और विकास मंच (एफडब्लुएलडी) ने प्रतिनिधि सभा के सांसदों के साथ इस विधेयक पर चर्चा का आयोजन किया। चर्चा में भाग लेने वालों ने संशोधन विधेयक के कई प्रावधानों पर आधारित सुधार की आवश्यकता बताते हुए कहा कि अगर विधेयक में किए गए प्रावधानों को और संशोधित किया गया तो यह अधिक समयानुकूल होगा।

शुक्रवार को प्रतिनिधि सभा में पेश ‘मानव तस्करी तथा ओसार-प्रसार (नियंत्रण) प्रथम संशोधन विधेयक २०८३’ में २२ अतिरिक्त बिंदुओं को संशोधित करने की बात एफडब्लुएलडी के कार्यकारी निदेशक अधिवक्ता सविन श्रेष्ठ ने कही।

कार्यक्रम में दफा १ की उपधारा (३), दफा २, दफा ४, दफा ५, दफा ८ (क), दफा ११, दफा १२, दफा १३, दफा १४, दफा १५, दफा १७, दफा २० (क), दफा २२, दफा २३, दफा २३ (क) और दफा २३ (ख), दफा २५, दफा २६, दफा २७, दफा २७ (क), दफा २७ (ख), दफा २९ (क) जैसे प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा कर संशोधन करने का सुझाव दिया गया।

मानव तस्करी और ओसार-प्रसार के स्वरूप लगातार बदल रहे हैं, इसलिए कानून निर्माण में विशेष ध्यान देना आवश्यक है, इस पर सांसदों को सुझाव दिया गया। वर्ष २०४३ में जिउ मास्ने बेचने के अधिनियम के रूप में स्वतंत्र कानून लागू हुआ था जिसका बाद में २०६४ में संशोधन कर मानव तस्करी तथा ओसार-प्रसार अधिनियम बनाया गया। कार्यकारी निदेशक श्रेष्ठ ने बीते को याद करते हुए कहा, ‘उस अधिनियम को लागू हुए २० वर्ष बाद यह संशोधन विधेयक आया है। इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों से मेल खाने के लिए संशोधित करना आज की आवश्यकता है क्योंकि मानव तस्करी और ओसार-प्रसार केवल स्वदेश तक सीमित नहीं है।’

नेपाल पार्लियामेंट प्रोटोकॉल के अनुसार नेपाल मानव तस्करी के लिए न केवल स्रोत देश बल्कि गंतव्य देश भी बन चुका है। इसलिए संशोधन विधेयक में अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों का समुचित समावेश करना आवश्यक बताया गया।

एफडब्लुएलडी के विनोदचन्द्र देवकोटा ने चर्चा कार्यक्रम का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा कि तीनों स्तर की सरकारें होने के बावजूद मानव तस्करी तथा ओसार-प्रसार अधिनियम स्पष्ट रूप से लागू नहीं हो पाया है। उन्होंने पूछा कि क्या मानव तस्करी और ओसार-प्रसार कार्य अलग-अलग गतिविधियाँ हैं और क्या इन्हें अलग-अलग समझा जाना चाहिए?

कार्यक्रम में सांसद प्रेमबहादुर वैयाक ने कम्बोडिया और ऑस्ट्रेलिया में हुई मानव तस्करी की घटनाओं का उद्धरण दिया और पूछा कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए विधेयक में क्या प्रावधान किए जा सकते हैं। वहीं सांसद सुशीला ढकाल आचार्य ने विदेश में पीड़ितों को कानूनी सहायता प्रदान करने संबंधी सुझाव मांगे।

सांसद विष्णुमाया परियार, साजदा सिद्दिकी, यसोदा बराल, पवित्रा विश्वकर्मा, राधिका रम्तेल, सिर्जना श्रेष्ठ, प्रभा कार्की, सरस्वती लामा, खेमराज कोइराला ने नेपाल में मानव तस्करी और ओसार-प्रसार के विभिन्न आयामों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि बाल-बालिका और महिलाएं अधिक प्रभावित होती हैं जबकि हाल के समय में पुरुष भी प्रभावित हो रहे हैं, इसलिए सभी वर्गों को ध्यान में रखकर कानून बनाना जरूरी है।

सरकारी अक्षमता के कारण उत्पन्न कृत्रिम संकट

२२ साउन, काठमाडौं। पछिले २२ दिनहरूमा काठमाडौं उपत्यका सहित देशभर देखा परिरहेको खाना पकाउने एलपी ग्यासको भयंकर कमी अन्तर्राष्ट्रिय बजारको संकट वा आयातमा अवरोधका कारण नभई पूर्ण रूपमा सरकार र नेपाल आयल निगमको दूरदर्शिताहीन नीति, कमजोर व्यवस्थापन र बजार नियन्त्रण हराएको कारण उत्पन्न ‘मानव-निर्मित’ संकट हो। ग्यास लिन खाली सिलिन्डर बोकेर डिपो र उद्योगको अगाडि दिनभर लाइनमा बस्नुपर्ने अवस्था सरकारी संयन्त्रको गम्भीर असफलताको संकेत हो। यसअघि पनि बजारमा ग्यास अभाव बढेपछि आयल निगमले २०८२ माघ अन्त्यदेखि आधा सिलिन्डर (७.१ किलो) मात्रै बिक्री गर्ने व्यवस्था गरेको थियो। त्यतिबेला आधा सिलिन्डर वितरणले बजार अभाव केही हदसम्म कम थियो। तर मध्यपूर्वी तनाव कम भएसँगै निगमले ३१ असार २०८३ देखि पुनः पूर्ण तौलको सिलिन्डर बिक्रीमा फर्किएको थियो। पूर्ण सिलिन्डर उपलब्ध भएपछि बजारमा उपभोक्ताको माग अचानक बढ्यो र अहिले डिलरदेखि उद्योगसम्म लामो लाइन देखिन्छ। कृत्रिम अभावको मुख्य कारण निगमको नीति अस्थिरता र बजार मनोविज्ञान नबुझ्नु हो। माघ अन्त्यमा निगमले संकट टार्न १५ दिन मात्र आधा सिलिन्डर बिक्री गर्ने भन्यो, तर चार महिनासम्म पनि आधा सिलिन्डर नै वितरण जारी रह्यो। उपभोक्ताले आधा सिलिन्डर प्रयोग गर्दा पनि सिलिन्डर साट्न नसक्दा घरमा थन्किए। तर कुनै वैज्ञानिक मूल्यांकन नहुँदै पुनः पूर्ण सिलिन्डर वितरण खोलियो। यसले घरमा थन्किएका सिलिन्डर एकैचोटि बजारमा आए, जसले व्यवस्थापनमा समस्या ल्यायो। यसअदूरदर्शी निर्णयले बजार संतुलन भंग गरायो र त्यसको प्रभाव सामान्य उपभोक्ताले भोग्नुपर्यो।

