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लेखक: space4knews

मजदूरों के अधिकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ मजबूत आंदोलन करेंगे: अध्यक्ष सिंखड़ा

अखिल नेपाल ट्रेड यूनियन महासंघ के अध्यक्ष जगतबहादुर सिंखड़ ने मजदूरों के अधिकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ मजबूत आंदोलन करने की चेतावनी दी है। उन्होंने श्रम कानून के मजदूर विरोधी धारा १४५, १०९, ३९ और ५८ को तुरंत हटाने की सरकार से मांग की है। बढ़ती महंगाई और पेट्रोलियम कीमतों में वृद्धि के कारण न्यूनतम मजदूरी से जीवनयापन करना मुश्किल हो गया है, इस संदर्भ में वे वेतन वृद्धि और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा-स्वास्थ्य की गारंटी की भी मांग कर रहे हैं।

सिंखड़ ने १३७वें अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में नेपाल में लोकतांत्रिक आंदोलन में मजदूर वर्ग के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा, “जिस वर्ग ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की, आज वही मजदूरों के अधिकारों पर दक्षिणपंथी शक्तियां लोकप्रियतावाद का आवरण पहनाकर डोजर चला रही हैं।”

सिंखड़ ने यह भी जोर देकर कहा कि विदेश में नौकरी करने वाले मजदूरों के लिए मुख्य रोजगारदाता राज्य ही होना चाहिए और उनकी सुरक्षा के लिए सरकार को पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने डिजिटल अर्थव्यवस्था और ‘गिग इकॉनमी’ के नाम पर मजदूरों को आधुनिक दास बनाने का प्रयास होने की चिंता व्यक्त की तथा राइडर, ऑनलाइन विक्रेता और आउटसोर्सिंग में कार्यरत मजदूरों को श्रम कानून के दायरे से बाहर रखकर मालिक रहित बनाने की साजिश का खुलासा किया।

अध्यक्ष सिंखड़ ने मजदूर विरोधी श्रम कानून की धाराओं को समाप्त करने की मांग करते हुए कहा कि आने वाला आंदोलन केवल उद्योग और कारखानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़कों, संसद और डिजिटल प्लेटफार्मों तक फैल जाएगा।

७ वर्षीय बालक ने श्रीलंका से भारत तक पौंडी लगाकर नया कीर्तिमान स्थापित किया

समाचार सारांश

समीक्षा पश्चात तैयार किया गया।

  • ७ वर्षीय भारतीय बालक ईशांक सिंह ने श्रीलंका से भारत तक २९ किलोमीटर की दूरी ९ घंटे ५० मिनट में पौंडी लगाकर नया रिकॉर्ड बनाया।
  • यूनिवर्सल रिकॉर्ड्स फोरम ने सिंह को विश्व के सबसे कम उम्र के पौंडीबाज का प्रमाणपत्र प्रदान किया।
  • राँची के सांसद तथा केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने ईशांक को सोशल मीडिया पर बधाई देते हुए इसे भारत के लिए एक महान उपलब्धि बताया।

१८ वैशाख, काठमांडू। भारत के झारखंड प्रांत के राँची से लगभग ७ वर्ष के बालक ईशांक सिंह ने श्रीलंका से भारत तक पौंडी लगाकर एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है।

उन्होंने २९ किलोमीटर की दूरी ९ घंटे ५० मिनट में पार की। ईशांक ने श्रीलंका के तलाईमन्नार से भारत के धनुषकोडी तक पूरी यात्रा पौंदकर पूरी की।

भारतीय मीडिया ने उन्हें विश्व के सबसे कम उम्र के पौंडीबाज के रूप में चर्चा की है। इस असाधारण उपलब्धि के लिए यूनिवर्सल रिकॉर्ड्स फोरम ने उन्हें प्रमाण पत्र प्रदान किया है।

इससे पहले यह रिकॉर्ड तमिलनाडु के जय जसवंत के नाम था, जिन्होंने २०१९ में १० वर्ष की आयु में इस दूरी को १० घंटे ३० मिनट में पार किया था।

राँची के डोरंडा में जवाहर विद्या मंदिर श्यामली स्कूल में कक्षा ३ के छात्र ईशांक ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए धुर्वा बाँध में रोजाना ४ से ५ घंटे कठिन अभ्यास किया था।

ईशांक ने अपने प्रशिक्षक अमन जायसवाल और बजरंग कुमार के मार्गदर्शन में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करके यह सफलता प्राप्त की है।

उनके साथ पौंडी लगाते वक्त सुरक्षा टीम डिंगियों के माध्यम से पीछा करती रही।

राँची के सांसद और केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने सोशल मीडिया पर ईशांक को बधाई दी है।

उन्होंने कहा, ‘राँची के बालक की अद्भुत उपलब्धि! ईशांक सिंह ने २९ किलोमीटर लंबा पाक जलडमरूमध्य पार करते हुए विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया है। यह भारत के लिए भी अतुलनीय उपलब्धि है। उन्होंने केवल ९ घंटे ५० मिनट में तलाईमन्नार (श्रीलंका) से धनुषकोडी (भारत) तक पौंडी लगाई है और विश्व के सबसे कम उम्र के पौंडीबाज बने हैं।’

सुकुमवासी बालबालिकाको अधिकार र सुरक्षित भविष्यका लागि सरकार संवेदनशील बन्नुपर्ने माग

