१९ वैशाख, काठमांडू। भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल एक अनोखा प्रयोगशाला है। यहां विचारधारा और व्यक्तित्व की टक्कर सदैव नया इतिहास रचती है। तीन दशक से अधिक समय तक जड़ें जमाये कम्युनिस्ट शासन को एक जुझारू महिला के साहस ने गिरा दिया। वे हैं – ममता बनर्जी।
आज पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘दिदी’ शब्द केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि ममता के साम्राज्य का पर्याय बन चुका है।
कॉलेज के साधारण धरने और छात्र राजनीति से शुरू हुई उनकी यात्रा केंद्रीय मंत्रालयों के बड़े कार्यालयों से होकर राज्य की मुख्यमंत्री तक पहुँची।
सन् २०११ में वामपंथी किले को ढहाकर सत्ता में आई ममता बनर्जी ने तब से लगातार तीन कार्यकाल राज्य का नेतृत्व किया है। अब वे चौथी बार सत्ता में लौटने के इरादे से चुनावी मैदान में खड़ी हैं।
३४ वर्षों के वाम किले का पतन
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में वाम मोर्चा का शासन एक दुर्लभ और शक्तिशाली अध्याय रहा है। सन् १९७७ से २०११ तक लगातार ३४ वर्षों तक राज्य की सत्ता पर काबिज कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) सरकार ने भारत के सबसे लंबे एकल विचारधारा शासन का कीर्तिमान स्थापित किया था।
ज्योति बसु के नेतृत्व में शुरू हुए इस शासनकाल ने प्रारंभिक दिनों में ‘भूमि सुधार’ और ‘पंचायती राज’ के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में अभूतपूर्व पकड़ बनाई। हजारों भूमिहीन किसानों को जमीन का मालिक बनाया और राजनीतिक चेतना की नई लहर लाई।
हालांकि शासन जितना लंबा होता गया, उसकी पद्धति में उतनी ही कठोरता और विसंगतियां दिखने लगीं। स्कूल, अस्पताल और सरकारी प्रशासन में स्थानीय पार्टी कार्यालयों का सीधा हस्तक्षेप और नियंत्रण सामान्य प्रक्रिया जैसा बन गया।
अचल संपत्ति व्यवसायी और पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच अपारदर्शी संबंधों ने भ्रष्टाचार की नई संस्कृति को जन्म दिया, जिसके कारण पूर्व मंत्री अशोक भट्टाचार्य जैसे प्रभावशाली नेता भी गंभीर आरोपों के घेरे में आए। बढ़ती बेरोजगारी और अवसरों की कमी से शिक्षित युवा पीढ़ी राज्य से पलायन करने लगी। राजनीतिक संरक्षण में हो रही धांधली और भय के माहौल से आम जन और अधिक क्रोधित हुआ।
अंततः सन् २०११ के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के लिए ‘परिवर्तन’ का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। वर्षों से मौन जनता ने स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का प्रयोग किया। नतीजतन, अजेय माना जाने वाला ३४ साल पुराना लाल किला गिरा। ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल ने नई राजनीतिक दिशा पाई।
सिंगुर और नंदीग्राम से ‘दिदी’ का उदय
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक इतिहास में ममता बनर्जी को ‘शक्तिशाली विद्रोही’ के रूप में स्थापित करने के दो मुख्य आधार थे – सिंगुर और नंदीग्राम की भूमि आंदोलने।
सन् २००६ में तत्कालीन वामपंथी मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने राज्य में औद्योगिकीकरण की लहर लाने के मकसद से टाटा मोटर्स की ‘नैनो’ कार फैक्ट्री के लिए हुगली जिले के सिंगुर में उपजाऊ जमीन अधिग्रहण का फैसला किया। अपनी आजीविका का मुख्य स्रोत छिनने के डर से किसान आक्रोशित हो उठे और ममता बनर्जी उनके लिए एक मजबूत सहारा बनीं।