निगमको दाबी: कोटा बढाएर ५५ हजार टन पुर्‍यायौं
आयल निगमले ग्यासको नियमित कोटा ४९ हजार ५०० टनबाट बढाएर हाल ५४ देखि ५५ हजार टन पुर्‍याएको जनाएको छ। प्रवक्ता मनोज ठाकुरले बताए अनुसार भारतबाट ग्यास निरन्तर आपूर्ति भइरहेको छ र यसै महिना १–१८ गतेसम्म करिब ३२ हजार टन ग्यास लोड भइसकेको छ। आयात वृद्धि र आइतबार पनि ग्यास लोड भइरहेकोले चाँडै बजार सहज हुने निगमको विश्वास छ। निगमको तथ्यांक अनुसार साउन १० देखि २१ सम्म १२ दिनमा कुल १७ लाख ५४ हजार १५४ सिलिन्डर (१३११ बुलेट) बराबर ग्यास विक्री भएको छ। दैनिक औसत विक्री करिब १ लाख १० हजार सिलिन्डर छ।
अभावको कारण: प्यानिक किन्ने प्रवृत्ति र खाली स्टक
नेपाल एलपी ग्यास उद्योग संघले उपभोक्ताको ‘प्यानिक बाइङ’ (अत्तालिएर किन्ने प्रवृत्ति) मुख्य अभावको कारण भएको बताएको छ। २०८२ फागुनदेखि २०८३ असारसम्म आयात कम हुँदा पुरानो स्टक सकिएको र आधा सिलिन्डर भण्डारण गर्न नपाएकाले उपभोक्ताको घरमा ग्यास सकिएको थियो। निगम प्रवक्ता ठाकुरले भने, ‘उपभोक्ताको घरमा थन्किएको ग्यास सकिसकेको थियो र पूर्ण तौलको सिलिन्डर आउँदा माग अचानक बढ्यो। प्यानिक किन्ने व्यवहारले तत्काल आवश्यक व्यक्तिलाई समस्या परेको छ।’ घरायसी प्रयोजनलाई प्राथमिकता दिन आग्रह गर्दै ठाकुरले सरकारले होटल तथा उद्योगहरूमा अनुगमन गरिरहेको बताए तर विक्रेताले नै घरायसी उपभोक्तालाई प्राथमिकता दिनुपर्नेमा जोड दिए। विक्रेता र डिलरले ग्राहकलाई चिनेर ग्यास वितरणमा व्यवस्थापन गर्नुपर्ने बताए।

निगमका अनुसार नेपालमा मासिक ३१–३२ लाख सिलिन्डर ग्यास खपत हुन्छ र दैनिक १ लाख ८ हजार सिलिन्डर माग छ।
ग्यास उद्योग संघको भनाइ: आपूर्ति सहज हुन अझै १५–२० दिन लाग्ने, कोटा बढाए पनि बोक्ने बुलेट अभाव
नेपाल एलपी ग्यास उद्योग संघले यो अभाव कम हुन अझै १५–२० दिन लाग्ने जानकारी दिएको छ। आयल निगमले आधा सिलिन्डरबाट पूर्ण तौलको सिलिन्डर पठाउँदा बजारमा अभाव बढेको संघले जनाएको छ। संघ अध्यक्ष दिवान चन्दका अनुसार आयात बढे पनि ग्यास बोक्ने ग्यास बुलेटको संख्या सीमित छ र सोही अनुसार मात्र ग्यास ल्याउन सकिन्छ। बुलेटको अभावले आपूर्ति वृद्धि गर्न सकिँदैन। उनका अनुसार बजारमा आधिकारिक दर्ता भएका सिलिन्डर १ करोड ७५ लाख हाराहारी छन्, जुन दुई वर्षअघिको १ करोड ५५ लाखभन्दा बढी हो। अभाव हुँदा ग्यास उद्योगी र विक्रेता होटल तथा व्यवसायलाई मात्र ग्यास वितरण गर्छन् भन्ने आरोप संघले खण्डन गरेको छ। संघले निगमलाई दैनिक रिपोर्ट दिइरहेको छ र सरकारले अनुगमन गर्ने उल्लेख गरेको छ। संघले अभाव बिस्तारै घट्दै गएको र २० दिनभित्र समस्या पूर्ण समाधान हुने विश्वास व्यक्त गरेको छ। सरकारले बजार व्यवस्थापनका लागि दैनिक विज्ञप्ति जारी गर्दै उद्योग, वाणिज्य तथा आपूर्ति मन्त्रालयले विक्रेताहरूलाई कालोबजारी र कृत्रिम अभाव रोक्न, उपभोक्ताको गुनासो सुन्न र बजार व्यवस्थापन सहज बनाउन सूचनाहरु प्रकाशित गर्दै आएको छ। अनुगमन टीम र हटलाइन नम्बरहरु पनि सार्वजनिक छन्। तर सरकारले दिएको फोन नम्बरमा सम्पर्क नलाग्ने वा गुनासो समाधान नगर्ने गुनासो उपभोक्ताबाट जारी छ। राज्यको वितरण प्रणाली सामान्य उपभोक्ताको लागि क्रूर छ भने ठूला व्यापारीको लागि उदार देखिन्छ। संकटको समयमा आम नागरिकले एक सिलिन्डर पनि नपाउँदा ठूला होटल र रेस्टुरेन्टहरूले ग्यास अभाव महसुस गरेका छैनन्। उद्योगी र डिलरहरूले ठूलो लाभका लागि ग्यास सिधै होटलहरूमा डिलिभरी गरिरहेको आरोप उपभोक्ता अधिकारकर्मीहरूले लगाएका छन्। विपद् अवस्थामा व्यवसायिक प्रयोजनको ग्यास कटौती गरी घरायसी काममा प्राथमिकता दिनुपर्ने जिम्मेवारी सरकारले पूरा नगरेको आरोप पनि छ। आयात तथ्यांक देखाएर आफ्नो अक्षमता छोप्ने सरकारी प्रवृत्तिलाई आलोचना गरिएको छ। साउन महिनामा मात्र ३२ हजार टनभन्दा बढी ग्यास आयात भए पनि सो ग्यास कहाँ र कसरी वितरित भयो भन्ने जवाफ सरकारले दिन सकेको छैन। ग्यास पर्याप्त भए पनि बजारमा हाहाकार हुनु प्रणालीभित्रको चुहावटको संकेत हो। यस्तो अवस्था हुँदा पनि सरकार उपभोक्तालाई दोषारोपण गर्दै छ, जसले आपूर्ति प्रणालीमा सरकारको उपस्थिति शून्य र व्यवस्थापन असफल भएको पुष्टि गर्छ।

