समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा पश्चात तैयार।
- भाद्र 10 तारीख को भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग सहित कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मानवीय और भौतिक नुकसान पहुंचाया।
- यूनाइटेड नेशंस वुमेन के अनुसार रसुवा और नुवाकोट में लगभग 1,57,550 महिला और बालिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुई हैं, जिनमें करीब 43,000 को तत्काल सहायता की आवश्यकता है।
- यूनिसेफ ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा और तनहुँ में लगभग 65,000 प्रभावित लोगों की जानकारी दी है, जिनमें 10,500 से अधिक गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं हैं।
भाद्र 10 की सुबह भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग समेत कई इलाकों में भारी मानवीय और भौतिक क्षति पहुंचाई। इसने घर, सड़क, पुल, व्यावसायिक संरचनाएं और आजीविका के आधारों को ही नहीं, बल्कि कई परिवारों को विस्थापित और परिजनहीन बना दिया। कई लोग अभी भी संपर्क विहीन हैं। अनेक परिवारों ने अपने प्रियजनों, घर, संपत्ति और आय के स्रोत खो दिए हैं। इसने प्रभावित समुदाय में विस्थापन, असुरक्षा, शोक, मानसिक तनाव और अनिश्चित भविष्य की भावनाओं को बढ़ा दिया है।
बाढ़ के बाद प्रभावित और विस्थापित लोगों को होल्डिंग सेंटर और अस्थायी आश्रयस्थलों में रखा गया है तथा खोज, उद्धार, राहत और पुनर्स्थापन कार्य जारी हैं। भोटेकोशी बाढ़ के प्रभाव को लैंगिक और संरक्षण के नजरिए से देखने पर अवस्था और भी गंभीर नजर आती है।
यूनाइटेड नेशंस वुमेन के अनुसार रसुवा और नुवाकोट में लगभग 1,57,550 महिलाएं और बालिकाएं सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुई हैं, जिनमें करीब 43,000 को तत्काल मानवीय सहायता की जरूरत है। यूनिसेफ के 31 अगस्त 2026 के प्रारंभिक मानवीय स्थिति रिपोर्ट के अनुसार रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा और तनहुँ में लगभग 65,000 लोग प्रभावित हुए हैं।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि आपदा के बाद हालत केवल भौतिक क्षति तक सीमित नहीं है। इसके साथ ही बाल संरक्षण, परिवार खोज और पुनर्मिलन, हिंसा, शोषण और मानव तस्करी से सुरक्षा तथा मनो-सामाजिक सहायता की भी अत्यंत आवश्यकता है। स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति भी अत्यधिक जोखिम में है। यूनिसेफ के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 10,500 गर्भवती और स्तनपान करा रही महिलाएं हैं, जिन्हें विशेषकर आयरन और फोलिक एसिड सहित पोषण सहायता की जरूरत है।
रसुवा के चार स्वास्थ्य संस्थान पूर्णतः क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हो गई हैं। इससे मातृ, नवजात और बाल स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं। यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) ने भी मातृत्व सामग्री, मासिक धर्म एवं स्वच्छता सामग्री, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं तथा लैंगिक हिंसा रोकथाम एवं प्रतिक्रिया को प्राथमिकता दी है।
इससे स्पष्ट होता है कि राहत केवल भोजन, पानी और अस्थायी आवास तक सीमित नहीं है। महिलाओं, किशोरियों, गर्भवती और प्रसूत महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, गोपनीयता, मनो-सामाजिक सहायता, परिवार से पुनर्मिलन और यौन तथा प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं में पहुंच भी आपदा प्रतिकार्य के मुख्य अंग हैं।
हमें एक महत्वपूर्ण सवाल भी पूछना होगा – आपदा ने महिलाओं और किशोरियों के जीवन पर कैसा प्रभाव डाला है? उद्धार और राहत योजनाओं में उनका शरीर, स्वास्थ्य, सुरक्षा, गोपनीयता और सम्मान को कितनी प्राथमिकता दी गई है?
आपदा सभी के लिए होती है, लेकिन जोखिम सबके लिए समान नहीं होता।
बाढ़, पहाड़ या भूकंप प्राकृतिक घटनाएं हो सकती हैं, लेकिन इनके जोखिम पहले से मौजूद सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक असमानताओं से गहराई से जुड़े होते हैं। महिलाओं को आर्थिक संसाधनों तक सीमित पहुँच होती है, उनका नाम जमीन या मकान पर नहीं होता, वे सुरक्षित स्थान जाने के फैसले में शामिल नहीं हो पातीं।
परिवार के बच्चे, बुजुर्ग या बीमार सदस्य की देखभाल उन्हें अधिक करनी पड़ती है। सूचना, परिवहन, स्वास्थ्य और राहत सेवाओं तक पहुंच में असमानता जोखिम को और बढ़ा सकती है।
इसलिए आपदा प्रबंधन को लैंगिक नजरिए से देखना आवश्यक है। उद्धार का मतलब केवल बाढ़ से लोगों को निकाल कर सुरक्षित जगह ले जाना नहीं होना चाहिए। गर्भवती महिलाएं कहां हैं? प्रसूत महिलाओं की क्या हालत है? किशोरियां कहां हैं? विकलांग महिलाओं को सुरक्षित स्थान कैसे पहुंचाया जाए? जो नियमित दवाइयां लेते हैं उनकी क्या स्थिति है? परिवार के सदस्य गायब होने पर महिलाओं और बच्चों को क्या तत्काल जरूरतें हैं? इन सवालों के जवाब भी उद्धार का हिस्सा होने चाहिए।
होल्डिंग सेंटर और अस्थायी आश्रयस्थलों में भोजन, पानी, कपड़ा, कंबल और रहने की जगह उपलब्ध कराई जा रही है, जो अत्यंत जरूरी हैं। पर केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि राहत पहुंची या नहीं, बल्कि किसे किस तरह की राहत चाहिए यह समझना भी जरूरी है। हमें याद रखना चाहिए – मासिक धर्म बाढ़ के कारण नहीं रुकता, गर्भावस्था रुकती नहीं, प्रसव और स्तनपान की जरूरतें भी नहीं थमतीं। महिलाओं की स्वास्थ्य आवश्यकताएं आपदा के कारण नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं।
होल्डिंग सेंटर पे पहुंची महिलाओं और किशोरियों को पर्याप्त सेनेटरी पैड, आंतरिक वस्त्र, सफ़ा पानी, साबुन, सुरक्षित शौचालय और व्यक्तिगत सफाई के लिए गोपनीयता दी जानी चाहिए। ये विलासिता नहीं, स्वास्थ्य, सम्मान और मानवाधिकारों से जुड़ी अनिवार्य आवश्यकताएं हैं।
एक पैड देना मासिक धर्म प्रबंधन नहीं है। पर्याप्त पैड, आंतरिक वस्त्र, साफ पानी, साबुन, सुरक्षित शौचालय, कचरा प्रबंधन और गोपनीयता सभी आवश्यक हैं।
गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, दवाइयां, प्रसूति सेवा और आकस्मिक स्वास्थ्य सेवाएं आवश्यक होती हैं। प्रसव के दौरान सड़क अवरुद्ध होना, परिवहन का अभाव या स्वास्थ्य केंद्र न पहुंच पाना जानलेवा साबित हो सकता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को प्राथमिकता में उद्धार देना दया नहीं, बल्कि उनका अधिकार का सम्मान है। सुरक्षित मातृत्व उनका मूल अधिकार है।
प्रसूत महिला और नवजात बच्चे की स्थिति अत्यंत संवेदनशील होती है। बच्चों को स्तनपान कराने के लिए सुरक्षित और गोपनीय जगह चाहिए। माताओं को उचित पोषण और आराम की जरूरत है। नवजात की सफाई, तापमान और पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। एक प्रसूत महिला ने कहा, ‘हमें खाने और रहने की जगह मिली है, लेकिन सभी लोग एक साथ रहने से शोर होता है। मेरी तीन महीने की बच्ची सो नहीं पाती, ठंडे फर्श पर सोनी पड़ रही है। मुझे भी नींद नहीं आती। खाने से दूध भी कम आता है। किसी ने दूध का पैकेट दिया है, पर दूध पिलाने और मापन के साधन न होने के कारण बच्चा सही से पचा नहीं पा रहा। अगर हमें थोड़ा सुरक्षित रहने की व्यवस्था मिले तो अच्छा होगा।’
यह बयान राहत और वास्तविक जरूरतों के बीच के अंतर को दर्शाता है। भोजन महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रसूत महिलाओं के लिए आराम करने की जगह, पौष्टिक आहार, सुरक्षित स्तनपान की जगह तथा नवजात के अनुसार स्वास्थ्य और पोषण सेवाएं भी उतनी ही जरूरी हैं। आश्रय केवल तंबू या छत नहीं, बल्कि सुरक्षा, गोपनीयता, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण और सम्मान भी आश्रय के हिस्से हैं।
आपदा प्रभावित होल्डिंग सेंटर की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है। हर होल्डिंग सेंटर में महिला पुलिस की व्यवस्था होना चाहिए। जब सैकड़ों लोग एक ही स्थान पर रहते हैं, तो महिलाओं की गोपनीयता कैसे बनी रहे? रात में शौचालय जाते समय वे सुरक्षित हैं? कपड़े बदलने या मासिक धर्म प्रबंधन के लिए निजी जगह है? हिंसा होने पर शिकायत कहां करें? गर्भवती महिलाएं आपात स्थितियों में कहां जाएं? प्रसूत महिलाएं स्तनपान के लिए सुरक्षित स्थान पा रही हैं? इन सवालों के जवाब न मिलने पर राहत केन्द्र को सुरक्षित आश्रयस्थल कहना मुश्किल होता है।
राहत वितरण के तरीकों पर भी लैंगिक दृष्टिकोण से पुनर्विचार जरूरी है। परिवार के पुरुष सदस्य को केंद्र में रखकर राहत वितरण करने से महिलाओं की असली जरूरतें और आवाजें अक्सर छूट जाती हैं। एकल महिला, महिला मुखिया वाले परिवार, किशोरियां, गर्भवती और प्रसूत महिलाएं, विकलांग महिलाएं और सामाजिक रूप से हाशिए पर रहने वाले समूहों की विशेष जरूरतों को पहचाना जाना चाहिए।
महिलाओं से केवल ‘आपको क्या चाहिए?’ पूछना ही पर्याप्त नहीं है। उनके जवाबों को राहत और प्रबंधन के निर्णयों में प्रतिबिंबित होना चाहिए। आपदा प्रबंधन में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य को आपातकालीन सेवाओं का हिस्सा माना जाना चाहिए। गर्भधारण जांच, प्रसूति सेवा, प्रसव के बाद स्वास्थ्य सेवा, गर्भनिरोधक साधन, मासिक धर्म प्रबंधन, यौन हिंसा के बाद उपचार, मनो-सामाजिक सहायता और आवश्यक रेफरल सेवाएं पीछे नहीं छोड़ी जा सकतीं। आपदा के समय महिलाओं के शरीर और अधिकार हमेशा बने रहते हैं।
इसी तरह विस्थापन, गोपनीयता की कमी, असुरक्षित आश्रय, आर्थिक संकट और कमजोर सुरक्षा उपायों के कारण लैंगिक हिंसा का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए राहत और आश्रयस्थलों में सुरक्षित शिकायत और गुनाह प्रणाली, गोपनीय रेफरल व्यवस्था, मनो-सामाजिक सहायता, स्वास्थ्य सेवा और कानूनी तथा संरचनात्मक सुरक्षा सेवाओं की व्यवस्था करनी होगी। हिंसा के बाद प्रतिक्रिया ही नहीं, खतरे की पहचान कर शुरुआत से रोकथाम भी जरूरी है।
आपदा के प्रभाव का अंत केवल उद्धार और राहत से नहीं होता। पुनर्स्थापन चरण में भी महिलाएं पीछे रह सकती हैं। घर बनते हैं, सड़कें बनती हैं, बाजार खुलते हैं और स्कूल शुरू होते हैं, लेकिन क्या घर खोई महिलाओं को पुनर्निर्माण सहायता मिलती है?
व्यवसाय खोई महिलाओं को फिर से कमाई के अवसर मिलते हैं या नहीं? नागरिकता, जमीन के कागजात, शिक्षा दस्तावेज आदि खोई महिलाओं को पुनः प्राप्ति की प्रक्रिया में कितनी सहूलियत मिलती है? पुनर्स्थापन का मतलब केवल घर बनाना नहीं, बल्कि महिला के जीवन, आय, संपत्ति, स्वास्थ्य, सुरक्षा और निर्णय क्षमता की पुनर्स्थापना भी है।
हर राहत पैकेज में मासिक धर्म प्रबंधन, पेय जल, सफाई और स्वच्छता की जरूरतें शामिल होनी चाहिए। स्वास्थ्य टीम में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य और मनो-सामाजिक सेवाओं की तैयारी होनी आवश्यक है। बच्चों के लिए बाल संरक्षण, परिवार खोज और पुनर्मिलन तथा सुरक्षित स्थान की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
इसी तरह स्थानीय आपदा प्रबंधन तंत्र में महिलाओं की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। महिलाएं केवल राहत लेने वाली नहीं, वे आपदा की पहचान, योजना, उद्धार, राहत, पुनर्स्थापन और पुनर्निर्माण के निर्णय प्रक्रियाओं में अधिकारयुक्त नागरिक हैं।
महिलाएं आपदा की केवल पीड़ित नहीं हैं। वे परिवार और समुदाय की नेतृत्वकर्ता, निर्णयकर्ता और आपदा प्रबंधन की सक्रिय साझेदार हैं। इसलिए अब आपदा प्रबंधन की भाषा बदलने की जरूरत है। ‘महिलाओं को क्या राहत देनी है?’ के सवाल से आगे बढ़कर ‘आपदा में महिलाओं के कौन से अधिकार सुनिश्चित किए जाएं?’ इस दिशा में सोचने और पूछने की आवश्यकता है।
भोटेकोशी की बाढ़ ने घर, संपत्ति, सड़क और आजीविका के आधारों को बहा दिया, लेकिन इसने हमारी पुरानी सोच बदलने का अवसर भी दिया है। अब राहत पहुंचाए गए व्यक्तियों की संख्या या वितरित सामग्री से ही असराकारी कामयाबी मापी नहीं जाएगी। प्रभावित महिलाएं, किशोरियां, बच्चे, गर्भवती और प्रसूत महिलाएं, एवं अन्य जोखिम समूह किस हद तक सुरक्षित, सम्मानित, सूचित और आवश्यक सेवाओं से जुड़े हैं, यह भी सफलता का पैमाना होगा।
इस बाढ़ ने घर, संपत्ति, सड़क और रिश्ते बहा दिए, लेकिन महिलाओं के अधिकारों को बहने नहीं देना चाहिए। आपदा में महिलाओं के अधिकार किसी अतिरिक्त एजेंडा नहीं, बल्कि वह केंद्र हैं जिस पर आपदा प्रबंधन का संपूर्ण आधार खड़ा होना चाहिए।