सिंगुर का संघर्ष केवल धरना-प्रदर्शन तक सीमित न रहकर, पुलिस की लाठीचार्ज और राजनीतिक दबावों के बीच ममता ने आन्दोलन जारी रखा। तीव्र विरोध के कारण सन् २००८ अक्टूबर ३ को टाटा मोटर्स ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना बंगाल से गुजरात स्थानांतरित करने की घोषणा की। यह ममता के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत और वामपंथी सरकार के लिए नैतिक हार की शुरुआत थी।

और भी निर्णायक मोड़ बना – नंदीग्राम का मामला। पूर्वी मेदिनीपुर के नंदीग्राम में ‘रासायनिक हब’ बनाने के लिए जमीन अधिग्रहण की सरकारी योजना के खिलाफ ग्रामीण जनता सड़कों पर उतरी। १४ मार्च २००७ को प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोली चलाई जिसमें दो महिलाएं समेत १४ लोगों की जान गई। यह खूनी घटना पूरे बंगाल को स्तब्ध कर गई और ममता के नारों ने गांव-गांव में गूँज बनाई – ‘जमि अमरा छार्बुनी’ (हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे)।
सिंगुर और नंदीग्राम के आंदोलन ने वाममोर्चा की ३४ साल की सत्ता के खिलाफ जनमत को एकजुट करने की साझा राजनीतिक भाषा दी। उसी विद्रोह की आग में पनप कर ममता बनर्जी ने सन् २०११ में ऐतिहासिक सफलता हासिल की।
‘जायंट किलर’ से पहली महिला मुख्यमंत्री तक
सन् १९५५ में कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा छात्र राजनीतिसे शुरू हुई।
कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक उन्होंने स्थानीय मुद्दों पर सड़क पर उतर कर आंदोलन करने की शैली को अपनी पहचान बनाया।
उनके राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा मोड़ १९८४ में आया, जब २९ वर्ष की उम्र में जादवपुर लोकसभा सीट से वाममोर्चा के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर उन्होंने ‘जायंट किलर’ की छवि बनाई और राष्ट्रीय राजनीति में तहलका मचाया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक प्रभावशाली युवा चेहरा के रूप में उभरी बनर्जी का स्वाभिमानी स्वभाव और वामपंथी शासन के खिलाफ कड़ा रुख कांग्रेस में टिकने नहीं दिया। अंततः सन् १९९८ में उन्होंने ‘अखिल भारत तृणमूल कांग्रेस’ की स्थापना की और अलग राजनीतिक राह चलीं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री और बाद में मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में मंत्री रह चुकीं, उन्होंने राष्ट्रीय अनुभव भी हासिल किया।
सन् २०११ के विधानसभा चुनाव ने बंगाल के इतिहास में एक युग का अंत और नया युग शुरू किया। कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़े गए इस चुनाव में तृणमूल ने अकेले १८४ सीटें जीतीं और गठबंधन ने कुल २२७ सीटें जीतकर ३४ वर्ष के वाम किले को गिरा दिया। इसके साथ-साथ ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
यह जीत केवल वामपंथियों के प्रति नकारात्मकता नहीं थी, बल्कि ममता द्वारा प्रस्तावित ‘माटी, मानुष और मान्छे’ (माटी, मानव, और इंसानियत) के एजेंडे को जन समर्थन मिला। उन्होंने किसान, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों को एक सूत्र में बांधा। वामपंथी वैचारिक पेचीदगियों की जगह मानवीय संवेदनशीलता और सीधा जन संपर्क लेकर आईं।
हालांकि सरकार गठन के तीन माह के भीतर कांग्रेस को बाहर निकाल कर उन्होंने बंगाल में अपना ‘एकलौता नेतृत्व’ साफ किया।
२०१६ से २०२४ तक अजेय यात्रा