सुकुमवासी बालबालिकाओं के अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार की संवेदनशीलता आवश्यक

१८ वैशाख, काठमांडू। भूमिहीन और सुकुमवासी बस्तियों के बालबालिकाओं की स्थिति के प्रति सरकार को संवेदनशीलता दर्शानी चाहिए, ऐसा मांग विभिन्न हितधारकों ने किया है। वैशाख १२ से शुरू किए गए सुकुमवासी बस्तियों को खाली करने की सरकारी कार्ययोजना ने बालबालिका, प्रसवोत्तर महिलाएँ, वरिष्ठ नागरिक, विकलांग व्यक्ति तथा गर्भवती महिलाओ में गंभीर समस्या पैदा की है, ऐसा उन्होंने बताया। इसी विषय पर सरकार की संवेदनशीलता आवश्यक है, उनका मानना है। बालबालिका शांति क्षेत्र राष्ट्रीय अभियान (सिजप), बालमैत्री स्थानीय शासन राष्ट्रीय मंच और बाल विकास समाज ने संयुक्त रूप से एक चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया था। नेपाल सरकार द्वारा भूमिहीन और सुकुमवासी बस्तियों को खाली एवं हटाने के क्रम में उत्पन्न समस्याओं तथा बालबालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, संरक्षण और मनोवैज्ञानिक स्थिति पर पड़े प्रभाव पर चर्चा हुई।

नेपाल के संविधान की धारा १६ के अनुसार सभी नागरिकों को सम्मानजनक जीवन यापन का अधिकार प्राप्त है। इसी प्रकार संविधान में निहित अन्य अधिकारों को भी सरकार को संवेदनशीलता के साथ लागू करना चाहिए, इस बात पर चर्चा में शामिल लोगों ने जोर दिया। सिजप के अध्यक्ष तिलोत्तम पौडेल की अध्यक्षता में महिला, बालबालिका एवं वरिष्ठ नागरिक मंत्रालय के उप सचिव दुर्गाप्रसाद चालिसे, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के खिमानन्द बस्याल, राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद की देवी डोटेल समेत अन्य प्रमुख लोग उपस्थित थे। इस चर्चा में एनएसिजी की अध्यक्ष रितु भट्ट राई, भूमि अभियंता भगवती अधिकारी, सुवास नेपाली, इन्सेक के कृष्ण गौत्तम सहित ४० से अधिक हितधारकों ने भाग लिया।

सहभागियों ने बताया कि सुकुमवासी बस्ती हटाने के नाम पर वर्तमान कानूनी व्यवस्थाएं, विधिक प्रक्रिया, सूचना और सरकारी एजेंसियों के बीच प्रभावशाली समन्वय का अभाव मुख्य समस्या है। इससे बालबालिका, प्रसवोत्तर महिलाएं, गर्भवती महिलाएं, विकलांग व्यक्ति, यौनिक और लैंगिक अल्पसंख्यक, दीर्घ रोगी, परीक्षार्थी और स्कूल जाने योग्य उम्र के बालबालिकाओं पर व्यापक असर पड़ा है। एक ओर जहां डोजर से घर उजाड़े जा रहे हैं, वहीं १२वीं कक्षा की परीक्षा दे रहे छात्रों को बहुत कष्ट उठाना पड़ रहा है। साथ ही छोटे बच्चों को दूध पिलाने के लिए आवश्यक दैनिक वस्तुएं खरीदने में भी असुविधा हो रही है, ऐसी पीड़ादायक घटनाएँ चर्चा में सामने आईं।

पहले चरण में सुकुमवासी तथा भूमिहीन लोगों के आंकड़े जमा करने और दूसरे चरण में आवासीय प्रबंध करके ही बस्ती हटाने का सुझाव हितधारकों ने दिया है। राज्य की ओर से बेहद सीमांत, दलित, जोखिम में रहने वाले परिवारों और बाल युवाओं के अभिभावकों की भूमिका निभाने की बजाय जबरदस्ती डोजर चलाकर घर बेघर करना अतिरिक्त पीड़ा उत्पन्न कर रहा है, इसकी आलोचना की गई। अपने ही आंखों के सामने अपना घर और विद्यालय तबाह होते देख बालबालिकाओं की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को सरकार ने नजरअंदाज किया है, इस बात को भी चर्चा में उठाया गया। सहभागी लोगों ने बताया कि बस्ती हटाने के दौरान बालबालिकाओं के नागरिकता, जन्म प्रमाण पत्र, शैक्षिक प्रमाणपत्र, पाठ्यपुस्तकें, स्कूल की पोशाक और उम्र के अनुसार पोषणयुक्त आहार में भी समस्याएं देखी गई हैं। साथ ही होल्डिंग सेंटर और अन्य स्थानों पर रहने के दौरान हिंसा, दुर्व्यवहार और गोपनीयता जैसे मुद्दों पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

बुद्ध जयन्ती के दिन बल्खु के साङ्गे छोइलिङ्ग गुम्बा को ध्वस्तिकरण

वैशाख १८ को दिन काठमाडौंको बल्खुस्थित साङ्गे छोइलिङ्ग गुम्बा डोजर की मदद से ध्वस्त किया गया। काठमाडौं महानगरपालिकाले सार्वजनिक जग्गा पर अवैध कब्जा कर बनाए गए संरचनाओं को तोड़ने के कार्य के दौरान इस गुम्बा को भी हटाया गया है। गुम्बे को ध्वस्त करने से पहले बुद्ध की मूर्ति और अन्य महत्वपूर्ण सामग्री सुरक्षित रूप से बाहर निकाल ली गयी थीं।