ग्रीन बूट्स: 30 वर्षों से सगरमाथा की चोटी के करीब फंसे शव

पिछले 30 वर्षों से सगरमाथा की चोटी के पास कठोर हिमालयी परिस्थितियों में मृत्यु हो चुकी एक पर्वतारोही का शव हिम बर्फ में फंसा हुआ है। उनकी पहनी हुई हरी जूतों के कारण पर्वतारोहण समुदाय में उन्हें ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से जाना जाता है। भारत नियंत्रित कश्मीर में लद्दाख के दोर्जे मोरुप मई 1996 में भारतीय टीम के साथ तिब्बती मोहड़ा से सगरमाथा चढ़ाई के लिए रवाना हुए थे।

चोटी पर पहुंचने के बाद लौटते समय अचानक आई हिम तुफान में वह अपने दो साथियों के साथ फंस गए थे। उनके शव मिले हैं, लेकिन अन्य दो साथियों की अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है। सूत्रों के अनुसार ‘ग्रीन बूट्स’ अब सगरमाथा पर चढ़ने वालों के लिए मार्गदर्शन करने वाले संकेत की तरह बन चुके हैं। भारत सरकार ने उनके शव को वहां से निकाल कर परिवार को लौटाने के लिए रेस्क्यू करने वालों की तलाश शुरू कर दी है।

धनञ्जय लक्षण फिर से पोखरा एभेन्जर्स के लिए खेलने को तैयार

श्रीलंकाई ऑलराउंडर धनञ्जय लक्षण आगामी नेपाल प्रिमियर लिग के तीसरे संस्करण में पोखरा एभेन्जर्स की टीम से खेलेंगे। पोखरा एभेन्जर्स के महाप्रबंधक अमित लोहनी ने उन्हें टीम में स्वागत करते हुए यह अवसर पाकर उत्साह व्यक्त किया है। पोखरा ने पहले ही बांग्लादेश के शाकिब अल हसन को विदेशी खिलाड़ी के रूप में और श्रीलंका के अजंता मेंडिस को मुख्य कोच के रूप में अनुबंधित कर लिया है। २२ साउन, काठमांडू।

धनञ्जय लक्षण आगामी नेपाल प्रिमियर लिग (एनपीएल) के तीसरे संस्करण में भी पोखरा एभेन्जर्स का प्रतिनिधित्व करेंगे। पोखरा ने शुक्रवार को लक्षण को फिर से टीम में शामिल करने की घोषणा की। उन्होंने पिछले संस्करण में भी पोखरा के लिए बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों में प्रभावशाली प्रदर्शन किया था। 27 वर्षीय बाएं हाथ के बल्लेबाज और दाएं हाथ के मीडियम फास्ट गेंदबाज लक्षण श्रीलंका के लिए तीन एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं। उन्होंने टी-20 क्रिकेट में 70 मैचों में 48 विकेट लिए हैं। वे घरेलू और विभिन्न फ्रेंचाइजी प्रतियोगिताओं में भी नियमित रूप से खेलते आए हैं।

पोखरा एभेन्जर्स के महाप्रबंधक अमित लोहनी ने कहा कि लक्षण को फिर से टीम में शामिल करके वे बहुत उत्साहित हैं। उन्होंने कहा, ‘धनञ्जय लक्षण को फिर से पोखरा एभेन्जर्स परिवार में स्वागत करते हुए हमें खुशी हो रही है। हम सत्र 3 में भी और ज्यादा संतुलित और प्रतिस्पर्धात्मक बनने की उम्मीद रखते हैं।’ एनपीएल के तीसरे संस्करण के लिए, पोखरा ने पहले से ही मार्की खिलाड़ी कुशल भुर्तेल के साथ सागर ढकाल, अर्जुन कुमाल, विपिन खत्री, आकाश चन्द, किरण ठगुन्ना, दिनेश खरेल को रिटेन किया है। ऑक्शन के माध्यम से विवेक राणा मगर, सुदीप आर्याल, सन्नी बीके, विपिन आचार्य और प्रतीक पोखरेल को टीम में जोड़ा गया है। पोखरा ने पहले ही बांग्लादेश के अनुभवी ऑलराउंडर शाकिब अल हसन को विदेशी खिलाड़ी के रूप में अपने साथ जोड़ा है, जबकि श्रीलंका के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अजंता मेंडिस मुख्य कोच हैं।

धर्म गौतम ने ‘बीपी और विद्रोह के वो दिन’ पुस्तक का अनावरण किया

इलाम के धर्म गौतम ने पञ्चायती व्यवस्था के विरुद्ध बीपी कोइराला द्वारा आह्वान किए गए सशस्त्र संघर्ष की कथा समाहित पुस्तक ‘बीपी और विद्रोह के वो दिन’ का सार्वजनिक अनावरण किया है। पब्लिशर्स की सीईओ कल्पना ढकाल के अनुसार, इस पुस्तक में गौतम ने अपने व्यक्तिगत एवं राजनीतिक संस्मरणों को प्रमुखता से शामिल किया है। 2029 साल में भारत निर्वासन गए गौतम सशस्त्र संघर्ष के दौरान हथियारों के साथ गिरफ्तार हुए थे, जबकि स्वदेश लौटने के दौरान भी उन्होंने चार वर्ष का बंदी जीवन बिताया।

२२ साउन, काठमाडौं। पञ्चायती व्यवस्था के विरुद्ध बीपी कोइराला द्वारा आवाज़ित सशस्त्र संघर्ष की कथा को समेटते हुए इलाम के धर्म गौतम ने ‘बीपी और विद्रोह के वो दिन’ नामक पुस्तक लॉन्च की है। बीपी ने मेलमिलाप की नीति अपनाते हुए 2033 साल में स्वदेश लौटने से पहले अपनी तीन विश्वसनीय साथियों को नेपाल भेजा था, जिनमें से एक धर्म गौतम इलाम के थे। उन्होंने प्रकाशक किताब पब्लिशर्स की सीईओ कल्पना ढकाल को अपनी व्यक्तिगत व राजनीतिक स्मृतियों को पुस्तक में सम्मिलित करने की जानकारी दी।

गौतम बीपी कोइराला के निकटस्थ थे, जब वे 2029 साल में भारत निर्वासन गए थे। बीपी द्वारा पञ्चायती व्यवस्था के अन्त के लिए आह्वान किए गए सशस्त्र संघर्ष में वे भी भागीदार थे। इसी क्रम में भारत के पूर्णिया में हथियारों के साथ उन्हें गिरफ्तार किया गया। बीपी के निर्देशानुसार 2033 के कार्तिक में स्वदेश लौटते समय फिर गिरफ्तार होने पर उन्होंने लगभग चार वर्ष बंदी जीवन व्यतीत किया। गौतम ने इलाम से आरंभ हुई अपनी राजनीतिक यात्रा कैसे भारत के नक्सलबाड़ी, बनारस, बिहार होते हुए काठमांडू तक पहुँची, इसकी घटनाओं का प्रकाशन पुस्तक में किया है।

नेपाल-चीन संबंध: तिब्बत विषयक प्राज्ञिक सम्मेलन रद्द होने पर बढ़ी चिंता

नेपाल सरकार के अनुरोध पर तिब्बत अध्ययन संबंधी प्राज्ञिक सम्मेलन रद्द होने की खबर मिलने के बाद विशेषज्ञों ने इस घटना के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत संदेश देने की संभावना जताते हुए चिंता व्यक्त की है। अंतरराष्ट्रीय तिब्बती अध्ययन संघ और काठमांडू विश्वविद्यालय के संयुक्त आयोजन में अगस्त 23 से 29 तक होने वाला यह सम्मेलन चीन समेत विभिन्न देशों के 700 से अधिक प्रतिनिधियों के भाग लेने की तैयारी में था। आयोजक संस्था ने काठमांडू विश्वविद्यालय के निर्णय को ‘अति समस्याग्रस्त’ बताते हुए लिखित रूप में अभी तक रद्द किए जाने की सूचना नहीं मिलने की बात कही है।

विशेषज्ञों ने आयोजन द्वारा किए जा रहे तिब्बत संबंधी प्राज्ञिक कार्यक्रम की ‘प्रतिष्ठा’ पर बल देते हुए कहा है कि चीन के साथ संबंधों को ध्यान में रखते हुए तिब्बत मामले को संवेदनशील मानकर काठमांडू विश्वविद्यालय द्वारा अंतिम समय में कार्यक्रम रद्द करने की बजाय पूर्व तैयारी चरण में ही सतर्कता बरती जाती तो इससे बचा जा सकता था। कुछ विशेषज्ञ यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि चीन के दबाव में सरकार को यह निर्णय लेना पड़ा होगा, हालांकि बीजिंग ने इस विषय पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

काठमांडू विश्वविद्यालय से इस कार्यक्रम का संयोजन कर रहे प्रोफेसर ने इस सेमिनार को ‘राजनीतिक प्रकृति का नहीं’ बताते हुए इसके स्थगन से नेपाल को नुकसान होने की टिप्पणी की है। अंतरराष्ट्रीय तिब्बती अध्ययन संघ की महासचिव उलरिका रोइस्लर ने काठमांडू विश्वविद्यालय द्वारा कार्यक्रम से हाथ खींचने की खबर को आश्चर्यजनक करार दिया है और मात्र दो सप्ताह पहले इसे रद्द करना ‘अत्यंत समस्याग्रस्त’ बताया है।

नेपाल सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में ‘एक चीन’ नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है। इसी क्रम में काठमांडू विश्वविद्यालय के अंतर्गत हिमालयन सेंटर फॉर एशियन स्टडीज के निदेशक सागरराज शर्मा ने बताया था कि मुख्य सचिव ने विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों सहित स्थानीय प्रशासन को बुलाकर कार्यक्रम स्थगित करने का अनुरोध किया था। इस घटना ने नेपाल-चीन संबंधों में और जटिलता उत्पन्न कर दी है।

जनरेटिव एआई द्वारा विषाणु निर्माण की नई संभावना

स्टैनफोर्ड के नेतृत्व में शोध टीम ने जनरेटिव एआई का उपयोग करके प्राकृतिक तौर पर न पाए जाने वाले सिंथेटिक विषाणु बनाने में सफलता हासिल की है। इस तकनीक के जरिये घातक बैक्टीरिया को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन विशेषज्ञों ने जैविक हथियारों के विकास का खतरा बढ़ने की चेतावनी दी है। जनरेटिव जीनोमिक्स के नियंत्रण के लिए पर्याप्त सुरक्षा नीतियां मौजूद न होने के कारण वर्तमान सरकारी कानून अपर्याप्त बताए गए हैं।

२२ साउन, काठमाडौँ। स्टैनफोर्ड की अगुवाई में कार्यरत शोध दल ने सिंथेटिक विषाणु निर्माण के लिए जनरेटिव एआई का प्रयोग किया है। यह पहली बार है जब इस तरह की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके प्रकृति में कभी न देखे जीव को तैयार किया गया है। विशेषज्ञों ने बताया है कि इससे भविष्य में खतरनाक स्थितियां उत्पन्न होने की संभावना दिखाई दे रही है। ऐसे घातक रोगजनकों को रोकने के लिए वर्तमान निगरानी प्रणालियाँ पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि ये विषाणु तीव्र गति से विकसित हो रहे हैं।

यह शोध चिकित्सा क्षेत्र में भी बड़ी प्रगति की उम्मीद जगाता है। शोध टीम ने ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में लिखा, “पूर्णतया कार्यशील जीनोम तैयार करने वाले जीनोम लैंग्वेज मॉडलों की क्षमता अभी परीक्षण के अधीन है।” टीम ने बताया कि ‘ई. कोलाई’ नामक बैक्टीरिया को संक्रमित और नष्ट करने वाले विषाणुओं को एआई मॉडल के माध्यम से डिजाइन किया गया है। इससे घातक बैक्टीरियल संक्रमण नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।

हालांकि, इस तकनीक का उपयोग जीवन के और जटिल रूपों को विकसित करने और जैविक हथियार तैयार करने में भी हो सकता है। यह खबर उच्च जोखिम वाले शोध की निगरानी के लिए सरकारी प्रयासों में नई समझ लाती है। पूर्व में ट्रंप प्रशासन ने प्राकृतिक रोगजनकों पर “गेन ऑफ फंक्शन” शोध का नियंत्रण करते हुए नियम बनाए थे। सेनेटर रैंड पोल की समिति ने एंथोनी फॉउची पर कोविड-१९ महामारी की उत्पत्ति पर किए गए अनुसंधान में सहयोग न करने का आरोप लगाया था। परंतु जनरेटिव एआई द्वारा पूरी तरह नए विषाणुओं के सृजन ने इसे किसी भी पूर्व अध्ययन से कहीं आगे ला खड़ा किया है।