पश्चिम बंगाल राजनीति में ममता बनर्जी की पकड़ सन् २०११ के बाद और मजबूत होती गई। सन् २०१६ के विधानसभा चुनाव उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और एकल शक्ति की कड़ी परीक्षा थी। विपक्ष ने सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणी की, पर तृणमूल ने २९४ में से २११ सीटें जीतीं। गठबंधन के वाम और कांग्रेस केवल ७७ सीटों पर सिमटे और सीपीआई(एम) का वोट प्रतिशत १९.७ तक गिर गया। ममता ने इसे ‘अपवित्र गठबंधन के खिलाफ जनता की हिफाजत’ करार दिया और राजनीतिक ऊँचाई पकड़ी।
सन् २०२१ का चुनाव भारतीय राजनीति का एक बड़ा ‘बैटल ग्राउंड’ बना। भाजपा ने पूरा केन्द्रीय तंत्र लगाकर ‘परिवर्तन’ का नारा दिया, लेकिन ममता के ‘बंगाल की बेटी’ कार्ड ने भाजपा की रणनीति कमजोर साबित कर दी।

परंतु नंदीग्राम में व्यक्तिगत मुकाबले में ममता अपनी पूर्व सहयोगी सुवेंदु अधिकारी से हार गईं। पार्टी ने २१५ सीटें जीतीं और भारी बहुमत पाया। इसके बाद के २१ उप-चुनाव में २० में तृणमूल की जीत ने राज्य में ‘दिदी’ के विकल्प की कमी साफ कर दी।
सन् २०२४ के लोकसभा चुनाव के नतीजे ने राष्ट्रीय राजनीति को हिला दिया। राज्य की ४२ में से २९ सीटें जीतकर तृणमूल ने भाजपा को मात्र १२ सीटों तक सीमित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आक्रामक प्रचार के बावजूद ममता बंगाली जनमत को अपने पक्ष में करने में सफल रहीं। विशेषकर ५३ प्रतिशत महिला मतदाताओं का समर्थन उनकी सफलता की मुख्य कड़ी बना।
कल्याणकारी शासन के स्तंभ
ममता बनर्जी के शासन का सबसे मजबूत पक्ष उनकी ‘लोकप्रिय’ और ‘कल्याणकारी’ योजनाएं हैं। ये योजनाएं केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रहकर ग्रामीण और शहरी जनता के रोजमर्रा के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। उनके शासन में शुरू हुए दर्जनों से अधिक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम उनके जनाधार की मेरुदंड बन चुके हैं।
विशेषकर महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके कदम भारतीय राजनीति में उदाहरणीय माने जाते हैं। महिलाओं के जीवन स्तर सुधारने वाली ‘कन्याश्री योजना’ एक मील का पत्थर साबित हुई, जिसने लगभग एक करोड़ बालिकाओं को स्कूल में बनाए रखा और बालविवाह रोकने में सफल रही। १८ वर्ष तक अविवाहित रहकर शिक्षा पूरी करने वालों को एकमुश्त २५ हजार रुपए दे रही है।
इसी तरह, ‘लक्ष्मी और भंडार’ योजना ममता के राजनैतिक ‘गेम चेंजर’ के रूप में उभरी। राज्य की लगभग ७१ लाख महिलाओं को मासिक ५०० से १००० रुपये निश्चित आय देकर उनकी आर्थिक स्वालंबन और घर के निर्णय प्रक्रियाओं में बड़ा योगदान दिया है।
साथ ही, ‘रूपश्री प्रकल्प’ के माध्यम से गरीब परिवारों के बेटियों के विवाह हेतु एकमुश्त २५ हजार रुपये आर्थिक सहायता देकर २२ लाख से अधिक परिवारों का भारी सामाजिक और आर्थिक बोझ कम किया गया है।

किसानों के लिए ‘कृषक बंधु’ और पूर्ण सरकारी अनुदान वाली ‘बंगाला शस्य बीमा’ योजनाओं ने कृषि संकट के वक्त सुरक्षा कवच का काम किया। ‘दुआरे सरकार’ (द्वार पर सरकार) अभियान द्वारा सरकारी सेवाओं को लोगों के घर-घर तक पहुंचाकर कर्मचारियों की सुस्ती को चुनौती दी। ‘खाद्य साथी’ योजना से राज्य के ९.५ करोड़ नागरिक लाभान्वित हो रहे हैं।
ममता की सादी सुतली साड़ी, हवाई चप्पल और सड़कों पर उतरने वाली विद्रोही छवि ने उन्हें साधारण बंगाली महिलाओं के बीच आत्मीयता दिलाई है। वे खुद को मुख्यमंत्री से ज्यादा ‘बंगाल की बेटी’ के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यही विश्वास के कारण सन् २०२४ के लोकसभा चुनाव में तृणमूल की ११ महिला उम्मीदवार ने मैदान में उतर कर सब जीत हासिल की, जहाँ ५३ प्रतिशत महिला मतदाता ममता के पक्ष में थे।
शासन की चुनौती: उद्योग, रोजगार और बुनियादी ढांचा