आज, वैशाख १८, शुक्रवार, जो बुद्ध जयन्ती का दिन है, काठमाडौं के बल्खु क्षेत्र में साङ्गे छोइलिङ्ग गुम्बा को ध्वस्त किया गया। यह गुम्बा २०७८ साल कात्तिक १३ गते को पंजि क्रत था और इसे सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण कर बनाया गया था। बल्खु, टेकु के निकट वंशीघाट, बालाजु जैसे क्षेत्रों में भी सार्वजनिक जमीन पर बने अवैध घरों को आज सुबह से ध्वस्त करने का काम जारी है।

बन्दुकेडाँडामा हरित क्रांति की वापसी

धनकुटा के चौबीसे गाउँपालिका–३, बन्दुकेडाँंडा में पानी की कमी से खराब हुई भूमि पर पानी संग्रहीत करने और जैविक खेती के माध्यम से कृषि पर्यटन का विकास हुआ है। तमोर पर्माकल्चर फार्म ने 34 लाख लीटर पानी संग्रहीत करने वाले पोखरी और लिफ्टिंग प्रणाली के ज़रिए वर्ष भर सिंचाई कर 35 प्रजाति के फल-फूल का उत्पादन किया है। स्थानीय लोगों ने भी पोखरी बनाकर पानी संकलित किया है, जिससे गाँव में आंशिक पलायन के बाद जीवन लौट आया है। 18 वैशाख, विराटनगर।

धनकुटा के चौबीसे गाउँपालिका–३, कुरुले तेनुपा के सिरान में स्थित बन्दुकेडाँंडा कुछ वर्षों पहले तक जीवंत गाँव जैसा नहीं दिखता था। पानी की कमी से सूखी हुई मिट्टी, खतम होती नदियाँ और धीरे-धीरे खाली होते घर उस इलाके को निराशाजनक बना रहे थे। स्थानीय लोगों के अनुसार वहां रहना ही नहीं, बच पाना भी एक चुनौती था। लेकिन आज, वह बन्दुकेडाँंडा हरे-भरे बग़ीचों में परिवर्तित हो चुका है। सेब, आरुबखड़ा, अखरोट, एवोकाडो जैसे फलफूल ने पहाड़ी को अपनी चादर में लपेट लिया है।

पानी की कमी से खेती योग्य जमीन बंजर होने लगी और इसके बाद पलायन शुरू हुआ। गांव धीरे-धीरे सुनसान होता गया। लेकिन, परिवर्तन का बीज पानी से बोया गया। तमोर पर्माकल्चर फार्म के अध्यक्ष लोकेन्द्रकुमार याख्खा के अनुसार, पानी की समस्या का समाधान किए बिना कृषि और स्थापन संभव नहीं था। इसलिए वर्षा जल संचयन की योजना लागू की गई। आज फार्म में 34 लाख लीटर क्षमता का पोखरी बनाया गया है, जहाँ वर्षा के पानी को संग्रहित कर वर्ष भर सिंचाई की जाती है।

फार्म के कोषाध्यक्ष दीर्घमान तामाङ कहते हैं, ‘यह केवल खेती नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सहयोग करके उत्पादन करने की एक प्रक्रिया है।’ स्थानीय स्तर पर फैली प्रेरणा और तमोर पर्माकल्चर फार्म की सफलता ने समुदाय में नई आशा जगाई है। जब पलायन घटा तो पानी और उत्पादन की बदौलत गाँव में लोगों की वापसी होने लगी। चौबीसे गाउँपालिका के राष्ट्रीय परिचयपत्र तथा पंजीकरण इकाई के एमआईएस ऑपरेटर स्नेहा श्रेष्ठ के अनुसार 2078 साल में 56 घरों ने पलायन किया था जबकि केवल एक परिवार जिले में वापस आया था।

बन्दुकेडाँंडा की यह कहानी केवल एक गाँव की कहानी नहीं है, यह स्थायी सोच, सामूहिक प्रयास और प्राकृतिक संसाधनों के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग से लाए जा सकने वाले बदलाव का उदाहरण है। वार्ड अध्यक्ष तुम्सा कहते हैं, ‘पानी की बूंद-बूंद संचित करने से बन्दुकेडाँंडा के सूखे भूभाग ने पुनर्जीवन पाया है।’

भूमिहीनलाई जबरजस्ती निष्कासन नगर्न अधिकारवादी संस्थाहरूको आग्रह

भूमिहीनों के जबरन निष्कासन पर अधिकारवादी संस्थाओं की रोक

ह्युमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जुरिस्ट्स ने सरकार से अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले भूमिहीनों का जबरन निष्कासन न करने का आग्रह किया है। इन संस्थानों ने आवास के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन न करने तथा मानवाधिकार संरक्षण के दीर्घकालीन अवसरों का सदुपयोग करने पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार को मानवाधिकार के १३ क्षेत्रीय मुद्दों पर काम करने की सलाह भी दी गई है। १८ वैशाख, काठमांडू।