बायोटेक्नोलॉजी में कानून व विभिन्न निकायों द्वारा विनियमन होता है, लेकिन नई खोजें अक्सर नियमित निकायों से आगे हो जाती हैं। ट्रंप प्रशासन ने पिछले महीने उच्च जोखिम वाले जीवन विज्ञान शोध को संघीय निधि से रोकने वाली नीतियां लागू कीं, जिनमें “गेन ऑफ फंक्शन” रिसर्च पर प्रतिबंध और जैविक हानिकारक एजेंट की कड़ी निगरानी शामिल है। हालांकि एआई आधारित शोध को अभी तक वैसा संबोधित नहीं किया गया है।

यह शोध तेज गति से प्रगति कर रहा है। जोन्स हॉपकिंस के स्वास्थ्य सुरक्षा विशेषज्ञ थॉमस इंग्ल्सबी और मोरिट्ज हैंके ने ‘साइंस’ के उसी अंक में लिखा कि स्टैनफोर्ड टीम की सतर्कता प्रशंसनीय है। पर उन्होंने कहा कि जनरेटिव जीनोमिक्स की निगरानी के लिए आवश्यक सुरक्षा ढांचे की अनुपस्थिति में बड़ा जोखिम है। “जनरेटिव एआई के माध्यम से वायरल जीनोम तैयार करने की क्षमता अब उपलब्ध है, पर इसे सुरक्षित तरीके से संचालित करने के लिए सरकार का कोई नियमन मौजूद नहीं है,” उनके शब्द हैं।

आधुनिक कूटनीति में महिलाओं के योगदान का गलत आकलन हो रहा है

२२ साउन, काठमाडौं। वर्तमान में कूटनीति में महिलाओं की भागीदारी को मापने का कार्य केवल एक ही ‘मेट्रिक’ पर आधारित है। वह मापदंड है राज्य द्वारा नियुक्त राजदूत पदों पर महिलाओं का प्रतिशत। “वुमेन इन डिप्लोमेसी इंडेक्स” के अनुसार, वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा २२.५ प्रतिशत है। यह संख्या महत्वपूर्ण है क्योंकि यह औपचारिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व के माध्यम से सत्ता और पहुँच को दर्शाती है। इससे अधिकार के विकेन्द्रीकरण की सरकार की इच्छा भी झलकती है। इसे ट्रैक किया जाना चाहिए और संख्या में वृद्धि होनी चाहिए। लेकिन केवल इसे मापना अब पूरी कहानी नहीं बताता। यह मेट्रिक एक खास इस दुनिया के लिए बनाया गया था, जहां अंतरराष्ट्रीय सहयोग मुख्य रूप से दूतावासों के जरिए होता था। मंत्रालयों और औपचारिक सरकारी वार्ताओं के जरिए सहयोग होता था। वह दुनिया अभी भी मौजूद है। लेकिन वर्तमान विश्व उन परंपराओं से कहीं आगे बढ़ चुका है। आज जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ा है, महामारी और विस्थापन बढ़े हैं। मानवीय संकट भी गंभीर हुए हैं। इस तरह की समस्याएं वैज्ञानिक संस्थाओं के गठबंधन से हल होती हैं। नागरिक नेटवर्क के जरिए समाधान होते हैं। सीमापार साझेदारी (क्रॉस-बॉर्डर पार्टनरशिप) से समाधान निकलते हैं। ये संगठन विदेश मंत्रालयों से बाहर काम करते हैं। कूटनीति विकसित हो रही है, लेकिन इस नई कूटनीति में महिलाओं की भागीदारी मापने के लिए कोई ढांचा विकसित नहीं किया गया है। इससे मापे जाने वाले तथ्यों और वास्तविक दुनिया के बीच की खाई और बढ़ गई है। शांति प्रक्रिया में यह डेटा के अंतर का विरोधाभास सबसे अधिक स्पष्ट होता है।

औपचारिक आंकड़े निराशाजनक हैं। १९९२ से २०१९ के बीच विश्व की बड़ी शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी न्यूनतम रही। वार्ताकारों में महिलाएं केवल १३ प्रतिशत थी जबकि हस्ताक्षरकर्ताओं में ६ प्रतिशत। २०२४ तक औपचारिक संघर्ष समाधान वार्ताओं में महिला वार्ताकारों की संख्या और घटकर ७ प्रतिशत तक सीमित हो गई है। ये आंकड़े औपचारिक संस्थाओं की असफलता को बयां करते हैं। हालांकि वार्ताक्रम में महिलाओं को शामिल करने की बात हुई है, लेकिन ये आंकड़े आधे चित्र मात्र दिखाते हैं। पहली बार अनौपचारिक शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी पर संगठित अध्ययन किया गया। ऐसे वार्ताऐं नागरिक समाज के नेतृत्व में होती हैं और अक्सर औपचारिक सरकारी वार्ताओं के साथ-साथ संचालित होती हैं। ये वार्ताऐं आधिकारिक वार्ताओं को स्थिर बनाए रखने में मददगार होती हैं। इस अध्ययन को “जॉर्जटाउन इंस्टिट्यूट फॉर वुमेन, पीस एंड सिक्योरिटी” ने किया। अध्ययन किए गए ६३ औपचारिक शांति प्रक्रियाओं में से ३८ में समानांतर “ट्रैक टू” प्रक्रियाएं चल रही थीं। इनमें लगभग तीन-चौथाई मामलों में पहचाने गए महिला समूहों की सक्रिय भागीदारी थी।

यह भिन्नता केवल महत्वपूर्ण नहीं बल्कि संरचनात्मक भी है। महिलाएं समझौता संभव बनाने का अधिकांश कार्य कर रही हैं, लेकिन वह कमरे से बाहर रखी जाती हैं जहाँ समझौतों पर हस्ताक्षर होते हैं। इसके उदाहरण भी हैं। लाइबेरिया की महिला शांति आंदोलनों ने धार्मिक और राजनीतिक भेदभाव से ऊपर उठकर गृहयुद्ध को समाप्त करने में योगदान दिया। उत्तरी आयरलैंड में ‘गुड फ्राइडे समझौता’ के दौरान महिला गठबंधनों ने पुरानी बाधाओं को सुलझाने में मदद की। सूडान, कोलंबिया और कई स्थानीय प्रक्रियाओं में महिला नेतृत्व वाले नेटवर्क विवाद सुलझाने का काम कर रहे हैं। कूटनीतिज्ञों के कक्षों से बाहर ये महिलाएं भरोसा पुनर्निर्माण का कार्य जारी रखती हैं।

महिलाओं के अज्ञात योगदान पर अंतरराष्ट्रीय समन्वय अब मुख्य रूप से विदेशी मामलों के मंत्रालयों से बाहर के लोगों पर निर्भर हो गया है। यह बात कोविड-१९ महामारी के दौरान प्रमाणित हुई। महामारी के समय महिलाओं ने विश्व स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यबल का लगभग ७० प्रतिशत हिस्सा संभाला। वे केवल अग्रसर देखभालकर्ताओं के रूप में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निकायों, समुदायों, स्थानीय सरकारों, गैरसरकारी संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को सीमापार जोड़ने वाले समन्वयकारी की भूमिका में भी थीं। इसे अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ ‘स्वास्थ्य कूटनीति’ के नाम से वैश्विक स्तर पर पहचान रहे हैं। यह किसी भी सरकार की अकेले हल करने में असमर्थ खतरों का प्रबंधन करने की क्षमता और कौशल है। यह क्षमता टीकों तक पहुंच, महामारी की पूर्वतैयारी, शरणार्थी स्वास्थ्य और रोग निगरानी में आवश्यक है।

लेकिन कोविड-१९ के दौरान विश्व स्तर पर बनाए गए ११५ राष्ट्रीय कार्य दलों में से ८५ प्रतिशत में पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक थी, जबकि महिलाएं ही महामारी के जवाब में आगे थीं। समन्वय का कार्य महिलाओं का था लेकिन मान्यता नहीं मिली। जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में भी यही कहानी दोहराई गई है। जलवायु प्रभाव महिलाओं और बच्चों को असमान रूप से प्रभावित करता है। महिलाएं स्थानीय अनुकूलन प्रयासों का नेतृत्व कर रही हैं। वे खाद्य असुरक्षा, पानी की कमी, आपातकालीन राहत और विस्थापन जैसे कार्यों में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निकायों के साथ समन्वय कर रही हैं। मध्यस्थता, विश्वास निर्माण और विभाजित समुदायों के बीच वार्ता कूटनीतिक कार्य के मुख्य पहलू हैं। उपलब्ध आंकड़े स्पष्ट करते हैं जब नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, तो शांति समझौतों के असफल होने की संभावना ६४ प्रतिशत तक कम होती है। ठंडे युद्ध के बाद ४० शांति प्रक्रियाओं के विश्लेषण ने यह दिखाया कि महिलाओं के सक्रिय हिस्सेदारी वाले क्षेत्रों में लगभग हमेशा समझौता होता है। महिलाएं कूटनीतिक कार्यों में सक्रिय हैं, मगर वे अक्सर आंकड़ों में शामिल नहीं होतीं।

मापन क्यों महत्वपूर्ण है? यह चर्चा औपचारिक प्रतिनिधित्व के खिलाफ नहीं बल्कि इसके समर्थन में है। महिला राजदूतों, मंत्रियों और वार्ताकारों की संख्या बढ़ाना अब भी आवश्यक है। यदि वर्तमान गति बनी रही तो कुछ देशों को अपने कूटनीतिक संस्थानों में समानता प्राप्त करने में एक से अधिक शताब्दी लग सकती है। इससे औपचारिक संस्थानों पर दबाव बढ़ेगा। मापन दृश्यता को निर्धारित करता है। दृश्यता शक्ति को आकार देती है। इसलिए संस्थाएं वही मापती हैं, उसे ही मान्यता देती हैं, उसी पर धन आवंटित करती हैं और वैधता प्रदान करती हैं। यदि कूटनीतिक प्रभाव केवल औपचारिक नियुक्तियों से मापा जाए तो महिला नेतृत्व के अनेक क्षेत्रों को अनदेखा किया जाएगा। कार्य मौजूद है, लेकिन कूटनीति की परिभाषा इसको बाहर रखती है। वर्तमान प्रयोग किए जाने वाले ढांचे से कूटनीति तेजी से विकसित हो रही है।

अब महिला अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हो सकते। यह प्रश्न और बड़ा हो सकता है। सामान्यतः प्रश्न यह होता है कि कूटनीतिक संस्थाओं में अधिक से अधिक महिलाओं को कैसे लाया जाए? इसमें कोई कमी नहीं है। वास्तव में इससे बेहतर जवाब मिलने चाहिए। एक और प्रश्न भी है – क्या वास्तव में कूटनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है या महिलाएं जिन तरीकों से मापी जाती हैं, उनमें कूटनीति छूट रही है? चलिए विचार करते हैं कि कौन से संकेत चूक रहे हैं। सूडान में महिला शांति निर्माताओं ने सूक्ष्म कूटनीति की। उन्होंने एक छाया शांति समझौता बनाया जिसने जेनेवा में हुई औपचारिक वार्ताओं को दिशा दी। इसके लिए क्रॉस-बॉर्डर साझेदारी, गठबंधन प्रबंधन और निरंतर राजनीतिक रणनीति आवश्यक थी। कोटे डिवोर में महिला मध्यस्थताओं ने कावली क्षेत्र में अंतर-समुदाय संघर्ष कम किया और हस्ताक्षरित शांति समझौता तैयार किया। वे पहली बार कानूनी रूप से इसके क्रियान्वयन की गारंटी बनीं। सीरिया में महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने लापता व्यक्तियों के लिए संयुक्त राष्ट्र का बिल्कुल नया तंत्र स्थापित कराया। ये सभी महिलाएं राजदूत की पदवी नहीं रखती थीं और न ही “वुमेन इन डिप्लोमेसी इंडेक्स” में शामिल होती हैं, फिर भी उन्होंने नतीजे बदले।

महिलाएं पहले ही सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। क्या विश्व इसे उचित नाम देने के लिए तैयार है? यह मान्यता महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि कूटनीति के लिए जरूरी है।

जापान में शल्यक्रिया के दौरान भूकंप का आतंक

शल्यक्रिया हो रही थी तभी भूकंप ने अस्पताल को हिला दिया, कुमामोतो शहर के एक अस्पताल में चार मरीज ऑपरेशन के दौरन थे। जैसे ही कंपकंपी शुरू हुई, चिकित्सकों ने अपने शरीर से मरीजों को सुरक्षित रखने के उपाय अपनाए, जो अब सार्वजनिक हुए फुटेज में देखे जा सकते हैं। इसी दौरान, नर्सों को दरवाजा खोलकर बाहर निकलने का रास्ता प्रदान करते हुए भी देखा गया।

अस्पताल ने बताया कि सभी चार शल्यक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई हैं। भूकंप के बाद कुछ समय के लिए सेवा में अस्थायी रोक लगाई गई थी, जिसके बाद अस्पताल ने इस सप्ताह से सामान्य सेवाएं पुनः चालू कर दी हैं।

सुकुम्बासी विस्थापित बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय का आदेश

फाइल तस्वीर समाचार सारांश समीक्षा के बाद तैयार। सर्वोच्च न्यायालय ने सुकुम्बासी बस्तियों से विस्थापित बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास अधिकार सुनिश्चित करने के लिए सरकार के नाम अंतरिम आदेश जारी किया है। २२ साउन, काठमांडू। सर्वोच्च न्यायालय ने सुकुम्बासी बस्तियों और विभिन्न स्थानों से विस्थापित बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास एवं अन्य बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार के नाम अंतरिम आदेश जारी किया है। न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल की एकल पीठ ने साउन १८ को यह आदेश जारी किया।

बाल अधिकार क्षेत्र में सक्रिय संजाल बालबालिका शान्ति क्षेत्र राष्ट्रिय अभियान के अध्यक्ष तिलोत्तम पौडेल और मानव अधिकार क्षेत्र में कार्यरत अनौपचारिक क्षेत्र सेवा केंद्र (इन्सेक) बागमती प्रदेश कार्यालय से बरुण बस्याल समेत ने याचिका दायर की थी। इस याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विस्थापन से बच्चों की शिक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। अदालत ने विस्थापित बच्चों के विद्यालय में नामांकन, पढ़ाई की निरंतरता और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक माना है।

आदेश में सुकुम्बासी क्षेत्र के बच्चे विद्यालय से बाहर हो सकते हैं, नामांकित नहीं होने वाले बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित हो सकते हैं, और उनके जीवन और विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जैसी स्थितियों पर ध्यान दिया गया है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की रिपोर्ट और सार्वजनिक हित के विषयों को आधार बनाकर अदालत ने तत्काल संरक्षण की आवश्यकता का निष्कर्ष निकाला है। सर्वोच्च न्यायालय ने नामांकित बच्चों को शिक्षा जारी रखने और बिना नामांकन वाले बच्चों को साउन माह के अंत तक निकटतम विद्यालयों में मुफ्त नामांकन कराने का आदेश दिया है।

साथ ही मुफ्त पाठ्यपुस्तक, पोशाक, यातायात सुविधा, शिक्षण सामग्री, मनो-सामाजिक परामर्श और अपंग बच्चों के लिए आवश्यक सहायक सेवाएं उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा है कि विस्थापन के कारण यदि और प्रभाव पड़ें तो आवासीय शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी और बच्चों के लिए उचित वातावरण निर्मित करने के लिए संबंधित स्थानीय निकायों के साथ सरकार को सहयोग करना होगा। इसके अतिरिक्त, प्रसवशील महिला, गर्भवती, अपंग व्यक्ति, वरिष्ठ नागरिक, बच्चे और बीमार व्यक्तियों के लिए गुणवत्तापूर्ण आवास और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। याचिका में सुकुम्बासी बस्ती से विस्थापित बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु अंतरिम आदेश की मांग की गई थी। अदालत ने नेपाल के संविधान द्वारा सुनिश्चित शिक्षा, बाल अधिकार, सम्मानपूर्वक जीवन और आवास के अधिकार के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया है। सर्वोच्च अदालत ने आदेश की जानकारी संबंधित पक्षों को देने तथा नियमानुसार पालन कराने का निर्देश भी दिया है।

नागरिक सुरक्षा प्राथमिकता: आवश्यक कदम उठाने में जुटा इज़राइल

इज़राइल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने तुर्की पर सिरिया में अस्थिरता पैदा करने का आरोप सख्ती से खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इज़राइल केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय लागू कर रहा है। सार ने कहा, “विदेश मंत्री हाकान फिदान चाहते हैं कि इज़राइल सुरक्षा कदम न uthाए, लेकिन यह संभव नहीं है, इज़राइल अपने नागरिकों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाता रहेगा।”

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इज़राइल पर सिरिया क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया था। गिदोन सार ने बताया कि तुर्की के नेता लंबे समय से सिरिया की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहे हैं और दूसरों को अंतरराष्ट्रीय कानून सिखाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि तुर्की ने सिरिया के लगभग ५ प्रतिशत भूभाग पर कब्जा किया है और इज़राइल की सुरक्षा को कमजोर करने के उद्देश्य से सैन्य चौकी स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।

सार के अनुसार, इज़राइल केवल ०.१ प्रतिशत भूभाग में बफर जोन नियंत्रित करता है। उन्होंने कहा, “यह कदम दक्षिणी सिरिया में सक्रिय आतंकवादी समूहों से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है, जो इज़राइल पर हमला करने की फिराक में हैं।” दिसंबर २०२४ में सिरियाई लड़ाकों ने बफर जोन में घुसपैठ की और १९७४ में इज़राइल और सिरिया के बीच हुए सैन्य वापसी समझौते का उल्लंघन किया।

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यप अर्दोआन के नेतृत्व में सिरिया और इराक में कुरदी बलों के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान चलाने का दावा किया गया है। तुर्की ने पड़ोसी राष्ट्रों को बार-बार धमकी दी है और ५० वर्षों से अधिक समय से साइप्रस के ३६ प्रतिशत क्षेत्र पर कब्जा बनाए हुए है, जिसके कारण तुर्की को मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा है। गिदोन सार ने पुनः कहा, “विदेश मंत्री हाकान फिदान चाहते हैं कि इज़राइल सुरक्षा कदम न uthाए, लेकिन यह संभव नहीं। इज़राइल अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाता रहेगा।”

ओपनएआई का नया एआई स्मार्ट स्पीकर 400 अमेरिकी डॉलर तक बिकेगा

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा पश्चात् तैयार।

  • ओपनएआई ने एप्पल के पूर्व डिजाइनर जोनी आइव की कंपनी लवफ्रॉम के साथ मिलकर एआई स्मार्ट स्पीकर विकसित कर रहा है।
  • डोनट आकार के इस डिवाइस का मूल्य 300 से 400 अमेरिकी डॉलर तक हो सकता है और यह 2027 में लॉन्च होने की संभावना है।
  • एप्पल ने व्यापारिक गोपनीयता चोरी के आरोप लगाकर ओपनएआई के खिलाफ मुकदमा दायर किया है, जिससे हार्डवेयर मार्केट में कंपनी की प्रवेश चुनौतीपूर्ण हो गई है।

ओपनएआई का नया एआई स्मार्ट स्पीकर 300 से 400 अमेरिकी डॉलर के बीच मूल्य निर्धारण पर बिक्री के लिए उपलब्ध होगा।

ओपनएआई के इस नए हार्डवेयर डिवाइस के बारे में अधिक जानकारी सामने आ रही है।

पहले की सूचनाओं के अनुसार, यह डिवाइस एक एआई संचालित स्मार्ट स्पीकर के रूप में जाना जा रहा है और इसे चैटजीपीटी की ‘भौतिक अभिव्यक्ति’ कहा गया है।

ब्लूमबर्ग के अनुसार, यह डिवाइस ‘डोनट आकार’ का होगा। उपयोगकर्ता इसे आसानी से घर के अंदर कहीं भी ले जा सकते हैं, जैसे कि बेडरूम के पास या रसोई के काउंटर पर रखना।

ब्लूमबर्ग के सूत्र बताते हैं कि यह स्मार्ट स्पीकर ‘उच्च गुणवत्ता वाली धातु’ से बना होगा और प्रीमियम लुक प्रदान करेगा। इसमें कुछ ‘संचालित भाग’ भी होंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक यह डिवाइस अन्य सामान्य स्मार्ट स्पीकर्स की तुलना में महंगा होगा। इसकी प्रति यूनिट कीमत 300 से 400 डॉलर तक हो सकती है। तुलना में, अमेज़न के ज्यादातर स्मार्ट होम स्पीकर्स की कीमत 40 से 240 डॉलर के बीच होती है।

सरल शब्दों में, यह एक महंगा एआई डोनट जैसा डिवाइस होगा जिसमें चलने वाले भाग होंगे। ओपनएआई स्मार्ट होम डिवाइस मार्केट में प्रवेश करके उपयोगकर्ताओं के जीवन में चैटजीपीटी के उपयोग को और बढ़ावा देना चाहता है। हालांकि, इतिहास में स्मार्ट स्पीकर्स सभी जगह सफल नहीं हुए हैं, इसलिए यह मार्केट में प्रवेश चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उच्च कीमत बाजार विस्तार में बाधा डाल सकती है।

यह डिवाइस लवफ्रॉम के साथ साझेदारी में विकसित किया जा रहा है, जिसे एप्पल के पूर्व प्रमुख डिजाइनर जोनी आइव ने स्थापित किया है। ब्लूमबर्ग के अनुसार, यह डिवाइस 2027 में लॉन्च हो सकता है।

हार्डवेयर बाजार में प्रवेश करना ओपनएआई के लिए आसान नहीं है। एप्पल ने ओपनएआई के खिलाफ कॉर्पोरेट गोपनीयता चोरी के आरोप में मुकदमा दायर किया है, जिसे ओपनएआई ने अस्वीकार कर दिया है।

 

युक्रेन के जंगल में रूसी ड्रोन द्वारा छोड़े गए फाइबर-ऑप्टिक तारों का जाल

युक्रेनी सेना की ५७वीं मोटराइज्ड ब्रिगेड ने ३१ जुलाई को एक वीडियो जारी किया है, जिसमें खार्किव क्षेत्र के एक जंगल में रूसी ड्रोन द्वारा छोड़े गए फाइबर-ऑप्टिक तारों से भरे हुए दृश्य को दिखाया गया है। ब्रिगेड के अनुसार यह वीडियो भोव्चान्स्क के पास के जंगल में बनाया गया है।

शत्रु पक्ष के लिए फाइबर-ऑप्टिक तारों वाले ड्रोन का पता लगाना और उन्हें बाधित करना मुश्किल होता है, इसलिए इन ड्रोन का उपयोग युद्ध के मैदान में तेजी से बढ़ रहा है। जब ये ड्रोन उड़ते हैं, तो वे अपने साथ कई किलोमीटर लंबे तार छोड़ते हैं।

चीन और जापान के बीच कूटनीतिक तनाव और नई सैन्य नीति की चुनौती

चीन और जापान के बीच वैश्विक मंच पर अपनी प्रभावशाली स्थिति स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा के साथ कूटनीतिक तनाव तेज हुआ है। चीन ने जापान की सैन्य क्षमता वृद्धि और रक्षा रणनीति को ‘नई सैन्यवाद’ करार देते हुए कड़ी निंदा की है। जापान ने चीन के आरोपों को पूरी तरह से खारिज करते हुए स्वयं को क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा का संरक्षक बताया है। २२ साउन, काठमाडौं। बीजिंग और टोक्यो के बीच प्रतिस्पर्धा अब विवादित द्वीपों या ‘ऐतिहासिक स्मृति’ तक सीमित नहीं है। ये दोनों देश एक-दूसरे की अंतरराष्ट्रीय पहचान परिभाषित करने वाले ग्लोबल माइक्रोफोन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मुकाबला विश्वव्यापी स्तर पर अपनी आवाज़ को प्रस्तुत करने के संघर्ष में तब्दील हो चुका है।

कूटनीतिक संकट तीव्र होता जा रहा है। चीन ने जापान के कदम को ‘नई सैन्यवाद’ बताते हुए अपनी अभिव्यक्ति को और गंभीर बना दिया है। चीन क्षेत्रीय एवं वैश्विक सहानुभूति जुटाने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास का उपयोग कर रहा है। जापान ने इन आरोपों को ‘झूठा दावा’ बताते हुए खारिज किया है और स्वयं को शांतिप्रिय राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया है। जापान ने यह भी कहा है कि उस पर दबाव डाला जा रहा है। बीजिंग पर अपनी हथियारों की क्षमता बढ़ाने और स्थापित नियमों को चुनौती देने का आरोप लगा है। टोक्यो का तर्क है कि इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गंभीर चिंता व्यक्त करनी चाहिए।

शंघाई स्थित फूडलान विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के कार्यकारी निदेशक शेन यी ने कहा, ‘चीन एक अत्यंत विकृत वैश्विक कथन का सामना कर रहा है। इसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान द्वारा चीन एवं अन्य देशों में किए गए फासीवादी अत्याचारों को अनदेखा किया है। इन अत्याचारों का अंतरराष्ट्रीय हिसाब अभी तक पूरा नहीं हुआ है।’ उन्होंने कहा, ‘सामूहिक स्मृति में मौजूद इस अंतर ने जापान की नई सैन्य नीति को फिर से उभरने का अवसर प्रदान किया है।’

जापान के रक्षा मंत्री शिन्जिरो कोइजुमी ने मई में सैनग्री-ला डायलॉग को सम्बोधित करते हुए जापानी सैन्यवाद पर चीनी आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा, ‘यह सत्य से बहुत दूर है।’ उन्होंने कहा कि नई चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रत्येक देश के लिए अपनी रक्षा क्षमता का आधुनिकीकरण करना स्वाभाविक है। शेन के अनुसार, जापान ने युद्धकालीन अत्याचारों के प्रति वैश्विक चेतना को कम करने के लिए दशकों तक प्रयास किए और ‘नया जापान’ बनाने की दिशा में काम जारी रखा है।