ममता के शासनकाल में कल्याणकारी योजनाओं के व्यापक विस्तार और औद्योगिकीकरण की कमी के बीच एक गंभीर अंतराल उत्पन्न हुआ है।
सिंगुर और नंदीग्राम के भूमि आंदोलनों ने उन्हें सत्ता की चोटी तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन उन्हीं विरासतों की वजह से राज्य में बड़े उद्योग स्थापित करने और उद्योग-मैत्री माहौल बनाने में जोखिम लेने से उन्होंने बचा।
राज्य से पूंजी के बहिर्गमन, नई फैक्ट्रियों की कमी और युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों में गिरावट आज के बंगाल के प्रमुख संकट हैं। यह राजनीति का एक दिलचस्प विरोधाभास है कि जहां सिंगुर के पुरुष औद्योगिक अवसर खोने से चिंतित हैं, वहीं महिलाएं ‘दिदी’ की कल्याणकारी योजनाओं के कारण उनके समर्थन में खड़ी हैं। बुनियादी ढांचे में कोलकाता मेट्रो, सड़क नेटवर्क और स्वास्थ्य केंद्रों के विस्तार सहित कुछ सकारात्मक कार्य हुए, पर शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में असंतुलन अभी भी दूर नहीं हुआ है।
विवादों में घिरी ममता
ममता बनर्जी के शासन को उनकी कल्याणकारी योजनाओं के लिए सराहा जाता है, वहीं भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामलों और राजनीतिक हिंसा की घटनाओं ने इसे विवादित भी बनाया है। सन् २०१३ के ‘सारदा चिट फंड’ घोटाले से लेकर ‘नारदा स्टिंग ऑपरेशन’ तक ऐसी घटनाओं ने तृणमूल के शीर्ष नेताओं की छवि पर प्रश्नचिन्ह लगाए।
२०२१ के बाद सतह पर आए ‘शिक्षक नियुक्ति घोटाले’ में प्रभावशाली मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी और उनके सहयोगी के घर से करोड़ों नकद बरामदगी ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया। इसके साथ ही राशन वितरण और पशु तस्करी जैसे मामलों में केन्द्रीय एजेंसियों की कड़ी जांच जारी है।
हाल ही में सन् २०२६ में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कोयला तस्करी मामले में २७०० करोड़ रुपए के अवैध लेनदेन का खुलासा किया। ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में इस हवाला कांड की विस्तृत रिपोर्ट पेश की और इसमें सबूत मिटाने की कोशिशें होने का दावा किया, जिससे मामला और भी गर्मा गया।
भ्रष्टाचार के अलावा पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा ममता सरकार की सबसे आलोचित बात है। आंकड़ों के अनुसार, भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले बंगाल में चुनावी और राजनीतिक हिंसा की घटनाएं भयावह रूप से बढ़ रही हैं।
२०१६ की तुलना में २०२१ के चुनाव में हिंसा की घटनाओं में ६१% से अधिक की वृद्धि देखी गई और चुनाव बाद सैकड़ों कार्यकर्ताओं को पड़ोसी असम में शरण लेनी पड़ी। यह राज्य की कानूनी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। तीसरे कार्यकाल की शपथ लेने के बाद चुनाव आयोग द्वारा हटाए गए अधिकारियों को ममता द्वारा पुनः बहाल करने से केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक टकराव और भी बढ़ गया।
हाल के ‘दुर्गापुर कांड’ जैसे संवेदनशील मामलों में मुख्यमंत्री के विवादास्पद बयानों ने उन्हें आलोचनाओं के केंद्र में ला दिया। एक मेडिकल छात्रा पर हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में ‘रात को महिलाएं बाहर नहीं निकलनी चाहिए’ जैसी टिप्पणी पर अधिकारकर्मियों और विपक्ष ने उन्हें ‘पीड़ितों को और आघात पहुँचाने वाला’ कहा।
इन भ्रष्टाचार और हिंसा के काले अध्यायों ने २०२६ के चुनाव में ममता के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां पैदा की हैं, वहीं भाजपा के मुख्य चुनावी हथियार भी बने हैं।