चार प्रमुख अधिकारवादी संस्थाओं ने वर्तमान सरकार से कहा है कि वह अनौपचारिक बस्तियों में रह रहे भूमिहीनों को जबरन निकाला न जाए। ह्युमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जुरिस्ट्स ने शुक्रवार को एक पत्र जारी कर यह बात कही। इन संस्थाओं ने आवास के अधिकार तथा अभिव्यक्ति और संघ संस्थाओं की स्वतंत्रता सहित अनौपचारिक बस्तियों से भूमिहीनों के जबरन निष्कासन में उचित प्रक्रिया का उल्लंघन न करने का आग्रह किया है।

उन्होंने मानवाधिकार और विधि के शासन की दीर्घकालीन रक्षा के अवसरों का उपयोग करने पर भी बल दिया है। परिवर्तन की मांगों की लहर में सत्ता में आए प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की सरकार को मानवाधिकार के १३ क्षेत्रीय मामलों पर काम करने का सुझाव दिया गया है। इनमें संक्रमणकालीन न्याय प्रक्रिया, महिलाओं और बालिकाओं के अधिकार, दलित और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकार, प्रवासी श्रमिकों के अधिकार, तथा लैंगिक और यौन अल्पसंख्यकों के अधिकार शामिल हैं।

सच्ची क्रांति करुणा से शुरू होती है: रक्षा बम का जवाब

प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह ने बुद्ध जयन्ती पर कहा था कि सच्ची क्रांति ज्ञान से शुरू होती है। लेकिन, जेनजी कार्यकर्ता रक्षा बम ने प्रधानमंत्री के इस कथन का संदर्भ लेते हुए कहा है कि सच्ची क्रांति करुणा से शुरू होती है। काठमांडू के नदी किनारे स्थित सुकुम्बासी बस्ती को सरकार ने डोजर से तोड़ दिया और स्थानीय लोगों को होल्डिंग सेंटर में रखकर मजबूर कर दिया, जिससे यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन गया है।

१९ वैशाख, काठमांडू – प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह (बालेन) ने बुद्ध जयन्ती के अवसर पर कहा था कि सच्ची क्रांति ‘क’ नहीं बल्कि ‘ज्ञ’ से शुरू होती है, और वह ज्ञान होता है। इसके जवाब में जेनजी कार्यकर्ता रक्षा बम ने लिखा, “सच्ची क्रांति प्रधानमंत्रीजी, ‘क’ से ही शुरू होती है, और वह ‘करुणा’ है।”

सरकार ने बिना स्पष्ट और दीर्घकालीन प्रबंधन योजना के काठमांडू के नदी किनारे स्थित सुकुम्बासी बस्ती को डोजर से तोड़ दिया और वहां रहने वालों को होल्डिंग सेंटर में रखकर असुविधाजनक स्थिति में डाल दिया, जिस कारण यह मुद्दा राष्ट्रीय आलोचना और बहस का विषय बन गया है।

एक तरफ सरकार का नेतृत्व ज्ञान और शांति के दार्शनिक उपदेश देता है, वहीं दूसरी ओर गरीबी और हाशिए पर रहने वाले नागरिकों के आवास तोड़कर उन्हें होल्डिंग सेंटर जैसे असुविधाजनक स्थानों पर छोड़ना विरोधाभास के रूप में देखा जा रहा है। राजनीति और सामाजिक आलोचक इसे मानवीयता और करुणा की कमी बताते हुए प्रधानमंत्री के ज्ञानवाद पर करुणा के आधार पर वैचारिक प्रहार कर रहे हैं।

सुकुम्बासी बस्ती हटाने के सरकारी कदम के खिलाफ नागरिक समाज और युवा कार्यकर्ता सुरक्षित आवास के विकल्प के साथ ही बस्ती खाली करने की मांग कर सरकार पर दबाव बना रहे हैं। इस विषय पर व्यापक बहस जारी है।

आशा लगाए बासिन्दाओं से बास खोसे जाने का लगभग प्रयास

समाचार सारांश

  • विराटनगर जुट मिल्स के मजदूर क्वार्टर खाली करने का सूचना जारी होने के बाद स्थानीय बासिन्दा चिंतित हैं।
  • स्थानीय प्रशासन और मिल्स प्रबंधन ने संरचना अतिक्रमण करने वालों को हटाने में सहयोग करने की तैयारी की है।
  • मोरंग के सहायक प्रमुख जिल्ला अधिकारी ने बताया कि वहां रहने वालों की जानकारी एकत्र की जा रही है और प्रक्रिया के अनुसार कदम उठाए जाएंगे।

१८ वैशाख, विराटनगर। नेपाल के पहले उद्योग विराटनगर जुट मिल्स के मजदूरों के लिए बनाए गए ‘हटताली हाट’ का स्थान लोकतांत्रिक आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

गिरिजाप्रसाद कोइराला, मनमोहन अधिकारी जैसे नेताओं ने यहीं बर-पिपल के समीप से जनता को लोकतंत्र के लिए सड़क पर आने के लिए प्रेरित किया था।

लेकिन आज इतिहास की गवाह चौतारी के आसपास रहने वाले बासिन्दे अपने भविष्य को लेकर चिंतित और उलझन में हैं। स्थानीय प्रशासन ने मिल्स के मजदूर क्वार्टर खाली करने का आदेश जारी किया है जिससे स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है।

रोज़ाना मजदूरी करने वाले फिरोज शेख आज काम न करके हटताली हाट पर आए थे। उन्होंने कहा, “मेरी जन्मभूमि यही है, मेरे पिता जुट मिल्स में काम करते थे। अगर हमें हटाया गया तो हम कहाँ जाएँ?”

बिहीवार के दिन चौतारी पर मिली ६२ वर्षीय जयरा खातुन भी ऐसी ही चिंता व्यक्त करती हैं। वह पहले मिल्स में काम कर चुकी हैं, उनके पति भी मिल्स में काम करते थे। बस्ती हटाने की सूचना मिलने के बाद उन्हें अंदर से भय सताने लगा है कि वे कहाँ जाएं।

उस दिन चौतारी में बच्चे, महिलाएं, पुरुष और बूढ़े सभी इकठ्ठा हुए थे, और उनका एक ही गुस्सा था, “हमने वोट देकर सरकार बनाई थी, जो आज हमारी छत को उजाड़ रही है।”

स्थानीय कमला मगर हटताली हाट पर अकेली रहती हैं। उनके पति और एक बेटा जुट मिल्स में काम करते हुए गुजर चुके हैं, जबकि बड़ा बेटा लापता है। दुकान चला चुकी कमला ने डोजर चलाने वाले से भड़क कर कहा कि पहले उन्हें जहर दे दिया जाए।

उन्होंने दर्द बयां करते हुए कहा, “हमें हटाने से पहले जहर देना पड़ेगा, हम खाकर मरने को तैयार हैं। मेरे पति यहीं मर गए, तो हम कहाँ जाएं? हम बेघर होकर नहीं रह सकते।”

विकास के सपने देखने वाले नेताओं से बास छीनने की बात उनकी शिकायत है। “युवा सरकार आई, रोजगार देगी, इसलिए हम नाती-नातिनालोगों ने वोट दिया था। हमने उन्हें अपना बेटा समझकर वोट दिया था। आज जब हम अपने घर उजाड़ते देख रहे हैं तो हम क्या करें, कहाँ जाएं?” कमला ने कहा।

जुट मिल्स २०७० साल से पूरी तरह बंद है। उद्योग बंद होने से पहले मजदूरों के बकाया रकम का भुगतान हो चुका था लेकिन मजदूर अपने क्वार्टर नहीं छोड़ रहे हैं।

स्थानीय बादल चन्द ने कहा कि अगर मजदूर क्वार्टर खाली कराना है तो वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी है। “अगर हमें दूसरी जगह रहने और रोजगार मिलने का भरोसा दिया जाए तो हम चले जाएंगे,” उन्होंने कहा।

७० वर्षीय कृष्णबहादुर क्षेत्री ने भी बिना विकल्प दिए क्वार्टर छोड़ने का पक्ष नहीं जताया।

विराटनगर जुट मिल्स के सुपरवाइजर मनोज खड़का के अनुसार हटताली हाट सहित मिल्स मजदूर क्वार्टर क्षेत्र में ४०० से अधिक परिवार रहते हैं।

“सरकार ने सभी मजदूरों की अलग-अलग जानकारी लेने के बाद कुछ क्वार्टर छोड़ चुके हैं, लेकिन ज्यादातर अभी भी रह रहे हैं। क्वार्टर क्षेत्र में और भी लोग आकर बसे हैं,” उन्होंने कहा, “हटताली हाट क्षेत्र में कुछ सुकुमबासी हैं, कुछ किराए पर रहने वाले।”

उनके मुताबिक ६९ बिघा क्षेत्रफल के विराटनगर जुट मिल्स की भूमि में उद्योग क्षेत्र ४६ बिघा और हरिनगर भट्टा, हटताली हाट, दक्षिण गेट और दरैयाबस्ती में १४ बिघा से अधिक भूमि है।

उद्योग क्षेत्र के बाहर की भूमि पर सुकुमबासी लोग रहते हैं। मिल्स संरचना में ८० से अधिक छोटे-बड़े टहरियां हैं, जिनमें से पुराने निवासी किराया नहीं दे रहे हैं। किराया मांगने पर वे देने को तैयार नहीं हैं।

सरकार ने संरचना पर कब्जा करने वालों को हटाने के लिए मिल्स प्रबंधन को सहयोग करने का निर्देश दिया है।

मोरंग के सहायक प्रमुख जिल्ला अधिकारी सरोज कोइराला ने कहा कि जुट मिल्स में रहने वालों की जानकारी जुटाई जा रही है और बस्ती खाली करने की जगह प्रक्रिया के द्वारा कार्रवाई होगी।

“यहां रहने वाले सुकुमबासी हैं या नहीं, इसकी जानकारी पूछी जा रही है,” उन्होंने कहा, “बस्ती हटाने की तैयारी है, स्थानीय प्रशासन और मिल्स प्रबंधन मिलकर सहयोग करेंगे और हम भी सहायता प्रदान करेंगे।”

नेपाल की अर्थव्यवस्था: १५-१५ दिन में वेतन भुगतान करने वाली ताजा सरकारी पहल के लाभ

रु १०० के नोट गिनते हुए एक व्यक्ति के दो हाथ

तस्वीर स्रोत, Getty Images

सरकार ने आधिकारिक कर्मचारियों को प्रत्येक माह दो बार यानी पाक्षिक वेतन देने का निर्णय लागू कर दिया है।

अधिकारियों के अनुसार अर्थ मन्त्रालय और महालेखा नियंत्रक कार्यालय के कर्मचारियों को बुधवार को वेतन भुगतान कर इस नई प्रणाली की शुरुआत की गई है।

महालेखा नियंत्रक ने बताया कि इस नई प्रक्रिया से देश की समग्र अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव पड़ेगा।

सरकारी इस कदम पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ इसे सकारात्मक मान रहे हैं, तो कई लोग पुराने सिस्टम को ही उचित बता रहे हैं।

अर्थ मंत्रालय ने शुरुआत में संघ के कर्मचारियों से परीक्षण शुरू किया है और इसे धीरे-धीरे प्रदेशों तक फैलाने की योजना है।

बुद्ध सम्झँदै बालेनले भने- साँचो क्रान्ति ज्ञानबाट सुरु हुन्छ

बुद्ध जन्मजयन्ती पर प्रधानमंत्री का संदेश: सत्य ज्ञान से ही क्रांति की शुरुआत होती है

प्रधानमंत्री वलेन्द्र शाह ने बुद्ध जयन्ती के अवसर पर दुःख निवारण के चार आर्य सत्यों को स्मरण करते हुए विश्वशांति की कामना की। उन्होंने कहा, ‘दुःख है, दुःख के कारण हैं, दुःख निवारण है और दुःख निवारण का मार्ग है।’ प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि बुद्ध का जन्म होने से नेपाल की भूमि सदैव अहिंसा और शांति के मार्ग पर रही है और सच्ची क्रांति ज्ञान से शुरू होती है। (१९ वैशाख, काठमांडू)

प्रधानमंत्री शाह ने शांति के महान प्रवर्तक गौतम बुद्ध की जन्मजयन्ती के अवसर पर सभी को प्रज्ञामय शुभकामनाएं देते हुए सोशल मीडिया फेसबुक पर अर्जित दुःख निवारण के मार्ग को अपनाने का उल्लेख किया। उन्होंने बुद्ध के चार आर्य सत्यों को याद करते हुए कहा, ‘हमारी यात्रा ज्ञान के उजाले की खोज और समस्याओं के समाधान के मार्ग पर होनी चाहिए।’

अंधकार को उजाले की कमी के रूप में व्याख्यायित करते हुए प्रधानमंत्री शाह ने कहा, उजाले की एक किरण चलने मात्र से अंधकार स्वतः दूर हो जाता है और इसलिए ज्ञान का महत्व अत्यंत है। उन्होंने यह भी बताया कि बुद्ध के जन्म से नेपाल की भूमि सदैव अहिंसा और शांति की निर्णायक पक्ष में रही है। ‘सच्ची क्रांति ‘क’ से नहीं ‘ज्ञ’ से शुरू होती है, और वह ‘ज्ञ’ है ज्ञान।’ प्रधानमंत्री शाह के शब्द थे।

बुद्ध के सुप्रसिद्ध उपदेश ‘अप्प दीपो भवः’ (अपने ही प्रकाश स्वयं बनो) का उद्धरण देते हुए प्रधानमंत्री शाह ने सभी को शुभकामनाएं दीं। उनके शब्द हैं, “दुःख है, दुःख के कारण हैं, दुःख का निवारण है, दुःख निवारण का मार्ग है। बुद्ध ने जिस मार्ग को दिखाया वह दुःख निवारण का मार्ग है। उजाले की कमी को ही अंधकार कहा जाता है; जब उजाले की किरणें कदम छूना शुरू करती हैं, तब अंधकार स्वतः दूर हो जाता है। हमारी यात्रा ज्ञान के उजाले की खोज और समस्याओं के समाधान के मार्ग पर होनी चाहिए। शांति के सर्वकालीन महान प्रवर्तक बुद्ध की जन्मजयन्ती के अवसर पर विश्वशांति की कामना करता हूँ। बुद्ध के जन्म से धन्य हमारी नेपाल भूमि सदैव अहिंसा और शांति के पक्ष में है। सच्ची क्रांति ‘क’ से नहीं ‘ज्ञ’ से शुरू होती है, और वह ‘ज्ञ’ ज्ञान है। बुद्ध जयन्ती के शुभ अवसर पर सम्पूर्ण को प्रज्ञामय शुभकामनाएं। अप्प दीपो भवः।”

अन्टार्कटिका में जलवायु परिवर्तन का सिल जीवनचक्र पर प्रभाव

अन्टार्कटिका में जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ जल्दी पिघलने से सिलों के १० दिन की माँ-बच्चा साथ रहने का समय घट गया है, जिससे बच्चों की मृत्यु का खतरा बढ़ गया है। नेपाल में जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालय की ग्लेशियरें तेजी से पिघल रही हैं, जिससे बाढ़, भूस्खलन और सूखा बढ़ा है, और २०२४ में २४९ लोगों की मौत तथा हजारों का विस्थापन हुआ है। जलवायु परिवर्तन ने नेपाल में डेंगू, मलेरिया और जलजनित बीमारियों के प्रसार के साथ-साथ कृषि उत्पादन और पशुपालन पर गंभीर प्रभाव डाला है।

अन्टार्कटिका में रहने वाले सिलों का जीवनचक्र प्रकृति के अत्यंत संवेदनशील और कठोर उदाहरणों में से एक है। वहाँ की कई प्रजातियाँ बर्फ में ही बच्चे जन्म देती हैं। जन्म के बाद माँ और बच्चे के बीच केवल लगभग १० दिन का समय साथ रहने का होता है। इसी छोटे से कालखंड में माँ को बच्चे को दूध पिलाना, उसका वजन बढ़ाना, ठंडे वातावरण में जीवित रहने योग्य बनाना और पानी में तैरना सिखाना जैसे आवश्यक कौशल सिखाने होते हैं। लेकिन, जलवायु परिवर्तन तथा ग्लोबल वार्मिंग के कारण अन्टार्कटिका की बर्फ पहले से तेज़ी से पिघल रही है, जिससे यह महत्वपूर्ण १० दिन का समय भी कम होता जा रहा है।

अभी जलवायु परिवर्तन के कारण अन्टार्कटिका में सिलों के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। अनेक मामलों में मां को समय से पहले छोड़कर जाना पड़ता है और पूरी तरह सक्षम नहीं हुए बच्चे बर्फ पिघलने से पानी में गिरने या डूबने के खतरे में होते हैं। यह समस्या केवल सिलों के जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अन्टार्कटिका में होने वाले छोटे-छोटे बदलाव विश्वव्यापी मौसमी प्रणालियों को प्रभावित करते हैं, जैसे कि वर्षा चक्र में अनियमितता, असमय बारिश, बर्फबारी, सूखा आदि। नेपाल में भी हर साल कई घटनाएँ इसी कारण से होती हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण नेपाल में देखे गए ये समस्याएं विश्व के अत्यंत जलवायु-संवेदनशील देशों में से एक होने की पुष्टि करती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ भुषण तुलाधर के अनुसार, हिमालय क्षेत्र में गर्मी की तीव्र वृद्धि हो रही है, जिससे बर्फ पिघलने, बाढ़, भूस्खलन, सूखा और स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

प्रधानमंत्री से लेकर उपसचिव तक सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच की जाएगी

सरकार ने वर्तमान प्रधानमंत्री से लेकर सहसचिव स्तर के सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच के लिए पाँच सदस्यों वाली संपत्ति जांच आयोग को जिम्मा सौंपा है। आयोग 2062/63 से लेकर 2082 साल चैत मास के अंत तक के सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति विवरण एकत्रित और जांच करेगा। आयोग गैरकानूनी संपत्ति अर्जन के संदेहित व्यक्तियों की शिकायतों को 30 दिनों के भीतर आमंत्रित कर गुप्त रूप से जांच करेगा।

18 वैशाख, काठमांडू। सरकार ने वर्तमान प्रधानमंत्री से लेकर उपसचिव या उसके समकक्ष सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच के लिए संपत्ति जांच आयोग को विगत दो सप्ताह पहले कार्यादेश दिया है। गुरुवार को इस कार्यादेश को राजपत्र में प्रकाशित किया गया। आयोग वर्तमान न्यायाधीशों और नेपाली सेना के पदाधिकारियों की जांच नहीं करेगा।

जांच की दायरे में आने वालों की सूची में वर्तमान और सेवानिवृत राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के पद शामिल नहीं हैं, लेकिन उनके सचिवालय के पदाधिकारी जांच के दायरे में होंगे। आयोग सार्वजनिक पदों पर कार्यरत या सेवानिवृत्त पदाधिकारियों और उनके परिवार के विदेश एवं देश में स्थित संपत्ति का विवरण एकत्र करेगा और उसका आधिकारिक सत्यापन करेगा।

आयोग के अध्यक्ष के रूप में पूर्व न्यायाधीश राजेन्द्रकुमार भण्डारी हैं, जबकि इसमें पुनरावेदन अदालत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पुरुषोत्तम पराजुली, उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश चण्डीराज ढकाल, पूर्व पुलिस उप महानिरीक्षक गणेश केसी और चार्टर्ड अकाउंटेंट प्रकाश लम्साल सदस्य हैं। इस आयोग को तत्कालीन प्रधानमंत्री से सहायक मंत्री तक और संविधान सभा के सभी सांसदों की संपत्ति जांच का कार्यादेश दिया गया है।

आङसाङ सुकी को जेल से घर में नजरबंदी में स्थानांतरित किया गया

म्यान्मार की नेतृ आङसाङ सुकी को कारावास से घर में नजरबंदी में स्थानांतरित किया गया है। सेना प्रमुख मिन आङ लाइङ ने आङसाङ को बाकी की सजा घर पर पूरी करने का आदेश दिया है। उनके बेटे किम एरिस ने कहा है कि उनकी माँ जिंदा होने का कोई प्रमाण नहीं है और सरकारी तस्वीर का कोई औचित्य नहीं है।

१८ वैशाख, काठमांडू। म्यान्मार की नेतृ आङसाङ सुकी को जेल से घर में नजरबंदी (हाउस अरेस्ट) में रखा गया है। ८० वर्षीय नॉबेल पुरस्कार विजेता सुकी को २०२१ में सैन्य तख्तापलट के बाद पदच्युत कर हिरासत में लिया गया था।

म्यान्मार के सैन्य प्रमुख मिन आङ लाइङ ने कहा, ‘आङसाङ को बाकी की सजा घर पर पूरी करने का आदेश दिया गया है।’ मिन आङ लाइङ स्वयं इस सैन्य तख्तापलट के मुख्य नेता हैं।

नेतृ आङसाङ २०१५ में म्यान्मार की सरकार में आई थीं। उस समय म्यान्मार में पूर्व शासन ने लोकतांत्रिक सुधारों की शुरुआत की थी। इससे पहले वे लंबे समय तक सैन्य शासन के विरोधी और लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता रही हैं। उन्हें पहले भी १५ वर्षों तक घर में नजरबंदी में रखा गया था।

म्यान्मार की सरकारी मीडिया में सुकी की एक तस्वीर प्रकाशित हुई है, जिसमें वे दो सैनिकों के साथ बैठी दिख रही हैं। उनके बेटे किम एरिस ने सैन्य सरकार की हालिया घोषणा पर शंका जताई है और कहा है कि उनकी माँ के जिंदा होने का कोई सही प्रमाण नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकारी मीडिया में प्रकाशित तस्वीर का कोई औचित्य नहीं है।

आङ सान सू ची को घरपरिवारमा नजरबन्द र सजाय घटाएको म्यान्मार सैनिकको दावी

म्यान्मारको सैन्य सरकारले हिरासतमा राखिएको प्रजातान्त्रिक नेतृ आङ सान सू चीलाई घरमै नजरबन्दमा राखिएको र उनको सजाय १८ वर्षसम्म घटाइएको दाबी गरेको छ। सरकारी सञ्चारमाध्यमले नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता सू चीलाई दुई जना सैनिक पोशाकधारी व्यक्तिहरूको सामुन्ने बसिरहेको तस्बिर पनि सार्वजनिक गरेको छ। उनका छोरा किम एरिसले बीबीसीलाई उक्त तस्बिरको अर्थ नभएको बताए। उनका अनुसार त्यो तस्बिर चार वर्ष पुरानो हो र आमा जीवित छिन् वा छैनन् भन्ने विषयमा कुनै प्रमाण नभएको बताए। उनले भने कि म्यान्मारको सैन्य सरकारले जारी गरेको जानकारीमा विश्वास गर्न गाह्रो रहेको छ।

सन् २०२१ मा सू चीको सरकारलाई सिंहदरबारबाट सैन्य कू मार्फत हटाइएको थियो। उनलाई लागेको दोषलाई धेरैले बेसहारा र आधारहीन ठानेका छन्। ८० वर्षीया प्रजातान्त्रिक नेतृ सू चीलाई घरमै नजरबन्दमा राखिएको भनेर म्यान्मारको सरकारी सञ्चार माध्यम स्ट्रिमले जानकारी दिएको छ। सन् २०२१ मा सैन्य कूपछि उनलाई राजधानी न्यापीडोस्थित सेनाको कारागारमा थुनामा राखिएको विश्वास गरिएको थियो।

त्यस समय सैन्य नेतृत्व गरिरहेका मिन आङ ह्लाइङ्ले सू चीको बाँकी सजाय “निवासमै भोग्ने गरी घटाइएको” बताएका छन्। म्यान्मारमा सन् २०१५ मा लोकतान्त्रिक सुधारपछि आङ सान सू ची सत्तामा पुगेकी थिइन्। यसअगाडि उनले दशकौंसम्म सैनिक शासनविरुद्धको लोकतान्त्रिक आन्दोलनमा सक्रिय भूमिका निभाएकी थिइन् र १५ वर्षभन्दा बढी समय नजरबन्दमा बिताएकी छिन्।

सरकारी सञ्चार माध्यमले सू चीलाई दुई जना बर्दीधारी सुरक्षाकर्मीहरूसँग राखिएको तस्बिर सार्वजनिक गरेको छ। उनका छोरा किम एरिसले यो घोषणा प्रति शंका व्यक्त गर्दै आफ्नी आमा जीवित छन् कि छैनन् भन्ने प्रमाण नभएको बताए। सन् २०२२ मा खिचिएको तस्बिरले “यो घटना हास्यास्पद” देखाएको उनको भनाइ छ। “म आशा गर्छु यो सत्य होस्। तर त्यो प्रमाण मैले देखेको छैन। जबसम्म म उनीसँग प्रत्यक्ष सम्पर्क वा स्वतन्त्र पुष्टि नपाउँ, म कुनै कुरा विश्वास गर्दिन” उनले भने।

यूएईविरुद्ध टस जितेर नेपाल ब्याटिङ गर्दै – Online Khabar

नेपाल ने UAE के खिलाफ टॉस जीतकर बल्लेबाजी करने का फैसला किया

नेपाल ने आईसीसी क्रिकेट विश्वकप लीग 2 के अंतर्गत UAE के खिलाफ तीसरे मैच में टॉस जीतकर बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया है। नेपाली कप्तान रोहितकुमार पौडेल ने त्रिवि क्रिकेट मैदान में टॉस जीतकर बल्लेबाजी चुनने की जानकारी दी है। नेपाल ने पहले मैच में UAE को हराया था जबकि दूसरे मैच में ओमान से हार का सामना करना पड़ा। १८ वैशाख, काठमांडू।

आईसीसी क्रिकेट विश्वकप लीग 2 के जारी श्रृंखला के तीसरे मैच में नेपाल ने टॉस जीतकर बल्लेबाजी करने का फैसला किया है। त्रिभुवन क्रिकेट मैदान में UAE के खिलाफ मैच में टॉस जीतते ही नेपाली कप्तान रोहितकुमार पौडेल ने बल्लेबाजी चुनी। श्रृंखला के पहले मैच में नेपाल ने UAE को हराकर महत्वपूर्ण दो अंक हासिल किए थे। लेकिन दूसरे मैच में नेपाल ने कमजोर प्रदर्शन करते हुए ओमान के खिलाफ हार का सामना किया। वहीं UAE पहले मैच में नेपाल से हारने के बाद दूसरे मैच में ओमान को हराकर उच्च मनोबल के साथ है और नेपाल के खिलाफ भी जीत दर्ज करने की उम्मीद रखता है।