२०२६ की परीक्षा
सन् २०२६ का विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए अब तक का सबसे कठिन और जटिल मुकाबला साबित हो रहा है। इस बार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, केन्द्रीय एजेंसियों का बढ़ता दबाव, मतदाता सूची विवाद और भाजपा के आक्रामक ‘हिंदुत्व’ एजेंडा को एक साथ टक्कर देनी है।
विशेष तौर पर मतदाता सूची विवाद इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक ‘फ्लैशपॉइंट’ बन गया है। चुनाव आयोग की विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) के तहत लगभग ९१ लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर ममता ने इसे अल्पसंख्यक और सीमांत समुदायों के खिलाफ भाजपा की साजिश बताया और तीखा विरोध किया।
भवानीपुर जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटे जाने का दावा करते हुए उन्होंने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया। इसके अलावा चुनाव आयोग ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी समेत ५०० से अधिक अधिकारियों का स्थानांतरण किया, जिसे ममता ने ‘दिल्ली की बंगाल कब्जा करने की योजना’ बताया।

भाजपा ने इस चुनाव में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण और ‘अवैध घुसपैठ’ को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया है। वे राज्य की जनसांख्यिकीय परिवर्तन की चिंता दिखा कर ‘बहुमत’ का जादुई आंकड़ा (१५३ सीट) छूने की रणनीति पर हैं। इसके मुकाबले में ममता ने अपने ‘१० वादे’ जारी किए हैं, जिनमें ‘लक्ष्मी भंडार’ की मासिक सहायता बढ़ाना (सामान्य के लिए १५०० और एससी/एसटी के लिए १७०० रुपये), बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता देना और ‘दुआरे चिकित्सा’ (घर-घर स्वास्थ्य सेवा) प्रदान करना हैं।
मतदान के बाद आए एग्जिट पोलों ने बंगाल के राजनीतिक भविष्य को लेकर विरोधाभासी और अस्थिर तस्वीर दिखाई है। कुछ सर्वेक्षणों ने भाजपा को १८० से १९० सीटों के साथ ‘सुनामी’ आने का अनुमान लगाया है, जबकि कुछ ने तृणमूल और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला माना है।
ममता बनर्जी ने इन एग्जिट पोलों को ‘भाजपा कार्यालय से निर्देशित’ करार दिया और पूरी तरह खारिज किया। निर्वाचन की पूर्व संध्या पर उन्होंने खुद ‘स्ट्रांग रूम’ जाकर ईवीएम सुरक्षा पर कड़ी नजर रखी। ऐतिहासिक ९२ प्रतिशत मतदान और एग्जिट पोल के इस टकराव ने ४ मई के परिणाम को रोमांचक और निर्णायक होने का संकेत दिया है।
भवानीपुर: सम्मान का द्वंद्व और भविष्य का फैसला
पश्चिम बंगाल के २०२६ के चुनाव में सबसे चर्चित ‘रणभूमि’ भवानीपुर बनी है। यह सिर्फ एक निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि ममता बनर्जी और भाजपा के सुवेंदु अधिकारी के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक अस्तित्व की टक्कर है।
पिछले चुनाव में नंदीग्राम में मिली हार का बदला लेने और अपने राजनीतिक रंग को पुनः स्थापित करने के लिए ममता इस बार भवानीपुर से चुनावी लड़ाई लड़ रही हैं। मतदाता सूची विवाद, कार्यकर्ताओं के बीच लगातार झड़पें और पुलिस की लाठीचार्ज ने भवानीपुर का माहौल बेहद तनावपूर्ण बना दिया।
सुवेंदु लगातार ‘हिंदू मत की ध्रुवीकरण’ होने का दावा कर रहे हैं, जबकि ममता ने ‘केन्द्रीय सुरक्षा बलों के दमन’ का कड़ा विरोध किया। इस सीट का परिणाम निश्चित रूप से ममता के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगा।